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क्यों कश्मीर को भी जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रयासों की जरूरत है

क्यों कश्मीर को भी जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रयासों की जरूरत है
12 जनवरी 2026 को प्रकाशित
एक सर्द सुबह में छात्र और स्टाफ सदस्य कॉलेज के पीछे बने कम्पोस्ट पिट का निरीक्षण करते हुए। | चित्र साभार: कैसर अली

मेरा नाम इकरा मुश्ताक है और मैं श्रीनगर के गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वुमन में एमए द्वितीय वर्ष की छात्रा हूं। मेरे लिए श्रीनगर की ज्यादातर सुबहें एक जैसी होती हैं। इन सुबहों में मैं हल्की चुभती-सी ठंड में, क्लास शुरू होने से पहले कॉलेज के बगीचों से होकर जाने वाले रास्ते से गुजरती हूं। इन्हीं रास्तों के पीछे, हमारा दिन शुरू होता है। यह शुरुआत किसी कक्षा में नहीं बल्कि कंपोस्ट के गड्ढों के पास होती है। 

हर सुबह पर्यावरण विज्ञान विभाग की प्रमुख डॉ आसिया नज़ीर के साथ मैं उस जगह पहुंचती हूं, जो अब हमारे लिए जलवायु कार्रवाई की एक अनपेक्षित प्रयोगशाला बन चुकी है। वे कंपोस्ट की जांच करती हैं और हमसे पूछती हैं कि क्या बदलने की जरूरत है। एक साल पहले किसी को भी यह सब समझ नहीं आता था लेकिन आज यह हम सभी छात्रों के लिए आदत बन चुकी है। एक छोटे-से प्रयोग के रूप में शुरू हुई इस पहल ने जलवायु परिवर्तन पर हमारी समझ को बदल दिया है। 

कश्मीर में पर्यावरण का संकट सीधे तौर पर नहीं दिखता क्योंकि लाल चौक के ऊपर कोई धुंध नहीं रहती, आसमान नीला और हवा साफ होती है। लेकिन लगातार सर्दियां छोटी होती जा रही हैं, ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और बर्फबारी अनिश्चित होती जा रही है और यह सामान्य-सा दिखने वाला माहौल ही इस सच्चाई को ढक देता है। 

कंपोस्टिंग की पहल से जुड़ने से पहले, मेरे लिए जलवायु परिवर्तन सिर्फ किताबों तक सीमित था। यह कोई दूर का अनजान सा विषय लगता था जो सम्मेलनों और रिपोर्टों तक ही सीमित हो। यह दूरी उस दिन खत्म हुई जब हमने अपनी ही कैंटीन का कचरा इकट्ठा करना शुरू किया और पहली बार समझा कि बिना सोचे-समझे हम कितना कचरा पैदा करते हैं, और वह कहां जाता है।

यह विचार डॉ आसिया का था। विभाग की एक बैठक में उन्होंने कहा, “अगर हम कश्मीर में बदलाव की उम्मीद करते हैं तो शुरुआत उस जगह से करनी होगी जिस पर हमारा नियंत्रण है – अपने कैंपस से।” तर्क सीधा था, अगर श्रीनगर का ज्यादातर कचरा खुले मैदानों में फेंका जाता है या जला दिया जाता है तो कम से कम एक कैंपस को बेहतर करने की कोशिश तो करनी चाहिए। यहीं से हमने कैंटीन के बचे हुए खाने, हॉस्टल के जैविक कचरे और गिरे हुए पत्तों को उन कंपोस्ट इकाइयों की ओर मोड़ना शुरू किया, जिन्हें विभाग ने खुद डिजाइन कर बनाया था। हमारा काम था हरे और सूखे कचरे की परतें बनाना, तापमान दर्ज करना, नमी संतुलित करना और हर दिन के बदलाव दर्ज करना।

शुरुआती हफ्ते आसान नहीं थे। कुछ छात्राएं कचरा अलग करने से हिचकती थी। कइयों को लगता है कि यह पहल भी अन्य योजनाओं की तरह असफल हो जाएगी। इसमें कई चुनौतियां भी आईं जैसे कभी गड्ढों से बदबू आती, तो कभी कंपोस्ट पूरी तरह सूख जाता। हम बार-बार सुधार करते, सीखते, और फिर से शुरू करते। पहली बार जब हमने गहरे रंग का, साफ, मिट्टी-सा कंपोस्ट निकाला तो वह किसी जादू जैसा लगा।

आज वही कंपोस्ट हमारे कैंपस के बगीचों को पोषण देता है। रासायनिक उर्वरकों की जरूरत नहीं रही। एक छोटा-सा किचन गार्डन अब हॉस्टल के लिए मौसमी सब्जियां उगा रहा है। लेकिन सबसे गहरा बदलाव बगीचों में नहीं, हममें आया है, अब जलवायु परिवर्तन हमारे लिए दूर की चीज नहीं है। 

यह काम कभी भी आसान नहीं रहा। छात्रों और कैंटीन कर्मचारियों को कचरा अलग करने के लिए राजी करना समय लेता रहा। कंपोस्ट अक्सर अनिश्चित व्यवहार करता था। कड़ाके की ठंड वाली सुबहों में गड्ढे में कंपोस्ट पलटते समय हमारे हाथ सुन्न हो जाते थे। दबी आवाजों में यह भी सुनने को मिलता कि यह काम गंदा है, या कॉलेज की लड़कियों के लिए नहीं है। लेकिन हर चुनौती ने हमें एक अहम सबक सिखाया, हमने जाना कि जलवायु परिवर्तन पर काम शायद ही कभी आकर्षक होता है। यह धीमा, दोहराव भरा और अक्सर अनदेखा रहता है, लेकिन इसका असर चुपचाप बैठ जाता है – मिट्टी में, बगीचों में और उन लोगों के भीतर जो यह काम करते हैं।

यह लेख तैयार करने में कश्मीर से कैसर अली ने योगदान दिया है।

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अधिक करें: लेखक से जुड़ने और उन्हें सहयोग देने के लिए उनसे ​iqraiqramushtaq250@gmail.com पर संपर्क करें।

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