इम्पैक्ट, उम्मीद और एक प्लेलिस्टः नये साल में बस काम चलता रहे
सोशल सेक्टर में काम करना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि वक्त के साथ चलते रहने वाला एक भावनात्मक सफर भी है। जब सिस्टम से जूझते हुए उम्मीद बनाए रखना और भी मुश्किल लगने लगता है, तब थोड़ा ठहरना जरूरी हो जाता है। ऐसे में संगीत कई बार सबसे सुलभ और सबसे ईमानदार सहारा बन जाता है। इस नए साल में एक प्लेलिस्ट, जो हमें चलते रहने की वजह याद दिलाती रहती है।
1. युवा वॉलंटियर्स
सुनें: गिव मी सम सन शाइन- थ्री इडियट्स
फॉर्म भरते-भरते, मीटिंग में बैठे-बैठे वॉलंटियर्स सोच रहे होते हैं- “सब होगा बस थोड़ा वक्त लगेगा!”
2. समुदाय
सुनें: तू किसी रेल सी गुजरती है- मसान
आम लोगों की खामोशी, पीड़ा, सपने और संघर्ष सोशल सेक्टर का केंद्र हमेशा समुदाय होता है।
3. फील्ड वर्कर्स
सुनें: जिंदा- भाग मिल्खा भाग
सीमित संसाधन, कठिन हालात और थकान के बावजूद अंदर से एक ही आवाज हर हाल में जीना है।
4. पॉलिसी मेकर्स
सुनें: तेरा रंग ऐसा चढ़ गया कोई और रंग न चढ़ सके- सत्यमेव जयते
सामाजिक न्याय और नैतिक नीतियां तभी फलती हैं जब नीति निर्माता आशावादी, साहसी और बहुत जरूरी ईमानदार हो।
5. फंडर्स
सुनें: भारत हमको जान से प्यारा है- रोजा
भारत हमको जान से प्यारा है लेकिन रिपोर्ट सब्मिट करने के बाद क्योंकि देश प्रेम का असली सबूत इन्हें रिपोर्ट में ही नजर आता है।
6. एक्टिविस्ट
सुनें: हम देखेंगें – फ़ैज़ अहमद फै़ज़, इकबाल बानो
लेकिन ट्रायल, कोर्ट, ट्रोल्स, रेड्स और ब्यूरोकेसी भी साथ में देखेंगे।
7. सोशल एंटरप्रोन्योर
सुनें: अपना टाइम आएगा- गली बॉय
पिच तैयार, कम्यूनिटी में चर्चा पूरी, प्रोजेक्ट मॉडल तैयार लेकिन नये नियम अनुसार….प्लीज अपलोड मोर डीटेल्स।
8. एंथम ऑफ द ईयर
सुनें: आजादियां- उड़ान
बदलाव सिर्फ नीतियों से नहीं सोच से शुरू होता है और विकास सेक्टर में सोच तब बदलती है जब फाइलें आगे न बढ़ें, फंड अगले क्वार्टर में आए तो इसके लिए बस आजादियां गुनगुनाइये।
लेखक के बारे में
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पूजा राठी आईडीआर हिंदी में संपादकीय विश्लेषक (एडिटोरियल एनालिस्ट) हैं। इससे पहले, उन्होंने फेमिनिज़्म इन इंडिया में सह-संपादक के रूप में काम किया है, जहां उन्होंने जेंडर, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को कवर किया। पूजा को यूएन लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया है और वह 2024 की लाडली मीडिया फैलो भी रह चुकी हैं। इसके अलावा, वह खबर लहरिया की रूरल मीडिया फेलोशिप और एटलस फॉर बिहेवियर चेंज इन डेवलपमेंट की बिहेवियरल जर्नलिज़्म फेलोशिप की पूर्व फेलो रह चुकी हैं। पूजा ने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है।
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सलोनी सिसोदिया आईडीआर में मल्टीमीडिया एनालिस्ट हैं। इससे पहले उन्होंने फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ सीनियर डिजिटल एडिटर के रूप में भी काम किया है तथा जेंडर, कल्चर, समाज और सिनेमा जैसे विषयों पर मुख्य तौर पर अनुभव रखती हैं। सलोनी ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपनी पढ़ाई की है। वह फोटो निबंध, फोटोग्राफी और ट्रेवल करने में ख़ास रूचि रखती हैं।
