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जल और स्वच्छता

जातिवाद और कच्ची नौकरियों से जूझते भारत के सफाई कर्मचारी

शहरी भारत में स्वच्छता सेवाओं के निजीकरण के साथ जातिवाद की जड़ें, मजदूरी में कटौती, और दलित कामगारों पर सामाजिक संकट गहराते जा रहे हैं।
16 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित

​​अगस्त 2025 से चेन्नई में हजारों सफाई कर्मी सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। यह विरोध राज्य सरकार के उस निर्णय के खिलाफ है, जिसमें कचरा उठाने और सड़कों की साफ-सफाई का काम बड़े निजी ठेकेदारों को सौंपने का एलान किया गया था। हालांकि, यह समस्या केवल चेन्नई तक सीमित नहीं है। जैसे-जैसे शहरों में घर-घर से कचरा इकट्ठा करने के काम में निजीकरण बढ़ा है, नगर पालिकाओं में स्थायी कर्मचारियों की जगह कॉन्ट्रैक्ट लेबर, यानी ठेके के श्रमिकों की भर्ती में वृद्धि हुई है। लखनऊ, अहमदाबाद और सूरत जैसे शहर ‘न्यू क्लीन सिटी’ का पुरस्कार तो जीतते हैं, लेकिन यह उन कामगारों की जमीनी हकीकत से बिल्कुल विपरीत है, जो इन शहरों को साफ रखते हैं। ऐसे में धरातल पर साफ-सफाई से जुड़े काम की वास्तविकता को समझना जरूरी हो जाता है।

सबसे जरूरी यह समझना है कि यह काम करता कौन है? जाति-आधारित सामाजिक और व्यावसायिक भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह इस बात से पता चलता है कि दलित और अन्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय आज भी स्वच्छता और कचरा प्रबंधन कार्यों में सबसे अधिक संख्या में मौजूद हैं।

वर्ष 2023–24 में सरकार द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, जिसमें 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 3,000 शहरी निकायों से 38,000 कामगार शामिल थे, शहरी सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में लगे लगभग 92 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदायों से थे। उत्तर और पश्चिम भारत में वाल्मीकि, भंगी, मेहतर और चूड़ा; पूर्वी भारत में बसफोर, डोम और घासी; तथा दक्षिण भारत में थोटी, अरुंथथियार और मादिगा जैसी दलित उपजातियां साफ-सफाई से जुड़े कामों की श्रृंखला में शामिल रही हैं। एक अनुमान के अनुसार इन समुदायों के लगभग 60 लाख परिवार हैं, जिनमें से 40–60 प्रतिशत आबादी साफ-सफाई से जुड़े अत्यंत जोखिमपूर्ण काम करती है।

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वर्ष 2023 और 2024 में पश्चिम भारत स्थित श्रम अधिकार संगठन, सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन (सीएलआरए) ने दो अध्ययन किए, ताकि निजीकरण और कॉन्ट्रैक्ट प्रणाली का स्वच्छता कर्मियों पर प्रभाव समझा जा सके। हमने अहमदाबाद और सूरत में कॉन्ट्रैक्ट श्रमिकों, स्थायी कर्मचारियों और स्व-रोजगार के रूप में वर्गीकृत लोगों से बातचीत की। इस बातचीत में यह सामने आया कि कचरा और स्वच्छता क्षेत्र में हो रहे बदलाव जाति-आधारित असमानताओं को और जटिल बना रहे हैं, जिससे कामगारों की स्थिति और अधिक असुरक्षित होती जा रही है।

निजीकरण, कॉन्ट्रैक्ट प्रणाली और जातिगत उत्पीड़न का गठजोड़

आज स्वच्छता क्षेत्र में नौकरियां स्थायी और कॉन्ट्रैक्ट, दोनों वर्गों में बंटी हुई हैं। लेकिन हमारे शोध से पता चलता है कि स्वच्छता कर्मियों को पूरी तरह कॉन्ट्रैक्ट पर ही भर्ती करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। स्थायी नियुक्तियां घट रही हैं और वाल्मीकि समुदाय के कामगारों को अधिकतर अस्थायी भूमिकाओं तक ही सीमित किया जा रहा है।

कामगारों का अनुमान है कि अहमदाबाद नगर निगम के पे-रोल पर लगभग 60 प्रतिशत स्वच्छता कर्मी वाल्मीकि समुदाय से हैं। दूसरी ओर, प्रभुत्वशाली जातियों के लोग चपरासी और अटेंडेंट जैसी स्थायी नौकरियों में प्रवेश कर रहे हैं। सूरत में कामगारों का आरोप है कि गैर-वाल्मीकि उम्मीदवार स्थायी नौकरी पाने के लिए भर्ती अधिकारियों को रिश्वत देते हैं। यह प्रथा राजस्थान में भी प्रचलित हो चुकी है। ये कर्मचारी वास्तविक सफाई कार्य नहीं करते, लेकिन उनकी वेतन पर्ची में उन्हें ‘श्रमिक’ दिखाया जाता है, जिससे यह भ्रम पैदा होता है कि साफ-सफाई से जुड़े कामों को सभी जातियों के बीच समान रूप से बांटा गया है। वास्तविकता में, जहां प्रभुत्वशाली जातियों ले लोगों को सफाई का काम दिया जाता है, वे अक्सर उसे दूसरों को ठेके पर दे देते हैं। उदाहरण के तौर पर, अहमदाबाद के एक सार्वजनिक शौचालय में प्रबंधन संभालने वाला व्यक्ति स्वयं ब्राह्मण था और उसने बताया कि वह रोज दो बार सफाई के लिए अन्य श्रमिकों को बाहर से बुलाता है, जिसके एवज में वह उन्हें 100–150 रुपये का भुगतान करता है।

कामगारों ने अपने कार्यस्थलों पर खुले तौर पर छुआछूत और भेदभाव की घटनाएं भी साझा की। एक वाल्मीकि कर्मचारी ने बताया कि कार्यक्रमों में उसे जमीन पर बैठाया जाता था, जबकि उसके सवर्ण सहकर्मी कुर्सियों पर बैठते थे। अन्य लोगों ने बताया कि सैनिटरी इंस्पेक्टर और सब-सैनिटरी इंस्पेक्टर, जो अक्सर प्रभुत्वशाली जातियों से होते हैं, उनके साथ अमूमन असंवेदनशील और जातिवादी व्यवहार करते हैं।

कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की भर्ती के लिए मानक प्रक्रिया न होने के कारण रोजगार के रिकॉर्ड या तो आधे-अधूरे होते हैं या दर्ज ही नहीं किये जाते। इससे कॉन्ट्रैक्ट श्रमिकों की प्रणालीगत अदृश्यता बढ़ती है और उन्हें न्यूनतम वैधानिक वेतन भी नहीं मिल पाता। हमने पाया कि कॉन्ट्रैक्ट श्रमिकों को निकायों में स्वच्छता कार्य के लिए बहुत कम वेतन मिलता है, जो अक्सर स्थायी कर्मचारियों के वेतन की तुलना में एक-चौथाई होता है। उन्हें आमतौर पर दैनिक ‘हाजरी’ (उपस्थिति आधारित वेतन) के हिसाब से भुगतान किया जाता है, जो वर्ष 2016 से लगभग 200–250 रुपये पर ही रुका हुआ है।

स्थायी नौकरी पाना अब और कठिन हो गया है। पहले, पांच साल में 900 दिन काम पूरा करने पर कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी स्थायी बन सकते थे, लेकिन अब यह रास्ता लगभग बंद हो चुका है। यह 1970 के कॉन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन एंड एबोलिशन) ऐक्ट के तहत गंभीर कानूनी प्रश्न खड़े करता है। इस ऐक्ट के तहत कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को समान काम के लिए स्थायी कर्मचारी के समान वेतन मिलना चाहिए। यह एक ऐसा प्रावधान है, जिसका हमेशा उल्लंघन होता है।

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हर कोई साफ-सफाई का पेशा जारी नहीं रखना चाहता, लेकिन इसे छोड़ देना भी एक एक गंभीर संकट का विषय है। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

यहां तक कि मुआवजे की व्यवस्थाएं भी वास्तविक रूप से गतिशील नहीं बन पायी हैं। ‘वारसदार’ प्रणाली के तहत ड्यूटी पर घायल या मृत कर्मचारियों के परिजनों को नौकरी मिलती है, लेकिन ये पद आज भी कम वेतन और शारीरिक श्रम वाले कामों तक ही सीमित हैं। सूरत के एक सफाई कर्मचारी, जिन्हें अनुकंपा के आधार पर अपनी मां की नौकरी मिली है, ने बताया कि बीकॉम डिग्री होने के बावजूद उन्हें सफाई का ही काम दिया गया और वे लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं।

वारसदार प्रणाली के विरोधाभास

कुछ कर्मचारियों के लिए वारसदार प्रणाली अनिश्चितता और गहरे जातिवादी भेदभाव के बीच सरकारी नौकरी पाने का एकमात्र बचा हुआ रास्ता है। लेकिन कई लोगों का यह भी मानना है कि यह प्रणाली जाति-आधारित व्यवसाय को बढ़ावा देती है और उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस काम से बंधे रहने को मजबूर करती है। यह व्यवस्था केवल निचले स्तर की नौकरियों तक सीमित है और यदि कोई कर्मचारी उच्च पद पर पदोन्नति स्वीकार कर ले, तो यह सुविधा समाप्त हो जाती है। कोई अन्य विकल्प न होने के कारण, कई कामगार मजबूरी में पदोन्नति ठुकरा देते हैं और कम वेतन में ही सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण इन पदों पर ही बने रहते हैं।

वर्ष 2006 में, मजबूत सिफारिशों के फलस्वरूप, 900 कर्मचारियों को वारसदार प्रणाली के तहत नगरपालिका सेवा में शामिल किया गया था। अहमदाबाद में जिन स्थायी स्वच्छता कर्मचारियों से हमने बात की, उनमें से अधिकांश इसी रास्ते से स्थायी नौकरी में आए थे।

हर कोई इस काम में भले ही बने नहीं रहना चाहता, लेकिन इसे छोड़ देना भी एक एक गंभीर संकट का विषय है।

बेड़ियों को तोड़ने की जद्दोजहद

कामगारों ने बताया कि साफ-सफाई के पेशे को छोड़ने की प्रक्रिया में उन्हें अक्सर कई रुकावटों का सामना करना पड़ता है। एक कर्मचारी ने बताया, “अगर हम कोई नयी दुकान भी खोलते हैं और लोगों को (हमारा पेशा) पता चल जाता है, तो वहां कोई नहीं आता।” ऐसी स्थिति में, जब कोई व्यक्ति इस पेशे से बाहर अन्य अवसरों की ओर बढ़ना चाहता है, तो समाज की जातिवादी संरचना और पूर्वाग्रह उसका रास्ता रोकते हैं, और उसकी सामाजिक स्वीकार्यता और गतिशीलता को सीमित कर देते हैं।

कामगार बार-बार यह इच्छा जाहिर करते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और उनके परंपरागत पेशे को न अपनायें। लेकिन कई लोगों ने बताया कि निजी स्कूलों में माता-पिता का पेशा और जाति प्रमाणपत्र देखकर बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाता। एक कर्मचारी ने बताया, “छुआछूत अभी भी चालू है हमारे समाज में। मैं मेहनत कर रहा हूं कि अपने बच्चे को पढ़ाऊं, लेकिन ऐडमिशन नहीं दे रहे तो अब क्या करुं?” एक अन्य कर्मचारी ने कहा, “कोई अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाह रहे हो, तो नहीं मिलेगा।”

संरचनात्मक बाधाएं इन चुनौतियों को और जटिल बनाती हैं। अहमदाबाद की एक वाल्मीकि बस्ती में रहने वाले कर्मचारी ने बताया कि उनकी बस्तियों के आसपास कोई स्कूल नहीं है। वहीं बच्चों को दूर के स्कूलों में भेजना महंगा पड़ता है। पूरे दिन काम करने के चलते बच्चों को दूर लाना-ले जाना और उनकी देखभाल करना कठिन हो जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में देश के विभिन्न शहरों के स्वच्छता कर्मचारी बार-बार सामूहिक मांगें उठाते रहे हैं, लेकिन अभी तक उनकी आवाज को लगातार अनसुना किया गया है।

मुख्य मांगें और आगे की राह

स्थायी और कॉन्ट्रैक्ट कामगारों, दोनो से बातचीत के आधार पर कुछ तात्कालिक मांगें सामने आती हैं:

  • कॉन्ट्रैक्ट प्रणाली समाप्त की जाए और मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की नौकरियों को नियमित किया जाए।
  • स्वच्छता कार्य को आवश्यक श्रम मानते हुए सम्मानजनक वेतन सुनिश्चित किया जाए।
  • सुरक्षित और गरिमापूर्ण कार्य परिवेश, और साथ ही स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास के लिए सक्रिय सहयोग दिया जाए।
  • सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई मृत्यु का दुर्घटना या लापरवाही के रूप में निवारण करने की बजाय उन्हें एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मान्यता दी जाए।
  • स्वच्छता कर्मियों और उनके समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के लिए मुआवजा प्रदान किया जाए। हालांकि आरक्षण आज भी न्याय दिलाने का एक महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए मुआवजा, जो एक अत्यंत महवपूर्ण साधन है, के विषय पर भी गंभीर चर्चा जरूरी है।

मजदूर यूनियनों के लिए यह बेहद अहम है कि वे इस बात को मान्यता दें कि जाति भी श्रम से जुड़ा मुद्दा है। इस आधार पर उन्हें अपनी रणनीतियों व दृष्टिकोण में बदलाव लाना चाहिए। यूनियनों के भीतर मौजूद जातिगत विभाजन को नजरअंदाज करने के कारण ही अलग-अलग जाति या पहचान आधारित यूनियनों का जन्म हुआ है, जो ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों के कामगारों की मांगों को सामने लाती हैं। लेकिन यह विखंडन इस बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करता है कि जाति किस तरह श्रम बाजार को संरचित करती है। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिससे लगातार मुंह मोड़ लिया जाता है।

स्थायी नौकरी पाना अब और कठिन हो गया है। पहले, पांच साल में 900 दिन काम पूरा करने पर कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी स्थायी बन सकते थे, लेकिन अब यह रास्ता लगभग बंद हो चुका है।

भारत में आर्थिक शोषण को आकार देने में जाति की केंद्रीय भूमिका है। जाति को वर्ग से अलग नहीं माना जा सकता। मुंबई में हाल ही में श्रम और पहचान आंदोलनों के बीच एकजुटता की आवश्यकता पर हुई एक बैठक में कार्यकर्ताओं ने कहा कि यूनियनों को जाति के दृष्टिकोण से स्थानीय आर्थिक गतिविधियों और उत्पादन प्रणालियों का दस्तावेजीकरण शुरू करना चाहिए। उन्होंने एक ऐसी वैकल्पिक संस्कृति बनाने की भी बात की, जो प्रभुत्वशाली दमनकारी मानकों को चुनौती दे। यह जाति-विरोधी संगठनों के साथ निरंतर सहयोग, सामुदायिक स्तर पर एकजुटता और राजनीतिक शिक्षा के माध्यम से संभव हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बदलाव यूनियन नेतृत्व में भी दिखाई देना चाहिए।

जब तक सफाई कर्मियों को अपने पेशे से आगे बढ़ने और दूसरा काम चुनने का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक जाति के आधार पर उनसे जुड़े इस सामाजिक और सांस्कृतिक अपमान का सिलसिला चलता रहेगा। इसलिए सफाई कर्मियों की यूनियनों की एक अहम मांग यह भी होनी चाहिए कि कामगारों को सुरक्षित रोजगार के अवसर खोए बिना, यह पेशा छोड़ने की आजादी मिले और कॉन्ट्रैक्ट प्रणाली समाप्त की जाए।

इन मांगों को न्यायपालिका से भी मान्यता मिली है। एक ऐतिहासिक फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक नगर पालिका को 580 सफाई कर्मियों की नौकरियों को नियमित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा, “कल्याणकारी राज्य में एक वर्ग के नागरिकों की स्वच्छता दूसरों की ‘गुलामी’ के सहारे हासिल नहीं की जा सकती।” अदालत ने स्वच्छता कार्य के जातिवादी चरित्र को भी स्पष्ट रूप से स्वीकार किया और इसे अन्य कॉन्ट्रैक्ट श्रम विवादों से अलग बताया। आनंद तेलतुंबड़े ने जोर देकर कहा है कि यदि जातिगत वरीयता समाप्त न की गयी, तो सरकार का राष्ट्रव्यापी स्वच्छ भारत मिशन मात्र एक नारा बनकर रह जाएगा। उनका तर्क है कि पूरे समाज द्वारा पैदा किए गए कचरे के प्रबंधन का बोझ ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों के गिने-चुने कर्मचारियों पर नहीं डाला जा सकता।

आखिर में, सफाई कर्मचारियों (जिसमें ठेका कर्मी भी शामिल हैं) को संगठित करना ही एकमात्र रास्ता है, जिससे उनकी सामूहिक आवाज मजबूत हो सके और वे उन व्यवस्थाओं को चुनौती दे सकें जो उनकी गरिमा, सुरक्षा और अन्य पेशों में आगे बढ़ने के अवसरों को सीमित करती हैं। शहरी गुजरात के कामगारों का अनुभव दिखाता है कि चेन्नई के सफाई कर्मचारियों द्वारा व्यक्त की गई आशंकाएं बिल्कुल सही हैं। उनके श्रम की पहचान और गरिमा के लिए चल रहे संगठित संघर्ष को केवल स्वीकार्यता ही नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से समर्थन भी मिलना चाहिए।

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