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बैगा समुदाय: जंगल हमारे बिना नहीं, हम जंगल के बिना नहीं

बैगा समुदाय: जंगल हमारे बिना नहीं, हम जंगल के बिना नहीं
22 जनवरी 2026 को प्रकाशित
एक जगह कुछ साल खेती कर, फिर दूसरी जगह चला जाता था ताकि जंगल खुद को दोबारा तैयार कर सकें। | चित्र साभार: चंद्र प्रताप सिंह

छत्तीसगढ़ के जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) में आने वाला समुदाय बैगा रहता है। यह समुदाय मुख्य रूप से गौरेला ब्लॉक की 13 ग्राम पंचायतों के 19 गांवों (टोला/पारा) में रहत है। बैगा लोगों के जीवन का आधार जंगल है। जंगल से वे पारंपरिक खेती, जड़ी-बूटी, लकड़ी, फल, शाक-सब्जियां और अन्य संसाधन हासिल करते हैं। बैगा जनजाति को वर्ष 2023 में वन अधिकार अधिनियम 2006 के धारा 3(1)(e) के तहत पर्यावास अधिकार (हैबिटेट राइट्स) मिले थे। 

यहां के 19 गांवों ने मिलकर वन अधिकार अधिनियम के प्रति जागरूकता पर काम करने वाले संगठन नव निर्माण चेतना मंच के साथ पर्यावास अधिकारों के लिए काम किया। ये अधिकार पीवीटीजी (विशेष संरक्षित बैगा जनजाति) को उनकी पारंपरिक भूमि पर स्वामित्व, इस्तेमाल और सांस्कृतिक संरक्षण का अधिकार प्रदान करते हैं।

अधिकार पत्र मिलने के बाद समुदाय के लोग जंगल और उसकी संरचना को और बेहतर बनाने में क्या योगदान दे सकते हैं, इसके लिए पांच गांव के लोगों ने मिलकर जंगलों के संसाधनों का दस्तावेजीकरण एवं प्रबंधन करना शुरू किया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करना और यह समझना था कि पिछले वर्षों में जंगल में क्या बदलाव आए हैं। इस तरह समुदाय के लोगों ने साथ मिलकर रिसोर्स मैपिंग करनी शुरू की। 

गांव वालों ने इलाकों को चालीस-बाई-चालीस मीटर के प्लॉट में बांटकर नक्शा बनाया। समुदाय में इलाकों का नाम रखने का एक पारंपरिक तरीका है। उदाहरण के लिए, जिस इलाके में भालू अक्सर आता है, उसे भालूमारा कहा जाता है। इस तरह, समुदाय आसानी से पहचान पाता है कि किन जगहों का नक्शा तैयार है। वन विभाग के कंपार्टमेंट नंबर की जगह लोग पारंपरिक नामों से जगह की पहचान रखते है। 

इसके साथ ही, संरक्षण और प्रबंधन करते हुए हमने जाना कि किस मौसम में कौन सी दाल, भाजी या जड़ी-बूटी आज भी मिलती है। जलवायु परिवर्तन और कम बारिश के कारण दालों की कुछ किस्में लुप्त होती जा रही हैं। समुदाय पारंपरिक रूप से बेवर (स्थानांतरित खेती) करता रहा है। एक जगह कुछ साल खेती कर, फिर दूसरी जगह चला जाता था ताकि जंगल खुद को दोबारा तैयार कर सके। आज यह परंपरा पहले की तरह प्रचलित नहीं है, जिसका असर चीजों की ऊपज पर देखा गया है।

अब बहुत से पारंपरिक खाद्य पदार्थ भी कम हुए हैं। रिसोर्स मैपिंग के दौरान ही पाया गया कि जैसे पहले अरहर दाल ही पांच तरह की मिलती थी जो अब कम हो गई है। इसी तरह डोड्डे भाजी जो ठंड के दौरान लोग इकट्ठा करते है और गर्मी के दिनों में शरीर को ठंडा रखने के लिए खाते है, वह भी कम ही मिल पाती है। बहुत से बड़े पौधे कम हो गए हैं। साल के पेड़ों की संख्या ज्यादा है, लेकिन गुज्जा, सेझा और धावा कम है। तीन पनिया, गौठेर, दूधिया, चिरायता, हसियादेबो, गुल सीकरी, बड़का दवाई (खून की कमी दूर होने की दवाई) जैसी जड़ी-बूटियां अभी भी देखने को नहीं मिल रही है। 

हमारे द्वारा किए जा रहे प्रबंधन से हमने ये भी देखा है कि छोटे-छोटे बहुत से पौधे आ गए है। जैसे बहरी (झाडू बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला पौधा) अब मिल रही है। जंगल में लगने वाली आग की घटनाएं कम हुई है क्योंकि हर व्यक्ति जंगल की निगरानी को अपनी जिम्मेदारी समझता है।

जंगल के प्रबंधन और समुदाय के लोगों के बीच होने वाली चर्चा से यह बदलाव आया है कि कौन सी चीजें कितनी है, उनका पता चला है। पहले हम लोग बस चीजों को ले आते थे। अब जंगल से हर चीज को जरूरत के हिसाब से ही लिया जाता है। विलुप्त की कगार पर जो चीजें है उनकी जानकारी सब तक पहुंची है। उसके बाद से लोग अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए सजग होकर काम करने लगे हैं। 

इससे हमें यह दस्तावेजीकरण करने में भी मदद मिलती है कि समुदाय सांस्कृतिक रूप से इकोलॉजिकल बैलेंस बनाए रखता है। बैगा समुदाय की संस्कृति में क्लान (गोत्र) की अहम भूमिका है। हर क्लान का रिश्ता किसी न किसी जीव, पक्षी या पौधे से जुड़ा होता है। जैसे कोर्चो बैगा जनजाति में एक गोत्र है जो करील यानी बांस की कोपल (बैम्बू शूट) को नहीं खाता है लेकिन दूसरी जाति के लोग खा सकते हैं। ऐसे ही खोहडिया गोत्र के लोग कछुआ नहीं खाते है। 

सरंक्षण और प्रबंधन के इस काम काम को महिला और पुरुष मिलकर कर रहे हैं। दिन में विशेष रूप से महिलाएं कोर कमेटी के काम को भी संभालती है। समुदाय में ये धारणा मजबूत हुई है कि जंगल हमारे बिना नहीं है और हम जंगल के बिना नहीं है।

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अधिक जानेंः पढ़ें, जंगलों और खेतों के बीच अपना अस्तित्व तलाशता बैगा समुदाय।

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