चकमा समुदाय के सुपरफूड मेली-एमिली में छुपा विज्ञान


हर मंगलवार की सुबह, चकमा समुदाय के सैकड़ों किसान और व्यापारी पहाड़ों से अपने ताजा उत्पादों के साथ उनाकोटी जिले के पेचार्थल मुख्य बाजार में इकट्ठा होते हैं। यहां पत्तेदार सब्जियां, मकई, सूअर का मांस (पोर्क) और आलू जैसे कई उत्पादों का विविध मिश्रण हमें चकमा समुदाय की पाक परंपराओं की एक झलक देता है। इन तमाम चीजों के बीच हमें साधारण सी दिखने वाली बांस की कोपल (बैम्बू शूट) भी मिलती है, जो चकमा समुदाय के भोजन का एक अभिन्न अंग है। इसे अक्सर मेली-एमिली जैसे किण्वित (फर्मेंटेड) रूप में खाया जाता है।
युवा पर्यावरण कार्यकर्ता इशिका चकमा कहती हैं, “किण्वित बांस की कोपल हर चकमा थाली का एक अहम हिस्सा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इसके बिना चकमा समुदाय की दावत अधूरी होती है। हर व्यंजन को बनाने की एक अनूठी विधि है, जो उसे एक विशिष्ट स्वाद देती है। हमारे यहां तो मजाक में यह भी कहते हैं कि बछुरि माला (बांस की कोपल से बना एक व्यंजन) फ्रांसीसी क्रोईसों को हमारा जवाब है!”
बीती चार सदियों के लंबे अंतराल से चकमा समुदाय त्रिपुरा में बसा हुआ है। इस समुदाय के बाशिंदे सबसे पहले बंगाल सल्तनत के समय यहां आकर बसे और उसके बाद बांग्लादेश में चटगांव के पहाड़ी इलाकों की हिंसा से बचने के लिए अलग-अलग समय में यहां आते रहे। चटगांव और त्रिपुरा के भूभाग में समानता थी। यही कारण था कि चकमा लोगों को जल-जंगल जमीन से जुड़े अपने पारंपरिक ज्ञान को इस नए इलाके की मिट्टी में घोलने में खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी।
वर्तमान में चकमा समुदाय पेचार्थल, ढलाई जिले के गंडाछेरा और छमानु इलाकों समेत राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बांस की कोपल जैसे भोजन और किण्वन जैसी पाक विधियों के जरिये अपनी थाती और इतिहास को संजोए हुए हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के साथ पूर्वोत्तर भारत का भूदृश्य बदल रहा है। इसके चलते अव्यवस्थित बुनियादी ढांचे व रबर जैसी एकल फसलों के विस्तार से बांस की प्रजातियों पर धीरे-धीरे खतरा बढ़ता जा रहा है।
विकास सेक्टर पेशेवर और संरक्षणवादी सुशील चकमा कहते हैं, “बांस की गुणवत्ता और विविधता पर जलवायु परिवर्तन और भूदृश्य क्षरण (लैंड्स्केप डेग्रडेशन) का गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यदि इस फसल को पुनर्जीवित करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो चकमा पाक-शैली पर निश्चित रूप से लुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा।”
सांस्कृतिक प्रभावों के अलावा, बांस की कमी चकमा समुदाय को उन तरीकों से भी प्रभावित करती है, जो सतह पर तुरंत नजर नहीं आते।
किण्वित खाद्य पदार्थ और मानव स्वास्थ्य पर काम करने वाले वैज्ञानिक डॉ. मलोयजो जॉयराज भट्टाचारजी कहते हैं, “मेली-एमिली जैसे किण्वित खाद्य पदार्थ चकमा समुदाय में देखे गए विशेष आंत (गट) प्रोफाइल को बनाने और बरकरार रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन खाद्य पदार्थों में किण्वन से प्राप्त मेटाबोलाइट्स के समृद्ध मिश्रण के साथ प्राकृतिक रूप से लैक्टिक ऐसिड बैक्टिरिया और अन्य लाभकारी सूक्ष्म जीवों की सघन संख्या होती है, जो आंत की संरचना को प्रभावित कर सकते हैं।”
डॉक्टर मलोयजो प्रजातीय विविधता पर भी जोर देते हुए कहते हैं, “बांस की हर प्रजाति की अपनी रासायनिक संरचना होती है, जिसमें रेशे की बनावट और किण्वन योग्य शर्करा का अंतर शामिल है। यह किण्वन प्रक्रिया और उसके परिणामस्वरूप, पोशक तत्वों को भी प्रभावित करते हैं।”
हालांकि जैसे-जैसे बांस की आबादी और उसकी विविधता क्षीण हो रही है, चकमा जैसे समुदायों के पास शायद ही कोई विकल्प बचा है।
इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार को एक दीर्घकालिक नीति और योजना तैयार करनी चाहिए। सुशील कहते हैं, “नहीं तो चकमा समुदाय की आने वाली पीढ़ियां ऐसे बदले हुए परिवेश में रहेंगी, जहां बांस उनकी थाली और जीवन से गायब हो चुका होगा। यह हमारी पहचान और संस्कृति है। इसलिए इस फसल का संरक्षण और इसके पारिस्थितिक पतन को रोकने का दायित्व हम सभी का है।”
हंसातनु रॉय वर्ष 2025–26 के आईडीआर नॉर्थईस्ट फेलो हैं।
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लेखक के बारे में
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हंसातनु रॉय वर्ष 2025–26 के आईडीआर नॉर्थईस्ट मीडिया फेलो हैं। वह ग्रीन हब नॉर्थईस्ट फेलो भी रह चुके हैं। हंसातनु को फिल्म-निर्माण और संरक्षण संबंधी शोध में रुचि है, और वह पूर्व में अरुणाचल प्रदेश और असम में पब्लिक हेल्थ संस्थान के साथ काम कर चुके हैं। उन्होंने डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है।