ख़ुसरो काम क्लाइमेट का, उड़ गया संग अनार!
अमीर ख़ुसरो याद हैं आपको? जी, वही 13वीं शताब्दी के सूफी कवि, जिन्हें तूती-ए-हिंद की उपाधि से नवाजा गया था। जिन्होंने ख्याल से लेकर तराना, तबले से लेकर सितार और गज़ल से लेकर कव्वाली के नए कीर्तिमान रचे। इसके अलावा, वह कई ऐसी कलाओं में पारंगत रहे, जिनकी फेहरिस्त इस लेख की सीमा को लांघकर एक पुस्तकालय में दर्ज की जा सकती है। ऐसे में हमने सोचा कि अगर ख़ुसरो आज अपनी जन्मस्थली में बैठे होते, तो शायद पास ही चलने वाली एनसीआर की हवा उन तक भी कुछ पैगाम जरूर पहुंचाती। नित बदलता पर्यावरण उनकी मुकरियों में भी थोड़ी जगह बना लेता और वो शायद सबसे कुछ ऐसी ही बातें कहते:
1. जब बोलों में खनक, आवाज में अटक
दिल में धक-धक, आंखों में हो लाली
ऐ सखि, इश्क का बुखार?
न सखि, प्रदूषण से बीमार
2. चेहरा था या चांद खिला, हमें देखने नहीं मिला
मन में बेचैनी, सांसों पे पहरेदारी
ऐ सखि, घूंघट?
न, मास्क का झंझट
3. ग्यारह सौ है पार, पैमाना था हजार
जनता थी तैयार, बाजारों का कारोबार
कमी रखी न कोई, जो कही कर के दिखाई
ऐ सखि, जीडीपी? न सखि, एक्यूआई
4. सिर पे बोले बम, फट-फटाक धम-धम
बैनर-आंदोलन-हड़ताल, सब पड़ गए कम
ऐ री सखि, क्या हुआ?
अरी बावरी, क्लाइमेट हुआ है धुआं-धुआं
5. इजलासें हैं, सरकारें हैं, पत्रकार हैं और संसद के मेंबर
कहते हैं देश बदल दें, हम मिनटों के अंदर
ऐ सखि! वही दिल्ली, जो है दिल वालों की?
न सखि, जले फेफड़े वालों की
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़े।
लेखक के बारे में
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अंजलि मिश्रा, आईडीआर में हिंदी संपादक हैं। इससे पहले वे आठ सालों तक सत्याग्रह के साथ असिस्टेंट एडिटर की भूमिका में काम कर चुकी हैं। उन्होंने टेलीविजन उद्योग में नॉन-फिक्शन लेखक के तौर पर अपना करियर शुरू किया था। बतौर पत्रकार अंजलि का काम समाज, संस्कृति, स्वास्थ्य और लैंगिक मुद्दों पर केंद्रित रहा है। उन्होंने गणित में स्नातकोत्तर किया है।
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कुमार उन्नयन आईडीआर में सीनियर एडिटोरियल एसोसिएट के रूप में कार्यरत हैं। वे नियमित रूप से भाषा और समुदाय से जुड़े विषयों पर काम करते रहे हैं। इस दौरान उन्होंने मौखिक इतिहास शोध, फील्ड पत्रकारिता, लेखन और अनुवाद जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई है। आईडीआर से पहले वह सेंटर फॉर कम्युनिटी नॉलेज, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एशियन स्टडीज़, नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी, कथा और द कारवां जैसे संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उन्होंने साहित्य में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है और मौखिक इतिहास में प्रशिक्षित हैं।
