एक समावेशी स्कूल कैसा होना चाहिए?
साल 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 2.68 करोड़ विकलांग लोग हैं जिनमें से 20.4 लाख बच्चे हैं। इन विकलांग बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच का रास्ता कई चुनौतियों से भरा हुआ है, जिसके कारण 75 प्रतिशत बच्चे औपचारिक शिक्षा प्रणाली से बाहर रह जाते हैं।
विकलांगता से प्रभावित बच्चे जिन चुनौतियों का सामना करते हैं, उनमें मुख्य रूप से बच्चों के लिए सुलभ अध्ययन सामग्री और आधारभूत ढांचे की कमी, उनके शिक्षकों को सही और पूरा प्रशिक्षण न मिलना, नीतियों के क्रियान्वयन में खामियां और विकलांगता की उचित दर को दर्ज न किये जाने जैसी समस्याएं शामिल हैं। अधिकांश बच्चे प्राथमिक या माध्यमिक विद्यालय में पहुंचने तक स्कूल छोड़ देते हैं। जो बच्चे स्कूल में बने रहते हैं, वे भी मूलभूत अक्षर और संख्या ज्ञान (फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमरेसी – एफएलएन कौशल) हासिल नहीं कर पाते हैं।
विकलांगजन अधिकार अधिनियम (आरपीडबल्यूडी), 2016 विकलांगता से प्रभावित बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। लेकिन उक्त वजहों के चलते इसे वास्तविकता में बदल पाना आज भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। सोल्स आर्क बीते दो दशकों से विकलांगता से प्रभावित बच्चों के साथ काम कर रहा है और समावेशी शिक्षा को बढ़ावा दे रहा है। हमारे अनुभवों के आधार पर यहां कुछ सबक साझा किए गए हैं, जिनकी मदद से इन बच्चों के लिए शिक्षा को सुलभ और बेहतर बनाया जा सकता है।
शिक्षण सामग्री को सुलभ बनाना
संशोधित आरपीडबल्यूडी अधिनियम 2016 में अब 21 तरह की विकलांगताओं को मान्यता दी गई है। पहले यह संख्या केवल 7 थी। अधिनियम में प्रावधान है कि कोई व्यक्ति आवश्यक सुविधाओं और अधिकारों के लिए तभी योग्य माना जाएगा जब वह किसी विकलांगता से कम से कम 40 प्रतिशत तक प्रभावित हो। इसका मतलब है कि जिन बच्चों में इससे कम या मध्यम विकलांगता है, वे सहयोगी संसाधनों—जैसे लेखक (स्क्राइब), रीडर और सहायक उपकरण आदि से वंचित रह जाते हैं। इसके अलावा, संज्ञानात्मक विकलांगता के मामले में यह तय कर पाना लगभग असंभव होता है कि 40 प्रतिशत के स्तर का मापदंड क्या होना चाहिए? ऐसे मामलों में मापन का कोई सटीक तरीका ही उपलब्ध नहीं होता है।
विकलांगता से प्रभावित बच्चों के लिए कक्षाओं में उपयुक्त अध्ययन सामग्री की उपलब्धता भी एक बड़ी बाधा है। आम स्कूलों में अक्सर इन बच्चों के लिए संसाधन सामग्री सहजता से उपलब्ध नहीं होती है और शिक्षक सामान्य तौर पर जो सामग्री इस्तेमाल करते हैं, वह विकलांगताओं को ध्यान में रखकर नहीं चुनी या बनाई जाती है। शिक्षा से जुड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों या कक्षा-आधारित हस्तक्षेपों से मेल खाती हुई सुलभ सामग्री के अभाव में, अनेक विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति प्रभावित होती है और वे अपेक्षाकृत कमतर प्रदर्शन कर पाते हैं।

शैक्षिक संसाधन और समाधान तैयार करते समय विकलांगता से प्रभावित बच्चों को प्राथमिकता देना जरूरी है, न कि उनके बारे में बाद में सोचने की प्रवृत्ति अपनाना। उदाहरण के लिए, जब एफएलएन के लिए अध्ययन सामग्री तैयार की जा रही है (ज्यादातर राज्यों में यह प्रक्रिया अभी जारी है), तभी विकलांगता से प्रभावित बच्चों की जरूरतों का संज्ञान लेना चाहिए। सार्वभौमिक शिक्षण अभिकल्प मानकों पर आधारित सुलभ सामग्री न केवल विकलांगता से प्रभावित बच्चों के सीखने को सुदृढ़ करेगी, बल्कि उन बच्चों के लिए भी उपयोगी होगी जो सीखने की प्रक्रिया में चुनौतियों का सामना करते हैं।
शिक्षकों को पर्याप्त कौशल प्रदान करें
विकलांगता से प्रभावित बच्चों को समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता बहुत जरूरी है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में केवल 0.22 प्रतिशत शिक्षक (1:500 छात्र-शिक्षक अनुपात) ही विशेष शिक्षा देने के लिए योग्य हैं। यह अनुपात माध्यमिक स्तर पर विकलांगों के लिए समावेशी शिक्षा योजना (आईईडीएसएस) में सुझाए गए छात्र-शिक्षक अनुपात (1:5) से बहुत कम है।
विशेष शिक्षकों की कम संख्या का मतलब है कि वे किसी जरूरतमंद बच्चे से चार-छह महीने में केवल एक बार ही मिल पाते हैं। इस तरह के शिक्षण के लिए सप्ताह में दो बार मिलने और नियमित फॉलो-अप करते रहने की सलाह दी जाती है। इस प्रकार की अनियमित मुलाकातें और फॉलो-अप का अभाव बच्चे के विकास को गंभीर रूप से बाधित करता है। इसके अतिरिक्त, विशेष शिक्षकों के पास मुख्यधारा की शिक्षण पद्धतियों का सीमित ज्ञान होता है, इसलिए वे विकलांगता से प्रभावित बच्चों के प्राथमिक शिक्षक नहीं बन सकते हैं। नतीजतन, विकलांगता से प्रभावित बच्चों के साथ विशेष शिक्षकों के काम करने की यह पारंपरिक पद्धति, जिसका उपयोग भारत में अधिकांश गैर-लाभकारी संस्थाएं भी करती हैं, व्यापक स्तर पर लागू नहीं की जा सकती। साथ ही, यह अलगाव को भी बढ़ावा देती है।
जो स्कूल शिक्षक पूरी कक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं, वे विकलांगता से प्रभावित बच्चों को अधिक समय और उनके ऊपर ध्यान देने में हिचकते हैं। उन्हें लगता है कि यह काम विशेष शिक्षकों का है। विशेष शिक्षकों को समावेशी शिक्षा का प्रशिक्षण तो दिया जाता है, लेकिन ये आमतौर पर तीन दिन की छोटी वर्कशॉप होती हैं जिसमें केवल तकनीकी जानकारी होती है। जब तक यह न बताया जाए कि विकलांग बच्चों को पढ़ाना कैसे है, विकलांगताओं के बारे में केवल तकनीकी जानकारी उपयोगी नहीं होती है।
इसके अलावा शिक्षकों और विशेष शिक्षकों के बीच भी इस बात को लेकर तालमेल की कमी रहती है कि बच्चों की प्रगति पर नजर रखने के लिए साझी योजना कैसे बनाई जाए। नतीजतन, शिक्षक अक्सर विकलांग बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं। अक्सर इसलिए नहीं कि वे पढ़ाना नहीं चाहते, बल्कि इसलिए कि वे जानते ही नहीं कि प्रभावी रूप से कैसे पढ़ायें।
इस भारी कमी को दूर करने के लिए हमें इस पूरी व्यवस्था में एक अतिरिक्त परत जोड़ने की जरूरत है, जो विकलांगता से प्रभावित बच्चों की शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ सके। यह काम एक अलग-थलग और स्वतंत्र रूप से किए जाने वाले हस्तक्षेप से नहीं हो सकता है।
इसे साकार करने के लिए हमें तीन-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है
पहला, शिक्षकों को कक्षा के हर बच्चे की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। ‘विशेष जरूरतों वाले बच्चों को पढ़ाने’ की सोच से आगे बढ़कर ‘अपनी कक्षा के हर बच्चे को पढ़ाने,’ की ओर बढ़ना प्रभावी हो सकता है। यह विकलांगता से जुड़ी रूढ़ियों को तोड़ने में मदद करता है और इससे अलगाव के बजाय समावेशन को बढ़ावा मिलता है। जब अलग-थलग समाधान बनाए जाते हैं तो बच्चे तक यह संदेश पहुंचता है कि वह सामान्य ढांचे का हिस्सा नहीं है और यह विषय उसकी क्षमता से बाहर है।
दूसरा, शिक्षकों को ऐसा व्यावहारिक ज्ञान और उपयोगी रणनीति प्रदान की जानी चाहिए, जिनसे वे विकलांगता से प्रभावित बच्चों के सीखने को अधिक प्रभावी ढंग से सुगम बना सकें। उदाहरणस्वरूप, किसी खेल की गतिविधि के लिए निर्देश देते समय शिक्षक विजुअल माध्यम (कार्ड या नोट्स) का उपयोग कर सकते हैं, ताकि सभी छात्र, विशेषकर सुनने की बाधा से प्रभावित बच्चे, निर्देशों को स्पष्ट रूप से समझ सकें।
तीसरा, विकलांगता से प्रभावित बच्चों की प्रगति पर नजर रखने के लिए विशेष शिक्षकों और नियमित शिक्षकों, दोनों को शामिल करना बेहद जरूरी है। विशेष शिक्षक अक्सर बच्चों से नियमित रूप से नहीं मिल पाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि उन्हें ऐसे विशेषज्ञ के रूप में देखा जाए, जो सीधे बच्चों के साथ काम करने के बजाय शिक्षक का सहयोग करेंगे। हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें शिक्षक और विशेष शिक्षक के बीच बच्चे के विकास को लेकर नियमित और खुली बातचीत का मार्ग प्रशस्त हो पाए।
सुनिश्चित करें कि नीतियां जमीन पर लागू हों
दुनिया भर में विकलांगता समावेशन के लिए भारत की नीतियां बेहतरीन मानी जाती हैं, लेकिन मंत्रालयों के बीच सहयोग की कमी और डेटा के अभाव के कारण इनका जमीनी क्रियान्वयन कमजोर रह जाता है।
उदाहरण के लिए, समग्र शिक्षा सरकार का एक व्यापक स्कूल शिक्षा कार्यक्रम है। इसे विभिन्न मंत्रालयों के बीच सहयोग और साझेदारी बढ़ाने के लिए बनाया गया था। यद्यपि अधिकांश विभाग समावेशन को ध्यान में रखते हुए विकलांगता संबंधी लाभों का प्रावधान करते हैं, लेकिन इनके बीच समन्वय की कमी स्पष्ट तौर पर नजर आती है।
तमिलनाडु के आईटी, शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें हर बच्चे के स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, विकलांगता और पोषण की जांच की जाती है।
उदाहरण के तौर पर, स्वास्थ्य विभाग शून्य से तीन वर्ष की आयु तक के अधिकांश बच्चों की जांच कर विकलांगताओं की पहचान कर लेता है। लेकिन अमूमन यह जानकारी शिक्षा विभाग तक प्रेषित ही नहीं होती। नतीजतन, जब बच्चे स्कूल पहुंचते हैं, तो शिक्षकों के पास आवश्यक डेटा उपलब्ध नहीं होता और वे यह भी नहीं जान पाते कि उनकी कक्षा में किन विद्यार्थियों को विकलांगता से संबंधित सहायता की आवश्यकता है। यदि मंत्रालयों के बीच डेटा साझाकरण को सक्षम बनाया जाए, तो अधिक व्यापक स्क्रीनिंग और निदान संभव हो सकेगा। साथ ही यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि प्रत्येक बच्चे को समय पर उपयुक्त संसाधन प्राप्त हों।
सटीक आंकड़ों की कमी एक बड़ी नीतिगत चुनौती होने के साथ-साथ संसाधनों के गलत या कम आवंटन की वजह भी बन जाती है। पिछली जनगणना के बाद विकलांगता से प्रभावित लोगों से जुड़े नए आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण उनका संज्ञान लेने में बड़ी कमी रह गई है और हम अभी भी सही आंकड़े नहीं जानते हैं। विश्व बैंक का अनुमान है कि भारत में विकलांगता से प्रभावित लोगों की वास्तविक संख्या 8-9 करोड़ तक हो सकती है।
राह दिखाता तमिलनाडु
इस मुद्दे से जुड़ी तमाम बातों के मद्देनजर, सोल्स आर्क ने तमिलनाडु सरकार के साथ मिलकर एक ऐसी एप का निर्माण किया है, जो इन चुनौतियों को हल करने में मदद करती है। इस ऐप में विकलांग बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा के लिहाज से जरूरी तीन बातें शामिल हैं।
1. समग्र स्क्रीनिंग का प्रावधान
तमिलनाडु के आईटी, शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें हर बच्चे के स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, विकलांगता और पोषण की जांच की जाती है। जांच के बाद जोखिमग्रस्त बच्चों को चिन्हित किया जाता है और आगे की जांच के लिए भेजा जाता है। उन्हें जरूरत के मुताबिक सेवाओं से भी जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिए अगर एक बच्चे को करेक्टिव सर्जरी की जरूरत है तो सरकार उस बच्चे को यह सुविधा दिलवाने के लिए जिम्मेदार होती है। इस साल तमिलनाडु में 50 लाख बच्चों की जांच की जा चुकी है।
2. सरल एफएलएन सामग्री की उपलब्धता
राज्य में एफएलएन कार्यक्रम से जुड़ी सुलभ शिक्षण सामग्री तैयार की गई है, जिसे पूरे राज्य में विकलांग बच्चों तक पहुंचाया जा रहा है। चूंकि ये सामग्री कक्षा में इस्तेमाल होने वाली मुख्यधारा की सामग्री से मेल खाती है, इसलिए शिक्षकों के लिए विकलांगता से प्रभावित बच्चों को पढ़ाई में शामिल करना आसान हो जाता है। निरंतर मूल्यांकन (फॉर्मेटिव असेसमेंट) को भी बच्चों के लिए सुलभ बनाया गया है और शिक्षक हर हफ्ते इनका रिकॉर्ड रखते हैं। कई शिक्षकों का मानना है कि इन प्रयासों के चलते बच्चों में बड़े बदलाव देखें जा रहे हैं। थेनी जिले के एक शिक्षक बताते हैं कि “मेरा छात्र अब कक्षा की गतिविधियों में कहीं ज्यादा सक्रिय रहताहै और उनमें भाग लेता है।”
3. शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण
शिक्षक पुस्तिकाओं में 21 प्रकार की विकलांगताओं से जुड़ी जानकारियां तस्वीरों समेत शामिल की गई हैं। ऐप में ई-मॉड्यूल भी हैं, जो बताते हैं कि विकलांग बच्चों को व्यावहारिक तरीके से कैसे पढ़ाया जाए। ये समाधान सरल हैं और किसी तरह की असिस्टिव टेक्नॉलजी पर निर्भर नहीं हैं,जो फिलहाल भारत में बड़े पैमाने पर उपलब्ध भी नहीं है। इस मॉडल में कम लागत और कम तकनीक वाले उपायों को प्राथमिकता दी गई है।
तमिलनाडु का समावेशी स्कूलिंग मॉडल ऐसा उदाहरण है जिसे पूरे देश में अपनाया जा सकता है। यह एक कारगर मॉडल और अन्य राज्य आसानी से इसे अपना सकते हैं। इसके लिए बस राजनीतिक इच्छाशक्ति और सरल तकनीक का समझदारी से इस्तेमाल करने की जरूरत है।
अलगाव नहीं, समावेश में है समाधान
जब हम विकलांगता से प्रभावित लोगों के समावेश की बात करते हैं, तो इसे किसी अलग श्रेणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे सामाजिक ताने-बाने के एक सूत्र की तरह देखना चाहिए। मुख्यधारा की हर योजना में विकलांगता से प्रभावित लोगों के लिए कोई न कोई प्रावधान रखा जाना चाहिए। यह जिम्मेदारी सरकारों, उद्यमों और गैर-लाभकारी संस्थाओं को मिलकर निभानी होगी।
यह कोई अपवाद नहीं है। लैंगिक समावेशन के मामले में जो नजरिया अपनाया जाता है, वह विकलांगता के मामले में भी उदाहरण बन सकता है। उदाहरण के लिए, लैंगिक समानता से जुड़े समाधान तैयार करते समय महिलाओं के लिए अलग से कुछ करने के बजायमातृत्व अवकाश, लचीले कामकाजी घंटे और सुरक्षित परिवहन जैसी बातों को कार्यस्थल में शामिल करने पर जोर दिया जाता है। इसी तरह, विकलांगता को लेकर भी हमें इस दिशा में सोचना और काम करना है कि कैसे विकलांगता से प्रभावित बच्चों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए एक अलग समाधान बनाने की जगह मौजूदा व्यवस्था में ही एक अतिरिक्त परत जोड़ी जा सकती है।
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।
—
अधिक जानें
- जानिए, विकलांगता से प्रभावित बच्चों तक जरूरी संसाधन क्यों नहीं पहुंच पाते हैं।
- जानिए, कार्यस्थल पर अदृश्य विकलांगता से जूझ रहे कर्मचारियों को सहयोग देना।
- जानिए, स्कूलों को समावेशी बनाने से जुड़ी यूनीसेफ गाइड क्या कहती है।
अधिक करें
- सोल्स आर्क के काम के बारे में विस्तार से जानने के लिए उनसे sols.arc@solsarc.ngo पर संपर्क करें।
लेखक के बारे में
-
सोनाली सैनी, सोल्स आर्क की संस्थापक हैं। यह एक गैर-लाभकारी संगठन है जो वंचित वर्ग के बच्चों के सामने आने वाली शिक्षा से जुड़ी चुनौतियों के समावेशी समाधान खोजने पर काम करता है। सोल्स आर्क, राज्य सरकारों के साथ मिलकर बच्चों के लिए मूलभूत शिक्षा परिणामों से सुधार लाने पर काम करता है, जिसमें विकलांगता से प्रभावित बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सोनाली ने स्पेशल एजुकेशन में मास्टर्स किया है और वह समावेशी शिक्षा पद्धतियों में विशेषज्ञता रखती हैं।
