Staging Environment

क्या होता है जब शिक्षक बच्चों के संकेतों को पढ़ने लगते हैं?

क्या होता है जब शिक्षक बच्चों के संकेतों को पढ़ने लगते हैं?
20 जनवरी 2026 को प्रकाशित
मैंने ड्रॉइंग को केवल कला तक सीमित न रखकर भाषा और गिनती से जोड़ा, कहानी सुनने के बाद बच्चे चित्र बनाते और वस्तुओं की पहचान रंगों के जरिए करते। | चित्र साभार: नाजिया परवीन

मेरा नाम नाजिया है, मैं अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, भोपाल से एमए एजुकेशन की पढ़ाई कर रही हूं। मेरा कार्यक्षेत्र प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, बाल विकास और आंगनवाड़ी केंद्रों के अध्ययन से जुड़ा है। अपने फील्ड वर्क के दौरान मुझे आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चों के साथ काम करना होता है। फील्ड वर्क में मेरी रोज की कक्षा में गिनती, कविता और चित्र बनाने जैसी गतिविधियां तय समय और तय ढांचे में चलती थीं। ज्यादातर बच्चे उस लय में ढल जाते थे, लेकिन एक बच्चा लगातार उस व्यवस्था से बाहर दिखाई देता था। वह बैठकर काम नहीं कर पाता था, बार-बार अपनी जगह छोड़ देता, चीजों को छूता, कभी रोता तो कभी दूसरे बच्चों से उलझ जाता। शुरू में यह व्यवहार अव्यवस्था जैसा लगता था, लेकिन धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि यह केवल अनुशासन की समस्या नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया और बच्चे की जरूरतों के बीच मौजूद एक गहरा अंतर है।

हमारी कक्षा में बच्चों को स्थिर बैठना होता था और निर्देश सुनकर, काम करना या उन्हें दोहराना होता था। यह बच्चा सीखना चाहता था, बस उस तरीके से नहीं, जैसा हम तय कर चुके थे। जब भी कोई गतिविधि शरीर की हरकत से जुड़ी होती, जैसे एक्शन राइम या छोटा खेल, वह तुरंत सक्रिय हो जाता था।उसका ध्यान अन्य चीजों में भटकता नहीं था बल्कि इन गतिविधियों में केंद्रित हो जाता था। इसी तरह, जब उसे रंग और कागज मिलते तो वह अप्रत्याशित रूप से शांत और केंद्रित हो जाता। इन संकेतों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि शायद समस्या बच्चे की क्षमता में नहीं, बल्कि हमारी शिक्षण संरचना में है।

मैंने अपनी योजना पर दोबारा काम शुरू किया। कक्षा की शुरुआत अब सीधे बैठकर पढ़ने से नहीं होती थी, बल्कि चलने-फिरने, तालियों और छोटे खेलों से होती थी। यह बदलाव केवल उस बच्चे के लिए नहीं था, बल्कि पूरी कक्षा के लिए था। शरीर सक्रिय होने के बाद बच्चे स्वाभाविक रूप से सुनने और ध्यान लगाने के लिए तैयार दिखने लगे। ड्रॉइंग को मैंने केवल कला तक सीमित न रखकर भाषा और गिनती से जोड़ा। कहानी सुनने के बाद बच्चे चित्र बनाते, वस्तुओं की पहचान रंगों के जरिए करते। इससे सीखना किताब से निकलकर अनुभव में बदलने लगा।

कुछ ही हफ्तों में फर्क साफ दिखने लगा। जो बच्चा पहले कक्षा से भागता था, अब गतिविधियों की शुरुआत का इंतजार करता था। उसका आक्रामक व्यवहार कम हुआ और सहभागिता बढ़ी। सबसे अहम यह था कि सीखना अब उसके लिए बाध्यता नहीं रहा। वह अपनी गति और रुचि के अनुसार जुड़ पा रहा था।

इस प्रक्रिया ने मुझे यह समझाया कि शिक्षा और बच्चों के बीच का सबसे बड़ा अंतर तब पैदा होता है, जब हम एक ही ढांचे को सभी पर लागू करने की कोशिश करते हैं। बच्चे अपनी बेचैनी, उत्साह और चुप्पी के जरिए संकेत देते हैं। जब शिक्षक उन संकेतों को पढ़कर गतिविधियों को बदलते हैं, तब शिक्षा का ढांचा बच्चों की वास्तविक दुनिया से जुड़ता है। उसी जुड़ाव में सीखना सहज, टिकाऊ और अर्थपूर्ण बनता है।

अधिक जानेंः जानिए, शिक्षा की समावेशी राह: बिहार की मुसहर बस्तियों में एक सामुदायिक पहल।

अधिक करेंः लेखक से जुड़ने और उन्हें सहयोग देने के लिए उनसे najiyark14@gmail.com पर संपर्क करें।

लेखक के बारे में