छोटी संस्थाओं की बड़ी जरूरत: क्यों अहम हैं सरल डिजिटल टूल?
प्रोजेक्ट टेक4डेव सॉफ्टवेयर फर्मों, इकोसिस्टम पार्टनर्स और फंडर्स का एक समूह है, जिसे एक तकनीकी उद्यमी और परोपकारी (डोनाल्ड लोबो) द्वारा शुरू किया गया है और उनकी निजी पारिवारिक नींव, द चिंटू गुड़िया फाउंडेशन द्वारा समर्थित है। यह पहल संगठनों को किफायती कीमत पर गैर-लाभकारी संस्थाओं को अनुकूलित तकनीकी समाधान प्रदान करके कार्यक्रम के डिजाइन और कार्यान्वयन के मूल में प्रौद्योगिकी लाने में सक्षम बनाती है; ओपन सोर्स सॉल्यूशंस विकसित करना जो तब सभी के लिए एक्सेस, उपयोग और निर्माण के लिए स्वतंत्र रूप से उपलब्ध कराए जाते हैं; और सॉफ्टवेयर फर्मों का एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना और विशेष रूप से विकास क्षेत्र के लिए लक्षित उत्पादों को विकसित करने में उनका समर्थन करना।
विकास सेक्टर में सक्रिय लघु स्तर के बहुत से गैर-लाभकारी संगठन अक्सर सीमित संसाधनों के साथ काम करते हैं। हाल के वर्षों में ऐसी संस्थाओं के लिए कई तकनीक-आधारित समाधान उभरे हैं, जो उनके काम को अधिक कुशल, प्रभावी और डेटा-केंद्रित बनाने में सहायक सिद्ध हुए हैं। फिर भी इनकी संरचना, बुनियादी उद्देश्य और उन्हें अपनाने की प्रक्रिया में अनेक चुनौतियां हैं, जिन्हें गहराई से समझने और दूर करने के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने एक डिजिटल टूल के जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि:
- संस्थाएं हर स्तर पर डेटा-आधारित बनें और डेटा के आधार पर अपने निर्णय लें
- परिणामों (आउटकम्स) और प्रभाव (इंपैक्ट) का आकलन पारदर्शी हो
- प्रोग्राम मैनेजर से लेकर फील्ड वर्कर तक सभी की जरूरतों को समान रूप से संबोधित किया जाए
इस लेख में हम लघु संस्थाओं के लिए तकनीक-आधारित समाधानों से जुड़ी जरूरतों, चुनौतियों, संभावित उपायों और उनसे मिली सीख पर गौर करेंगे, जो हमारे समन्वय और अवनी के व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित हैं।
पारंपरिक प्रणालियों की चुनौती
1. कागजी दस्तावेजीकरण का सीमित दायरा
बहुत सी लघु संस्थाओं का अधिकांश काम आज भी पारंपरिक विधियों पर आधारित हैं, जहां फील्ड वर्कर कागजों में डेटा दर्ज करते हैं, जिन्हें बाद में रिपोर्ट में बदलने में कई हफ्ते लग जाते हैं। इस प्रक्रिया में न केवल समय का नुकसान होता है, बल्कि मानवीय त्रुटियां भी अपरिहार्य हो जाती हैं। जैसे – समुदाय के किसी व्यक्ति का गलत फोन नंबर दर्ज होना या तिथियों में गड़बड़ी हो जाना, जो बाद में उनसे संपर्क स्थापित करने में बाधा बनते हैं। नतीजतन, संस्थाओं को अपने रोजमर्रा के कामों में रुकावट का सामना करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए, हमारे साझेदार संगठनों में से एक संस्था प्रोजेक्ट पोटेंशियल बिहार के किशनगंज जिले में पीएमजेएवाई (प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना) के जमीनी कार्यान्वयन पर पूरी तरह कागजी दस्तावेजीकरण के तहत काम कर रही थी। इसके अंतर्गत लगभग 24 फील्ड कॉर्डिनेटरों द्वारा 12 ग्राम पंचायतों से प्राप्त 12,900 आवेदनकर्ताओं की एंट्री को तकरीबन 500-600 पन्नों में दर्ज किया जा रहा था। ऐसे में संस्था के लिए यह जानना आसान नहीं था कि किसका आयुष्मान कार्ड बन चुका है, कितने कार्ड अब भी प्रक्रिया में हैं और कितने लोग वास्तव में इसका उपयोग कर पा रहे हैं।
लेकिन जब डिजिटल दस्तावेजीकरण का इस्तेमाल किया गया, तो संस्था अपने फील्ड वर्करों के साथ यह आंकड़ा साझा करने में सक्षम हुई कि वे दैनिक रूप से कितने कार्ड बना रहे हैं और कितने कार्ड डाउनलोड कर रहे हैं। इससे उनके रोजमर्रा के काम तो आसान हुए ही, वे मापन-योग्य आंकड़ों के अनुसार अपनी प्लानिंग भी करने लगे। जैसे, अगर उनके पास छह महीने में 15,000 कार्ड बनाने का लक्ष्य है, तो वे उससे कितने दूर हैं या उन्हें अपनी योजना में क्या बदलाव करने चाहिए। इसका सीधा असर संस्था की संचालन क्षमता पर दिखा, जो 30% तक बढ़ गयी। साथ ही वास्तविक समय में डेटा ट्रेकिंग की अवधि भी सात से घटकर एक दिन हो गयी।
2. बुनियादी सुविधाओं की कमी
देश के दूर-दराज के इलाकों में बुनियादी सुविधाओं, जैसे बिजली और इंटरनेट की अनियमित उपलब्धता डिजिटल समाधानों को अपनाने में एक प्रमुख बाधा बनती है। ऐसे में अधिकांश डिजिटल टूल जो केवल ऑनलाइन मोड में काम करते हैं, इन क्षेत्रों के लिए व्यावहारिक नहीं रह जाते।

अपने शुरुआती दिनों में हमने महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में काम करने वाली एक संस्था का दौरा किया था। उन्हें डेटा ट्रैकिंग, फॉलो-अप और निर्णय लेने में सहयोग के लिए ऐसा समाधान चाहिए था, जो इंटरनेट पर निर्भर न हो। जैसे-जैसे हमने अन्य संस्थाओं से बात की, हमें समझ आया कि यह चुनौती लगभग हर उस संस्था के लिए आम है, जो ग्रामीण, दुर्गम क्षेत्रों, कस्बों या महानगरों में भी घर-घर जाकर काम करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले कुछ सालों में बिजली और इंटरनेट की उपलब्धता भले ही बेहतर हुई है, लेकिन यह अभी भी निरंतर रूप से भरोसेमंद नहीं है। ऐसे में ऑफलाइन काम करने वाले डिजिटल टूल जो डेटा संग्रह, विश्लेषण और निर्णय की पूरी प्रक्रिया में साथ न छोड़ें, कहीं अधिक व्यावहारिक और प्रभावी साबित होते हैं।
लघु संस्थाएं डिजिटल टूल अपनाते समय इन पहलुओं पर ध्यान दें
1. अपनी वास्तविक जरूरतों को समझें
लघु संस्थाओं के लिए किसी भी डिजिटल टूल को अपनाने से पहले यह बेहद जरूरी है कि वे अपनी वास्तविक जरूरतों को गहराई से समझें। किसी भी टूल का चयन करने से पहले यह जानना जरूरी है कि संस्था किस समस्या का समाधान चाहती है और उस समाधान के लिए कौन-सी डिजिटल सुविधा वास्तव में उपयोगी होगी। इससे संस्था यह पहचान सकती है कि उन्हें डिजिटल टूल में किन विशेषताओं की आवश्यकता है, जैसे:
- डेटा एंट्री के दौरान होने वाली त्रुटियों को स्पष्ट रूप से दिखाने की सुविधा।
- बीएमआई या दवा की मात्रा जैसी बुनियादी गणना करने की क्षमता।
- निर्णय लेने में सहायता करने वाले संकेतक, जैसे स्कूल ड्रॉपआउट की संभावना या उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की पहचान।
- सरल भाषा, कम संसाधनों में सुगमता से चलने वाला इंटरफेस और तकनीकी प्रशिक्षण की न्यूनतम आवश्यकता।
स्पष्ट जरूरतों की पहचान ही किसी भी सफल तकनीकी हस्तक्षेप की पहली शर्त होती है। इसलिए संस्थाओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे किसी भी टूल को अपनाते समय उसकी भाषा, डिजाइन और उपयोगिता को अपने स्थानीय संदर्भ में परखें।
2. ओपन-सोर्स टूल की प्रासंगिकता जानें
अमूमन संस्थाएं किसी सॉफ्टवेयर या एप्लिकेशन (एप) को मुहैया करवाने वाली एजेंसी, व्यक्ति या लाइसेंस से बंध जाती हैं। इसके अलावा, लघु स्तर की संस्थाओं के लिए अपने सीमित बजट के साथ एक सॉफ्टवेयर या एप में अलग से निवेश करना हमेशा संभव नहीं होता है।
ऐसे में संस्थाएं एक अच्छे ओपन-सोर्स टूल का उपयोग कर सकती हैं। ये टूल सीमित संसाधनों वाली संस्थाओं को अधिक पारदर्शी, अनुकूलनीय और सशक्त बनाते हैं। साथ ही संस्थाएं अपनी परियोजनाओं और डेटा प्रबंधन की आवश्यकताओं के अनुसार इन्हें अनुकूलित कर सकती हैं। इनके प्रयोग का एक उद्देश्य यह भी है कि संस्था किसी एक व्यक्ति या एजेंसी पर अति-निर्भर नहीं रहती है। इस पहलू को हम डिजिटल टूल के स्थाई समाधान बन जाने की तरह भी समझ सकते हैं, जिसमें ओपन-सोर्स एक अहम भूमिका निभा सकता है।
मालिकाना अधिकारों की शर्त न होने के कारण ओपन-सोर्स टूल में किसी तरह की भारी-भरकम लाइसेंसिंग कीमत भी शामिल नहीं होती है। संस्थाएं इसे चलाने के लिए किसी समझौते से बंधे रहने के लिए बाध्य नहीं होती हैं। जैसे, वे अपने डेटा के लिए सरलता से क्लाउड-होस्टिंग का विकल्प भी चुन सकती हैं। इसके अलावा, अगर कोई संस्था एक ओपन-सोर्स टूल का सफलतापूर्वक उपयोग करती है, तो अन्य संस्थाएं भी इस टूल को अपनाने के लिए प्रेरित होती हैं।
3. तकनीकी सहयोगी के साथ शुरुआत से इनपुट साझा करें
जब कोई संस्था किसी तकनीकी सहयोगी (वेंडर/प्रोवाइडर) के साथ काम करती है, तो उसके लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह केवल उपभोक्ता भर न बनी रहे बल्कि उसके चयन की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभाए। अक्सर संस्थाएं कोई आकर्षक या जटिल तकनीक अपना लेती हैं, जबकि उनकी जरूरत कहीं अधिक सरल होती है। उदाहरण के लिए, किसी संस्था के लिए एक साधारण व्हाट्सऐप चैटबॉट ही डेटा संग्रह या संवाद के लिए पर्याप्त हो सकता है, लेकिन वे किसी महंगे, अतिरिक्त फीचर्स वाले एप में निवेश कर देती हैं, जिसकी जरूरत उन्हें वास्तव में नहीं होती है।
ऐसे में संस्थाएं शुरुआती चरण में ही अपने तकनीकी साझेदार को यह सुझाव दे सकती हैं कि टूल को बहुत जटिल रूप में न विकसित किया जाए। इसके बजाय, पहले सीमित फीचर्स के साथ एक कार्यशील मॉडल तैयार किया जाए, जिसे फील्डवर्कर आसानी से अपना सकें। जब वे टूल के बुनियादी स्तर पर सहज रूप से काम करने लगें, उसके बाद वे धीरे-धीरे नए फीचर्स की ओर बढ़ सकते हैं।

निरंतर प्रतिक्रिया देने से टूल का उपयोग अधिक व्यावहारिक, प्रासंगिक और दीर्घकालिक बनता है। उदाहरण के लिए, अवनी बनाते समय हमारी टीम ने बहुत सारा समय जमीनी संस्थाओं और फील्डवर्करों के साथ बिताया। उनसे मिले इनपुट के आधार पर हमने तय किया कि हमें अपना यूजर-इंटरफेस एकदम सरल रखना है, जिसमें डेटा एंट्री के लिए कम से कम टाइपिंग की जरूरत हो। इसके अलावा हमने सिंगल और मल्टी फीचर, फॉन्ट, बटन के चयन आदि जैसे पहलुओं को बनाते समय भी उनके इनपुट पर पूरा ध्यान दिया।
4. प्लेटफॉर्म का महत्व समझें
जब लघु संस्थाएं डिजिटल टूल या सॉफ्टवेयर अपनाने की सोचती हैं, तो उनके लिए यह समझना उतना ही आवश्यक है कि वे किस प्लेटफॉर्म पर काम कर रही हैं, जितना यह जानना कि वे कौन-सा टूल वे उपयोग कर रही हैं। जिस तरह ओपन-सोर्स संस्थाओं को अपने संसाधनों पर नियंत्रण और स्वायत्तता देता है, उसी तरह एक सही प्लेटफॉर्म का चुनाव उन्हें लचीलापन, किफायत और दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है।
अक्सर संस्थाओं के कार्यक्रम अलग-अलग विषयों पर केंद्रित होते हैं। ऐसे में उन्हें अपनी हर परियोजना के लिए यह लगता है कि उन्हें एक नया डिजिटल टूल चाहिए। लेकिन यदि वे अपनी जरूरतों का गहराई से विश्लेषण करें, तो यह साफ होगा कि इन सभी कार्यों की कुछ जरूरतें साझा हैं (जैसे ऑफलाइन मोड, स्थानीय भाषा, सरल इंटरफेस आदि), और कुछ जरूरतें कार्यक्रम-विशिष्ट हैं (जैसे फॉर्म, रिपोर्ट, इंडिकेटर आदि)।
अवनी के माध्यम से हमने जाना कि यदि संस्थाएं यह समझ लें कि उनके काम का कौन-सा हिस्सा साझा है और कौन-सा विशिष्ट, तो वे बार-बार नया एप्लिकेशन बनवाने की बजाय एक साझा, कॉन्फिगरेबल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल कर सकती हैं। इससे न केवल लागत घटती है, बल्कि रखरखाव, प्रशिक्षण और अपग्रेड का काम भी सरल हो जाता है। इसलिए डिजिटल तकनीक अपनाते समय संस्थाओं को यह स्पष्ट दृष्टि रखनी चाहिए कि वे एक ऐसे लचीले और साझा प्लेटफॉर्म में निवेश कर रही हैं, जो उनके बदलते कार्यक्रमों के साथ विकसित हो सके और लंबे समय तक टिकाऊ बना रहे।
डेटा संग्रहण से निर्णय लेने तक की राह
अक्सर संस्थाओं में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत कॉर्डिनेटर या मैनेजर निर्देश जारी करते हैं और बड़े निर्णय लेते हैं। वहीं जमीनी कार्यकर्ता केवल डेटा इकट्ठा करने की भूमिका तक ही सीमित रह जाते हैं। लेकिन अगर हम जमीनी कार्यकर्ता को भी निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करें, तो प्रोग्राम के समग्र ढांचे को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी सरकारी योजना के कार्यान्वयन में आमतौर पर फील्ड वर्कर केवल लोगों का डेटा रिकॉर्ड करते हैं। लेकिन अगर उनके पास एक ऐसा सरल डिजिटल टूल हो जिसमें वे स्पष्ट रूप से अपने काम का लेखा-जोखा देख पायें, तो वे खुद अपने काम को ट्रैक करते हुए अपनी जवाबदेही तय कर सकते हैं।
संस्थाओं को हमेशा अपने फील्ड वर्करों से यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि वे एक टूल के जरिये क्या करना चाहते हैं और उनका काम किस तरह सुगम बन सकता है। जब संस्थाएं अपने फील्ड कार्यकर्ताओं की जरूरतें जानने का प्रयास करती हैं, तो उनके लिए डिजिटल टूल अपनाने की प्रक्रिया अपने आप सहज हो जाती है।

टूल का जमीनी प्रयोग जितना विविध होगा, उसे बेहतर बनाने के लिए उतनी ही अनुभवात्मक प्रतिक्रियाएं मिलेंगी। इस कड़ी में हमने शुरुआत में अपने टूल के अलग-अलग उपयोगकर्ताओं (यूजर) के साथ प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए। हमने बहुत से फील्ड वर्करों को लॉग-इन से लेकर डेटा एंट्री तक हर छोटे-बड़े पहलू को बारीकी से समझाया। उदाहरण के लिए, प्रारंभिक प्रशिक्षण सत्रों के दौरान हमने उपयोगकर्ताओं को प्ले स्टोर से ऐप डाउनलोड करने से लेकर डेटा दर्ज करने तक हर चरण विस्तार से सिखाया। ऐप के यूजर इंटरफेस में किए गए छोटे-छोटे बदलाव, जैसे अंग्रेजी और हिंदी के बीच भाषा बदलने का विकल्प, उपयोगकर्ताओं के अनुभव को कहीं अधिक सहज और सुविधाजनक बनाने में बेहद प्रभावी साबित हुए।
निर्णय लेने के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि टूल ऐसा हो जो हर चरण में सभी प्रतिभागियों से संवाद बरकरार रखे। जैसे-जैसे वे फॉर्म में आगे बढ़ते जाते हैं, एप उन्हें लगातार फीडबैक देने का काम कर सकती है। यह दोतरफा संवाद के लिए भी सहायक होता है। साथ ही, इससे एक फील्ड वर्कर को यह भी समझ में आता है कि वे जिस कार्यक्रम के तहत सर्वे या डेटा संग्रहण कर रहे हैं, उसका मूल उद्देश्य क्या है और वह कितने लोगों तक पहुंच पा रहा है। यह संस्थाओं के भीतर पदानुक्रम (हायरार्की) की तय अवधारणाओं को भी संबोधित करता है। जब आप एक फील्ड वर्कर के हाथ में एक ऐसा टूल देते हैं, जिसमें उन्हें भी कॉर्डिनेटर और मैनेजर की तरह समान डैशबोर्ड नजर आता है, तो उनके अंदर स्वामित्व की भावना को बढ़ावा मिलता है।
तकनीक और समाज का रिश्ता परस्पर है। जिन लघु संस्थाओं के लिए डिजिटल समाधान बनाए जा रहे हैं, वही इन समाधानों के शिल्पकार भी हैं। एक लघु संस्था में नेतृत्व पंक्ति के साथ-साथ फील्ड वर्कर के अनुभव, उनकी सीमाएं, सहज भाषा जैसे सभी पहलू प्रभावी तकनीकी समाधान की बुनियाद हैं। अवनी जैसे ओपन-सोर्स टूल इस विचार को आगे बढ़ाने का प्रयास हैं कि हमें संस्थाओं के काम को जटिल नहीं, सरल बनाना है और उनकी निर्णय लेने के तंत्र को केंद्रीकृत से साझी प्रक्रिया में बदलना है।
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प्रोजेक्ट टेक4डेव सॉफ्टवेयर फर्मों, इकोसिस्टम पार्टनर्स और फंडर्स का एक समूह है, जिसे एक तकनीकी उद्यमी और परोपकारी (डोनाल्ड लोबो) द्वारा शुरू किया गया है और उनकी निजी पारिवारिक नींव, द चिंटू गुड़िया फाउंडेशन द्वारा समर्थित है। यह पहल संगठनों को किफायती कीमत पर गैर-लाभकारी संस्थाओं को अनुकूलित तकनीकी समाधान प्रदान करके कार्यक्रम के डिजाइन और कार्यान्वयन के मूल में प्रौद्योगिकी लाने में सक्षम बनाती है; ओपन सोर्स सॉल्यूशंस विकसित करना जो तब सभी के लिए एक्सेस, उपयोग और निर्माण के लिए स्वतंत्र रूप से उपलब्ध कराए जाते हैं; और सॉफ्टवेयर फर्मों का एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना और विशेष रूप से विकास क्षेत्र के लिए लक्षित उत्पादों को विकसित करने में उनका समर्थन करना।
लेखक के बारे में
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अर्जुन खंडेलवाल समन्वय के सह-संस्थापक हैं, जहां वे जमीनी संगठनों के साथ मिलकर ऐसे तकनीकी समाधान विकसित और लागू करते हैं, जो उनके फील्ड कार्यक्रमों को सशक्त बनाते हैं। वे अवनि का भी नेतृत्व करते हैं, जो एक ओपन-सोर्स और आसानी से अनुकूलित होने वाला फील्डवर्क एमआईएस प्लेटफॉर्म है। स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और आजीविका जैसे कई क्षेत्रों में इसका उपयोग होता है। एक ग्रामीण अस्पताल में बहमनी के साथ उनके साल भर लंबे अनुभव ने उन्हें समुदाय-आधारित कार्यक्रमों और फील्ड स्तर की वास्तविकताओं की गहरी समझ दी। विकास सेक्टर में आने से पहले अर्जुन मीडिया, बीमा, यात्रा और कृषि-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में लगभग दस वर्ष तक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और कंसल्टिंग का अनुभव प्राप्त कर चुके हैं।
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ए. अशोक कुमार एक कंसल्टेंट और रणनीतिकार हैं, जो प्रोग्राम डिजाइन, निगरानी एवं मूल्यांकन, डेटा विजुअलाइजेशन और साझेदारी निर्माण के माध्यम से सामाजिक प्रभाव पर काम करते हैं। उन्होंने समन्वय फाउंडेशन, प्रोजेक्ट पोटेंशियल, एफएसजी और फ्रीलांस परामर्श सहित विभिन्न भूमिकाओं में शिक्षा, महिलाओं की आजीविका, स्वास्थ्य और एनजीओ क्षमता-विकास से जुड़ी कई अहम पहलों का नेतृत्व किया है। अशोक को रणनीति, डेटा-आधारित समाधान, जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन और हितधारक सहभागिता में विशेष रुचि है। वह भारत के विकास सेक्टर में सार्थक बदलाव को आगे बढ़ाने के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखते हैं।
