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भारत की पंचायती राज व्यवस्था की स्थिति

पंचायती राज मंत्रालय ने “स्टेटस ऑफ डीवोल्यूशन टू पंचायत्स इन स्टेट्स-एन इंडिकेटिव एविडेंस बेस्ड रैंकिंग” नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट विभिन्न संकेतकों के आधार पर यह आकलन करती है कि राज्यों ने पंचायतों को स्वशासी संस्थाओं के रूप में कार्य करने के लिए कितना सक्षम वातावरण तैयार किया है।
27 जनवरी 2026 को प्रकाशित

पंचायतें ग्रामीण भारत में लोगों की अपनी स्थानीय सरकार होती हैं। इन्हें 1993 में 73वें संविधान संशोधन के जरिए कानूनी मान्यता मिली। देश में सरकार तीन स्तरों पर काम करती है यानि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और गांव की पंचायत। पंचायत गांव के स्तर पर लोगों से जुड़े फैसले लेती है और अपना काम राज्य सरकार की मदद से करती है। केंद्र सरकार भी पंचायतों को मजबूत बनाने में राज्यों की सहायता करती है, ताकि गांवों तक सरकारी सुविधाएं ठीक से पहुंच सकें।

पंचायती राज मंत्रालय ने “स्टेटस ऑफ डीवोल्यूशन टू पंचायत्स इन स्टेट्स-एन इंडिकेटिव एविडेंस बेस्ड रैंकिंग” नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसे पंचायत डिवोल्यूशन इंडेक्स 2024 भी कहा जाता है। यह रिपोर्ट विभिन्न संकेतकों के आधार पर यह आकलन करती है कि राज्यों ने पंचायतों को स्वशासी संस्थाओं के रूप में कार्य करने के लिए कितना सक्षम वातावरण तैयार किया है।

पंचायतों और नगरपालिकाओं का उद्देश्य पूरे जिले के लिए एक मसौदा विकास योजना तैयार करना है। | चित्र सभार: यूएन वूमन एशिया एंड पेस्फिक/ सीसी बीवाई

इस अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य थे:

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी
  • राज्यों द्वारा विकेंद्रीकरण को किस हद तक प्रभावी ढंग से लागू किया जा रहा है, इसका आकलन करना। इसमें 11वीं अनुसूची में सूचीबद्ध 29 विषयों जैसे कृषि, ग्रामीण अवसंरचना और शिक्षा से संबंधित कार्यों, संस्थानों, अधिकारी-कर्मचारी और वित्तीय संसाधनों का पंचायती राज संस्थाओं को हस्तांतरण शामिल है।
  • इस आधार पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) की रैंकिंग तैयार करना कि वे पंचायतों को शक्तियों और संसाधनों का हस्तांतरण कितने प्रभावी ढंग से कर रहे हैं।

अध्ययन के लिए सभी राज्यों को भेजी गई एक प्रश्नावली के माध्यम से डेटा एकत्र किया गया, साथ ही राज्यों से प्राप्त जानकारी को पूरक बनाने या उसकी पुष्टि करने के लिए फील्ड से भी डेटा जुटाया गया।

अध्ययन में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया, सिवाय निम्नलिखित के:

  • मेघालय, मिज़ोरम और नागालैंड, जहां संविधान का भाग-IX लागू नहीं होता क्योंकि ये आदिवासी क्षेत्र हैं (अनुच्छेद 243M)।
  • दिल्ली, जहां 1990 में पंचायतों को समाप्त कर दिया गया था, और चंडीगढ़, जहां पंचायतें मौजूद ही नहीं हैं।
  • अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर, मणिपुर में हुए दंगों और अशांति के कारण
  • लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली, तथा दमन और दीव, जहां अद्यतन डेटा उपलब्ध नहीं कराया गया।
पंचायत हस्तांतरण_पंचायती राज व्यवस्था

अध्ययन में प्रत्येक राज्य का छह आयामों के आधार पर मूल्यांकन किया गया और सभी आयामों के अंकों को मिलाकर डिवोल्यूशन इंडेक्स तथा राज्यवार रैंकिंग तय की गई।

प्रदर्शन के आकलन के साथ-साथ, रिपोर्ट में बेहतर अंक हासिल करने के लिए सुझाव भी दिए गए हैं। यहां बताया गया है कि हर आयाम का मतलब क्या है, उन पर राज्यों का प्रदर्शन कैसा रहा है और रिपोर्ट क्या सिफारिशें करती है।

1. ढांचा

यह आयाम उन कानूनी जरूरतों का मूल्यांकन करता है जिन्हें राज्य सरकारों को पंचायतों के लिए पूरा करना होता है। इसमें यह शामिल है कि पंचायत चुनाव नियमित रूप से हो रहे हैं या नहीं, महिलाओं, अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए सीटें आरक्षित हैं या नहीं, और राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी), राज्य वित्त आयोग (एसएफसी) तथा जिला योजना समितियां (डीपीसी) बनाई गई हैं या नहीं। जो राज्य इन शर्तों को पूरा नहीं करते, उन्हें इस अध्ययन में शामिल नहीं किया गया।

कुल मिलाकर, केरल 83.56 अंकों के साथ पहले स्थान पर है। इसके बाद महाराष्ट्र (74.74), कर्नाटक (74.43) और हरियाणा (73.3) का स्थान है। उत्तराखंड, त्रिपुरा, सिक्किम और हिमाचल प्रदेश भी उन राज्यों में शामिल हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय औसत 54.3 से अधिक अंक हासिल किए हैं। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह एकमात्र केंद्र शासित प्रदेश है, जिसने राष्ट्रीय औसत से ऊपर अंक प्राप्त किए हैं।

पंचायत ढांचा आयाम_पंचायती राज व्यवस्था

इस आयाम को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं:

  • सभी राज्यों को महिलाओं, अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए सीटों का आरक्षण बनाए रखना चाहिए। वास्तव में, अधिकतर राज्यों ने आरक्षण का कोटा कुल सीटों के एक-तिहाई से बढ़ाकर आधा कर दिया है। लेकिन यह जरूरी है कि आरक्षित सीटों पर चुने गए प्रतिनिधियों को उसी क्षेत्र में अधिक समय तक काम करने का अवसर मिले, ताकि वे ज्यादा प्रभावी ढंग से काम कर सकें।
  • पंचायतों और नगर निकायों को अनिवार्य रूप से पूरे जिले के लिए एक प्रारूप विकास योजना तैयार करनी होती है। इस योजना को जिला योजना समिति (डीपीसी) द्वारा एकीकृत किया जाता है और फिर राज्य सरकार को भेजा जाता है, ताकि इसे राज्य की योजना में शामिल किया जा सके। इससे जिले की विकास जरूरतों और संभावनाओं की पूरी तस्वीर सामने आती है और संसाधनों का अधिक प्रभावी तरीके से वितरण करने में मदद मिलती है। हालांकि, रिपोर्ट में पाया गया कि लगभग सभी राज्यों में जिला योजना समितियां बनी हुई हैं, लेकिन इतनी विस्तृत जमीनी स्तर की योजना बहुत कम जगहों पर ही की जाती है। जिला योजना समितियों के गठन और उनके कामकाज के मामले में केरल और राजस्थान का स्कोर सबसे अधिक है, इसके बाद सिक्किम का स्थान है। राज्य और राष्ट्रीय स्तर की नीतियों में तालमेल बनाए रखने के महत्व को देखते हुए, एक संस्थागत ढांचा तैयार करने की आवश्यकता है, ताकि सभी राज्यों में नियमित रूप से जिला योजना को औपचारिक रूप दिया जा सके।

2. कार्य

यह आयाम इस बात का मूल्यांकन करता है कि राज्य सरकारों ने पंचायतों को कौन-कौन से कार्य सौंपे हैं, और केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा बनाई गई सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास से जुड़ी योजनाओं को लागू करने में पंचायतों की भूमिका क्या है। कुल मिलाकर, तमिलनाडु 60.24 अंक के साथ पहले स्थान पर है। इसके बाद कर्नाटक (57.62), ओडिशा (57.46) और राजस्थान (56.13) का स्थान है।

सिक्किम 42.59 अंकों के साथ पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के समूह में एकमात्र राज्य है, जिसने राष्ट्रीय औसत 29.18 से अधिक अंक प्राप्त किए हैं। इस समूह में पूर्वोत्तर के सभी राज्यों सहित हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं। किसी भी केंद्र शासित प्रदेश ने राष्ट्रीय औसत से ऊपर अंक नहीं पाए हैं। हालांकि यह आयाम स्थानीय स्वशासन की बुनियाद माना जाता है, फिर भी सभी आयामों में इसका राष्ट्रीय औसत सबसे कम है।

पंचायत कार्य आयाम_पंचायती राज व्यवस्था

डेटा को अलग-अलग करके देखने पर रिपोर्ट में ये बातें सामने आईं:

  • पंचायतें विभिन्न योजनाओं के लक्षित लाभार्थियों की पहचान करने और योजनाओं को लागू करने जैसी भूमिकाओं में कितनी सक्रिय हैं, इसके आधार पर शीर्ष स्थान पाने वाले राज्य तमिलनाडु, राजस्थान और ओडिशा हैं। अनुच्छेद 243जी के अनुसार, 11वीं अनुसूची में शामिल विषयों पर केंद्र क्षेत्र की योजनाओं (सीएसएस) को लागू करने में पंचायतों की भूमिका केंद्रीय होती है। इसलिए, सीएसएस में पंचायतों की भूमिका को बेहतर तरीके से जोड़ने की जरूरत है।
  • अध्ययन में पाया गया कि कुछ अर्ध-सरकारी संस्थाएं जो आंशिक या पूरी तरह से राज्य के स्वामित्व में होती हैं — 11वीं अनुसूची में पंचायतों के लिए तय किए गए क्षेत्रों में काम कर रही हैं। इससे पंचायतों को उनके अधिकार और जिम्मेदारियां पूरी तरह नहीं मिल पातीं। इसलिए अध्ययन की सिफारिश है कि केंद्र और राज्य सरकारों की सभी धनराशि समानांतर संस्थाओं को देने के बजाय सीधे पंचायतों को दी जानी चाहिए, ताकि उनका कामकाज प्रभावी हो सके। जवाबदेही बढ़ाने के लिए हर योजना में ऐसे दिशा-निर्देश होने चाहिए, जिनके तहत राज्यों के माध्यम से सीएसएस की राशि को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से पंचायतों तक ट्रैक किया जा सके।
  • ग्राम पंचायत (जीपी) स्तर पर अलग-अलग सरकारी विभाग अपने-अपने विकास कार्यक्रम चलाते हैं। लेकिन ये प्रयास अक्सर अलग-अलग ढंग से होते हैं, जिससे दोहराव होता है और आपसी तालमेल की कमी रहती है। ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) इसी समस्या को दूर करने के लिए बनाई गई है। यह एक ऐसा समग्र और एकीकृत दस्तावेज है, जिसमें पंचायत की जरूरतों और प्राथमिकताओं की पूरी तस्वीर सामने आती है। आदर्श रूप से, श्रम सहित विभिन्न विभागों की योजनाएं और बजट जीपीडीपी के अनुसार तय होने चाहिए, भले ही उनका वास्तविक क्रियान्वयन उन्हीं विभागों द्वारा किया जाए। यह एकीकृत योजना न केवल सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों से वित्तीय सहायता आकर्षित करने में भी मदद करती है और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग को मजबूत करती है।

3. वित्त

यह आयाम कई संकेतकों पर आधारित है, जैसे:

  • पंचायतों को 15वें वित्त आयोग की अनुदान राशि का समय पर जारी होना
  • राज्य वित्त आयोग (एसएफसी) का नियमित और प्रभावी रूप से काम करना
  • एसएफसी के माध्यम से पंचायतों को धन का हस्तांतरण
  • राजस्व एकत्र करने की शक्ति
  • पंचायतों के पास उपलब्ध धनराशि
  • राज्य के कुल सार्वजनिक व्यय में पंचायतों के खर्च का प्रतिशत
  • लेखा-जोखा और बजट

इस उप-सूचकांक में उन्नीस राज्य राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। कर्नाटक 70.65 अंकों के साथ पहले स्थान पर है। इसके बाद केरल (62.89), तमिलनाडु (55.78) और राजस्थान (54.56) का स्थान है।

पंचायत वित्त आयाम_पंचायती राज व्यवस्था

पंचायतें अपने धन का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकें, इसके लिए राज्य सरकारों को बिना किसी अस्पष्ट शर्त के समय पर धनराशि जारी करनी चाहिए। यदि राज्य बिना खर्च हुई राशि अपने पास रोक लेते हैं, तो इससे विकेंद्रीकृत लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है और पंचायतों की निर्णय लेने की शक्ति भी कम हो जाती है।

जब पंचायतों और नगर निकायों को मिलने वाला वैधानिक हस्तांतरण (जैसे वित्त आयोग द्वारा सुझाया गया धन) राज्यों को पैसा मिलने के बाद किया जाता है, तो स्थानीय सरकारें आर्थिक रूप से राज्यों पर निर्भर हो जाती हैं और अक्सर उन्हें पर्याप्त धन नहीं मिल पाता। इस समस्या का समाधान करने के लिए, भारत की समेकित निधि (कंसॉलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया), जिसके माध्यम से राज्यों को धन मिलता है और वही धन पंचायतों तक पहुंचाया जाता है, उसमें संशोधन किया जाना चाहिए, ताकि पंचायतों और नगर निकायों को भी इसके दायरे में शामिल किया जा सके।

4. कार्मिक

इस आयाम में जिन प्रमुख संकेतकों का विश्लेषण किया गया है, वे हैं:

  • पंचायतों का भौतिक ढांचा
  • उनकी ई-कनेक्टिविटी
  • पंचायत के अधिकारी
  • स्वीकृत और वास्तविक स्टाफ

इस श्रेणी में गुजरात 90.94 अंकों के साथ सबसे ऊपर है। तमिलनाडु 84.25 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर है, और केरल 82.99 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर है।

पंचायत कार्मिक आयाम_पंचायती राज व्यवस्था

यहां इन संकेतकों से जुड़े कुछ पहलू और उनसे संबंधित सुझाव दिए गए हैं:

  • पंचायतों की प्रशासनिक दक्षता के लिए भौतिक ढांचा बहुत महत्वपूर्ण है। पंचायतों को अपने कार्यों को सही और प्रभावी ढंग से करने के लिए उचित कार्यालय भवन, कंप्यूटर और आधुनिक संचार सुविधाओं की आवश्यकता होती है। इस मामले में गुजरात और पश्चिम बंगाल आगे हैं। इनके बाद कर्नाटक, केरल और उत्तर प्रदेश आते हैं, जहां भौतिक ढांचे और इंटरनेट कनेक्टिविटी के विकास में काफी प्रगति हुई है। लेकिन अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, ओडिशा, पंजाब और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को पंचायतों के बेहतर संचालन के लिए अपने ढांचे के विकास पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
  • पंचायतों को तकनीक के साथ भी कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए। सुचारू कामकाज के लिए व्यावसायिक प्रक्रियाओं में डिजिटलीकरण जरूरी है, जैसे वायरलेस कनेक्टिविटी और ई-मेल आईडी होना, सेवा देने के लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग करना और वित्तीय डेटा अपलोड करना, पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित अधिकारी होना, तथा कंप्यूटरीकरण, सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन को अपनाने और सॉफ्टवेयर विकास के लिए लगातार तकनीकी सहयोग मिलना।

5. क्षमता वृद्धि

यह आयाम यह देखने में मदद करता है कि राज्य पंचायतों को मजबूत बनाने और उन्हें स्वशासी संस्थाओं की तरह काम करने में सक्षम बनाने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं। इसमें मुख्य तौर पर प्रशिक्षण संस्थानों और निर्वाचित प्रतिनिधियों व अधिकारियों के लिए चलाए जाने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों का मूल्यांकन किया गया है। इसमें तेलंगाना 86.19 अंकों के साथ पहले स्थान पर है। इसके बाद तमिलनाडु 84.29 अंकों और गुजरात 83.96 अंकों के साथ हैं। कुल मिलाकर सत्रह राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेश – जम्मू और कश्मीर तथा अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह – राष्ट्रीय औसत 54.63 से ऊपर अंक प्राप्त कर चुके हैं।

पंचायत क्षमता वृद्धि_पंचायती राज व्यवस्था

पंचायत सदस्यों का प्रशिक्षण उनकी क्षमता बढ़ाने में बहुत महत्वपूर्ण है और यह पंचायतों की कुल प्रभावशीलता में अहम भूमिका निभाता है। राज्य और पंचायत स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों और अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण संस्थान बेहद जरूरी हैं। कई कारण, जैसे शिक्षा की कमी और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का अभाव, पंचायत सदस्यों और अधिकारियों के कामकाज में बाधा डालते हैं।

इस आयाम में राज्यों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए प्रशिक्षण ढांचे में निवेश बढ़ाना जरूरी है। इसमें योग्य प्रशिक्षकों, कंप्यूटर, प्रशिक्षण केंद्रों में सैटेलाइट संचार सुविधाएं, आवासीय प्रशिक्षण सुविधाएं, सहभागी और विशेषीकृत तरीके, और पंचायत सदस्यों व अधिकारियों की सीखने की जरूरतों के अनुरूप अनुकूलित प्रशिक्षण सामग्री शामिल होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, स्थानीय भाषाओं में सामग्री उपलब्ध कराना और ऐसी फॉर्मेट में देना जो सभी के लिए सुलभ हो।

6. जवाबदेही

जवाबदेही एक महत्वपूर्ण आयाम है, जो यह सुनिश्चित करता है कि पंचायतें लोगों के प्रति जवाबदेह हों और ईमानदारी और कुशलता से काम कर रही हों। इस आयाम में कई संकेतक शामिल हैं:

कर्नाटक इस आयाम में सबसे आगे है, 81.33 अंकों के साथ। इसके बाद केरल (81.18), महाराष्ट्र (80.36) और उत्तर प्रदेश (76.07) का स्थान है।

पंचायत जवाबदेही आयाम_पंचायती राज व्यवस्था

रिपोर्ट द्वारा दी गई सिफारिशें:

  • जवाबदेही बढ़ाने के लिए, पंचायतों को जरूरी रिकॉर्ड बनाए रखना चाहिए, जैसे डिजिटल डेटा, संपत्ति रजिस्टर, मांग और संग्रह रजिस्टर, और अनुदान रजिस्टर। उन्हें प्रदर्शन मूल्यांकन जैसी जवाबदेही प्रणाली लागू करनी चाहिए, ताकि सदस्य अपनी जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभा सकें। केंद्र सरकार को राज्यों को प्रोत्साहन या पुरस्कार प्रणाली के माध्यम से यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित करना चाहिए कि पंचायत के सभी स्तरों पर जवाबदेही तंत्र स्थापित किया जाए।
  • सामाजिक ऑडिट नियमित रूप से किया जाना चाहिए, ताकि पंचायत न केवल राज्य के प्रति बल्कि स्थानीय निवासियों के प्रति भी जवाबदेह हो। मनरेगा, पीएमएवाय, एसएसए, आईसीडीएस और एएवाय जैसी योजनाओं में सामाजिक ऑडिट और इसके संचालन के लिए ग्राम सभा और अन्य प्रावधान हैं, ताकि इन योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन हो सके।

यदि पंचायतें अपने संवैधानिक वादे को पूरा करना चाहती हैं, तो राज्यों को केवल दिखावे के लिए सत्ता हस्तांतरण नहीं करना चाहिए, बल्कि इंडेक्स में आकलित सभी छह आयामों को मजबूत करने के ठोस कदम उठाने चाहिए। इसके लिए लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति, मजबूत संस्थागत ढांचे और शासन के हर स्तर पर सक्रिय सामुदायिक भागीदारी की आवश्यकता है।

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