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नेतृत्व और हुनर

विकास सेक्टर में नेतृत्व परिवर्तन: कब, क्यों और कैसे?

सामाजिक संस्थाओं में नेतृत्व परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। यह प्रकिया व्यक्ति और संस्था, दोनों के बीच आकार लेती है। नेतृत्व की पहचान के लिए संस्था को बहुत धैर्य और खुले विचारों के साथ आगे बढ़ना आवश्यक है।
28 जनवरी 2026 को प्रकाशित

पिछले तीन-चार दशकों में सामाजिक और विकास क्षेत्र की संस्थाएं बहुत तेजी से बढ़ी हैं। अधिकांश संस्थाएं सत्तर-अस्सी के दशक के सामाजिक आंदोलनों, ग्रामीण विकास कार्यक्रमों और मानवाधिकार पहलों के बीच अस्तित्व में आई। आज इन संस्थाओं के संस्थापक अथवा नेतृत्व उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां नेतृत्व परिवर्तन की आवश्यकता व्यवहारिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर सामने आती हैं। इसके बावजूद, अधिकांश संस्थाएं अभी तक यह तय नहीं कर पाई हैं कि अगला नेतृत्व कब, किसे और कैसे तैयार किया जाए।

यह परिवर्तन इसलिए भी कठिन हो जाता है क्योंकि संस्थापक का वैचारिक और भावनात्मक रूप से संस्था से गहरा जुड़ाव होता है। ऐसे में एक व्यक्ति का हटना केवल पद से हटना नहीं होता, बल्कि एक सम्पूर्ण वैचारिक-राजनीतिक भूमिका का स्थानांतरण होता है। इसी कारण आज नेतृत्व उत्तराधिकार (लीडरशिप सक्सेशन) केवल संस्था के प्रबंधन का सवाल नहीं है, बल्कि संस्थाओं के भविष्य की प्रासंगिकता से भी जुड़ा है।

इन्हीं सवालों के जवाब समझने के लिए हमने जन संगठनों के साथ चार दशकों से अधिक समय से कार्यरत संस्था श्रुति की पूर्व निदेशक कनिका सत्यानंद, वर्तमान में नेतृत्व संभाल रही श्वेता त्रिपाठी और प्रोग्राम डायरेक्टर सौरभ सिन्हा से बातचीत की। उन्होंने अपने अनुभवों और संस्थागत इतिहास के आधार पर बताया कि नेतृत्व के अगले क्रम को कैसे सोचा, पहचाना, तैयार और हस्तांतरित किया जा सकता है।

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नेतृत्व का अगला क्रम: चुनौतियां क्या हैं?

संस्थाओं में नेतृत्व उत्तराधिकार की चुनौती सबसे पहले संस्था की संस्कृति से जुड़ी नजर आती है। इसे समझाते हुए कनिका कहती हैं, “संस्थाएं नेतृत्व का अगला क्रम सोचने की संस्कृति नहीं बना पाईं हैं, कई संस्थाओं में संस्थापक, सालों बाद भी अगली पीढ़ी का नेतृत्व विकसित नहीं कर पाए हैं। यह समस्या हर जगह है, लेकिन छोटे शहरों या गांवों में ज्यादा गंभीर है और इसका संबंध संस्थापकों के मिशन मोड में काम करने, वैचारिक जुड़ाव, भावनात्मक संबंध और संस्था के विजन से है। लेकिन संस्थाओं को यह भी स्वीकार करना होगा कि व्यक्ति और संस्था दोनों का जीवन चक्र होता है। अगर 30-40 साल बाद भी आप वही काम कर रहे हैं और वही नेतृत्व है, तो ऐसे में या तो संस्था के बारे में नए सिरे से सोचना होगा या फिर उसे बंद करना पड़ेगा।

दूसरी बड़ी चुनौती संस्थागत प्रक्रिया और एक व्यवस्थित तंत्र का अभाव है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में प्रशिक्षण, उत्तराधिकार, मूल्यांकन आदि को औपचारिक तरीकों से संभाला जाता है, जबकि विकास सेक्टर में नेतृत्व देखभाल और भरोसे से बनता रहा है।

इस कमी के बारे में कनिका कहती हैं, “कॉर्पोरेट क्षेत्र में सिस्टम, नेतृत्व तैयार करता है। हमारे समय में विकास सेक्टर में ऐसे सिस्टम नहीं थे। इसके अलावा आर्थिक असुरक्षा भी एक बाधा होती है। टीम की आर्थिक और आजीविका की सुरक्षा तय करना एक महत्वपूर्ण पहलू है। 2-3 दशक पहले विकास सेक्टर के काम को एक करियर के रूप में नहीं, बल्कि आत्मबोध के एक वैकल्पिक रास्ते के तौर पर देखा जाता था, जिसका रिश्ता पद-प्रतिष्ठा से नहीं होता। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं, संस्थाओं के संचालन और प्रबंधन के तरीकों में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं।”

संभावित नेतृत्व कोई तयशुदा भूमिका नहीं है, इसकी पहचान के लिए संस्था को बहुत धैर्य के साथ देखना पड़ता है। | चित्र साभार: श्रुति

इस बात में आगे जोड़ते हुए श्वेता कहती हैं, “छोटी संस्थाओं में लोग कम वेतन और सुरक्षित आजीविका के सवाल से लगातार जूझते हैं, संस्था नेतृत्व के लिए यह समझना जरूरी है कि केवल विचारधारा के प्रति समर्पण से परे, व्यक्ति की निजी जरूरतें भी होती हैं।” इस तरह देखें तो चुनौती केवल कौशल या योग्यता की नहीं है, बल्कि संस्था की संस्कृति, उसकी प्रक्रियाएं और आर्थिक सुरक्षा भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।

आंतरिक बनाम बाहरी नेतृत्व: कौन ज्यादा टिकाऊ?

नेतृत्व परिवर्तन का सवाल केवल यह तय करने के लिए नहीं है कि अगला लीडर कौन होगा, बल्कि यह भी है कि संस्था किस तरह के नेतृत्व को महत्व देती है और कौन सी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहती है। आंतरिक या बाहरी, दोनों की अपनी संभावनाएं, संदर्भ और सीमाएं हैं।

इस पर श्वेता और कनिका दोनों काफी साफ दृष्टि रखती हैं और संस्था के अंदर से नेतृत्व विकसित करने पर जोर देती हैं। आंतरिक नेतृत्व संस्था की भाषा, इतिहास, संस्कृति और बदलाव के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ चेंज) को जी चुका होता है, इसलिए उसके बने रहने की संभावना अधिक रहती है। श्वेता कहती हैं, “अंदर से आने वाला नेतृत्व इसलिए टिकाऊ है क्योंकि उसके पास संस्था की साझी स्मृति (कलेक्टिव मेमोरी) होती है, टीम उसे पहचानती है। लेकिन यह मॉडल तभी अच्छा है जब संस्था अपने लोगों को विकसित होने दे, पदानुक्रम लचीले हो, अपनी जगह छोड़ने की राजनीतिक समझ और नियंत्रण छोड़ने का अभ्यास हो।”

अगले लीडर को तैयार करने के लिए सबसे पहले आपको नियंत्रण छोड़ना होता है, खासकर फंडिंग पर।

बाहर से नेतृत्व लाने को वह आवश्यक मानती हैं-, खासकर जब संस्था में परिपक्व नेतृत्व तैयार न हो, या संकट के कारण प्रक्रियाओं को फिर से खड़े करने की जरूरत हो। लेकिन यह तभी कारगर होता है जब बाहरी व्यक्ति ‘मैं सब जानता हूँ’ के भाव से परे, विनम्र हो, संवाद और सीखने की क्षमता रखता हो, और संस्था को जानने के लिए खुला हो। । श्रुति में भी हमसे पहले बाहर से एक निदेशक को नियुक्त किया गया था, उन्होंने खुले विचारों के साथ संस्था को अपनाया और हमे ऐसे दौर से बाहर निकाला जब संस्था संकट का सामना कर रही थी।

साझा नेतृत्व के एक और तरीके पर बात करते हुए श्वेता कहती हैं, “एक अन्य तरीका साझा नेतृत्व (जॉइन्ट लीडरशिप) का भी होता है जैसा हमारी संस्था में किया गया था। हम दो लोग साथ नेतृत्व की भूमिका में आए थे। यह श्रुति में पहली बार हुआ था। इसके फायदे यह थे कि जिम्मेदारी बंटी, सीखना आसान हुआ, अकेलापन नहीं रहा और जरूरी फैसलों पर संवाद व विमर्श भी बना रहा।”

संभावित नेतृत्व को कैसे पहचानें?

नेतृत्व की पहचान करने के लिए संस्था को बहुत धैर्य के साथ देखना पड़ता है। संभावित नेतृत्व कोई तयशुदा भूमिका नहीं है, न ही यह किसी पद, डिग्री या वरिष्ठता से अपने-आप पैदा हो जाता है। यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जो व्यक्ति और संस्था, दोनों के बीच रिश्ते में आकार लेती है।

नेतृत्व के कुछ अनिवार्य गुण –

सब कुछ जानना, सब कुछ करना नहीं: नेतृत्व की पहचान पर बात करते हुए कनिका कहती हैं कि ये जरूरी नहीं है कि एक लीडर, संस्था की सभी प्रक्रियाओं में दक्ष हो लेकिन आपको सभी के बारे में पता होना चाहिए। ऊर्जा, प्रेरणा, और विजन के साथ-साथ उपलब्ध संसाधनों और लोगों का सही समय पर सही प्रयोग कर पाना, यह कुछ बेसिक चीजें हैं जो किसी भी लीडर के अंदर होनी चाहिए।

श्वेता इसे सौरभ और आशा (जिन्हें श्रुति में अगले नेतृत्व के लिए तैयार किया जा रहा है) का उदाहरण देते हुए समझाती हैं- भले ही फाइनैन्स या कम्यूनिकेशन से जुड़े काम करने वाले लोग अलग हैं लेकिन सौरभ और आशा फंडरेज़िंग, फेलोशिप और आउटरीच सहित इन सभी प्रक्रियाओं को समझते हैं और इनसे जुड़े निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भाषा, संदर्भ और बदलाव की समझ रखना: श्वेता नेतृत्व निर्माण की प्रक्रिया को व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तर पर देखती हैं। उनके अनुसार शुरुआत में यह देखना होता है कि लोग संस्था की भाषा, संदर्भ और बदलाव के सिंद्धात (थ्योरी ऑफ चेंज) को समझ रहे हैं या नहीं। यह समझ संस्था की रिपोर्ट, प्रपोजल और कम्युनिकेशन में झलकती है।। यह समझ जब उनके व्यवहार और काम करने के तरीकों में दिखने लगता है तब नेतृत्व की संभावना स्पष्ट होती है। निर्णय लेते समय यह बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसका उदाहरण देते हुए श्वेता बताती हैं कि एक बड़े कॉर्पोरेट डोनर से फंडिंग लेने से उन्होंने इसलिए मना किया क्योंकि वे संस्था के वैचारिक दृष्टिकोण से मेल नहीं खाते थे।। ऐसा करने का विश्वास तभी आ पाता है जब आप संस्था के बदलाव के विचार को समझते हैं। इस विश्वास के बिना संस्था के मूल विचार और संरचना भी सुरक्षित नहीं रह पाती।

अनुशासन एक अनिवार्यता है: अनुशासन पर विशेष जोर देते हुए श्वेता कहती हैं कि आप कितने ही प्रतिभावान हों, बिना अनुशासन के काम पूरा नहीं होगा, केवल बातें ही होंगी। नेतृत्व की पहचान विचारों के साथ-साथ, व्यवहार और निरंतरता पर भी निर्भर होती हैं। उदाहरण के लिए आपने कोई फील्ड विजिट प्लान की हो, या कोई रिपोर्ट भेजनी हो या फिर संस्था की वैधानिक जरूरतों से जुड़ा कोई काम हो, इन सभी को तय समय पर किया जाना जरूरी है। एक लीडर के रूप में यह करना ज़रूरी है ताकि आप अन्य लोगों के लिए भी उदाहरण बन सकें।

अगले नेतृत्व को तैयार कैसे किया जाए?

सामाजिक असमानताओं या अवसरों को निर्णय में बाधा न बनने दें: नेतृत्व तैयार करने की प्रक्रिया केवल जिम्मेदारियां सौपने तक सीमित नहीं होती है। नेतृत्व सौंपने और अवसर देने की प्रक्रिया में यह देखना चाहिए कि सामाजिक असमानताएं- जाति, लिंग, वर्ग और क्षेत्रीयता बाधा न बनें। हालांकि योग्यता, अनुभव और प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण है लेकिन नेतृत्व की पहचान सामाजिक असमानताओं से अलग नहीं हो सकती है।

नियंत्रण छोड़ने के लिए तैयार रहें: संस्थाओं को अपने ‘नियंत्रण’ के विचार को भी बदलना होता है। सामाजिक संस्थाओं में फंडिंग और डोनर से संवाद की वजह से नेतृत्व का नियंत्रण अक्सर एक व्यक्ति में केंद्रित हो जाता है जिससे नये नेतृत्व को उभरने की संभावना कम हो जाती है।

नेतृत्व सौंपने और लेने वाले, दोनों में ही यह समझ होनी चाहिए कि संस्था की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार होने में समय लगता है।

इसे समझाते हुए श्वेता कहती हैं कि अगले लीडर को तैयार करने के लिए सबसे पहले आपको नियंत्रण छोड़ना होता है, खासकर फंडिंग पर। किसी को नेतृत्व के लिए आप तभी तैयार कर पाएंगे जब फंडरेज़िंग, टीम प्रबंधन, संस्था की महत्वपूर्ण रिपोर्ट लिखना, प्रपोजल तैयार करना, सार्वजनिक मंचों पर प्रतिनिधित्व करना आदि जैसी जिम्मेदारियां उन्हें देंगे। नेतृत्व सौंपने और लेने वाले, दोनों में ही यह समझ होनी चाहिए कि संस्था की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार होने में समय लगता है।

हमारी टीम में सौरभ और आशा अब स्वतंत्र रूप से फंडर्स के साथ संवाद करते हैं। हम टीम के हर सीनियर साथी को फंडर रिपोर्ट्स और वार्षिक रिपोर्ट्स जैसे जरूरी दस्तावेजो साझा करते हैं। यही वजह है कि वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अब हमारे यही साथी संस्था का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। 

वह आगे कहती हैं कि यह केवल प्रशिक्षण नहीं बल्कि ‘विश्वास’ की प्रक्रिया होती है। आपको अपनी टीम में लोगों को गलतियां करने के मौके देने होंगे, और उसके बाद उन पर फिर से भरोसा भी करना होगा। 

नेतृत्व सौंपने–लेने में आपसी समझ: नेतृत्व तैयार करने की प्रक्रिया में नेतृत्व सौंपने और नेतृत्व लेने वाले, दोनों की ही भूमिका होती है। इस संदर्भ में सौरभ एक संरचनात्मक समस्या पर बात करते हुए कहते हैं कि एक बड़ी समस्या इस प्रक्रिया में यह भी है कि लोग लम्बे समय तक संस्था में नहीं टिकते। अगर लोग चार–पांच साल में ही संस्था छोड़ देते हैं तो वो भी अपने अंदर नेतृत्व की क्षमता का सही आकलन नहीं कर पाते । उन्हें लगता है कि संस्था में उनकी भूमिका बहुत बड़ी नहीं हैऔर वे ज्यादातर खुद को एक कर्मचारी की तरह ही देखते हैं।

यही कारण है कि सेक्टर में ऐसे बहुत से लोग हैं जो वर्षों के अनुभव के बाद भी लीडरशिप में नहीं हैं। ऐसे में नेतृत्व सौंपने और लेने वाले, दोनों में ही यह समझ होनी चाहिए कि संस्था की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार होने में समय लगता है।

नेतृत्व को स्पेशलिस्ट नहीं ‘जनरलिस्ट’ बनायें: सौरभ आगे कहते हैं कि विकास सेक्टर की पढ़ाई कर आए लोगों की संख्या बढ़ने के बाद आज एक चुनौती यह भी है कि लोग बहुत ज़्यादा हाइपर-फोकस्ड हो गए हैं। शिक्षा पर काम करने वाले केवल शिक्षा और स्वास्थ्य पर काम करने वाले केवल स्वास्थ्य तक ही सिमित रह जाते हैं जिससे लोग पूरे सेक्टर को समग्र रूप से नहीं देख पाते । मेरे हिसाब से आगे चलकर ऐसे लोगों के लिए लीडरशिप की भूमिका निभाना कठिन हो जाता है। अत्यधिक पेशेवर सोच नुकसानदेह भी हो सकतीहै क्योंकि सामाजिक कार्य मूल रूप से एक सामाजिक-राजनीतिक काम है, जिसके लिए राजनीतिक प्रक्रिया और रणनीतिक समझ आपके अंदर होना जरूरी है।

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