भारत में थैरेपिस्ट प्रशिक्षण में क्वीयर अनुभवों की अनदेखी
जुलाई 2025 में सुखदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक स्वास्थ्य के अधिकार को जीने के अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा माना है। पहली नजर में यह फैसला एक उल्लेखनीय उपलब्धि लगता है। लेकिन क्या यह अधिकार सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है?
भारतीय क्वीयर जन अमूमन जटिल चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करते हैं। एक ओर, कम से कम सैद्धांतिक रूप में, कानून उनके साथ खड़ा दिखाई देता है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और समलैंगिक जोड़ों को कुछ संवैधानिक संरक्षण और अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि, इन अधिकारों में समलैंगिक विवाह या साझेदारी की कानूनी मान्यता न होना एक प्रमुख अपवाद है। कागजों में क्वीयर लोगों के लिए राज्य द्वारा भेदभाव, उत्पीड़न और वर्जना से मुक्त जीवन का वादा किया जाता है। फिर भी, कानूनी वादों और वास्तविक जीवन के अनुभवों के बीच अभी भी जमीन-आसमान का अंतर बरकरार है।
मानसिक स्वास्थ्य सेवा नीतियों के क्षेत्र में बीते एक दशक में दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने भारत में क्वीयर लोगों की देखभाल तक पहुंच के मुद्दे को गहराई से प्रभावित किया है:
- इसका पहला बिंदु मेंटल हेल्थकेयर ऐक्ट, 2017 है, जिसने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को कानूनी अधिकार बनाया और लिंग, पहचान और यौन रुझान (ओरिएंटेशन) सहित विभिन्न आधारों पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया।
- इसका दूसरा बिंदु 2021 में मद्रास हाई कोर्ट का वह फैसला है, जिसने चिकित्सा पेशेवरों द्वारा ‘कन्वर्जन थैरेपी’ पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाया।
देश में नीतियों और कानूनों में दर्ज प्रावधान अपनी जगह मौजूद हैं। लेकिन उनकी वास्तविक परख तब होती है, जब क्वीयर लोग थैरेपी की तलाश में निकलते हैं। तब कागज और जमीन के बीच की दूरी सबसे साफ नजर आती है।
क्लाइंट–थैरेपिस्ट रिश्ते में बेमेल समझ
मुंबई की 36 वर्षीय क्वीयर मीडिया पेशेवर मीनाक्षी* के लिए क्वीयर-अफर्मेटिव (सहायक) थैरेपी लगभग एक दशक तक अवसाद और चिंता से निपटने का सहारा रही। लेकिन एक क्वीयर-अनुकूल चिकित्सक मिलने के बावजूद उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। खासतौर पर, वह अपने थैरेपिस्ट की जेंडर और सेक्शुअलिटी (यौनिकता) के बीच अंतर समझने की सीमित समझ के बारे में कहती हैं, “मुझे लगता है कि वह खुद क्वीयर हैं, इसलिए सेक्शुअलिटी (यौनिकता) से जुड़े मुद्दों को समझती हैं। लेकिन जेंडर उनके लिए अभी भी एक पहेली है।”
यह अनुभव एक क्लाइंट और थैरेपिस्ट के बीच तालमेल की कमी जैसे एक गंबीर मुद्दे की ओर संकेत करता है, जो अक्सर अपर्याप्त चिकित्सीय शिक्षा और प्रशिक्षण के कारण पैदा होती है। इसके साथ ही, मीनाक्षी को लगातार अपने सत्रों (सेशन) के खर्च का हिसाब लगाना पड़ता है, जिसे वो ‘थेरेपी राशनिंग’ का नाम देती हैं। उनके मन में अक्सर ऐसे सवाल आते हैं कि ‘इस महीने मैं कितने सेशन का खर्च उठा सकती हूं?’, ‘क्या मैं अगले महीने इसे जारी रख पाऊंगी?’
दिल्ली-एनसीआर के 29 वर्षीय गे मैनेजमेंट कंसल्टेंट लक्ष्मण* जब अपने निजी जीवन में गहरे असमंजस के दौर से गुजर रहे थे, तब वह अपने दोस्तों से भी बात नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में एक करीबी मित्र ने उन्हें ऐसे थैरेपिस्ट के पास भेजा, जिन्हें क्वीयर क्लाइंट्स के साथ काम करने का अनुभव था। लेकिन थैरेपी शुरू होने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि यह उनके लिए कारगर नहीं है। वह बताते हैं, “बातचीत बहुत अच्छी थी। लेकिन एक साल बाद मुझे महसूस हुआ कि यह सिर्फ बातचीत ही थी।” दूसरे शब्दों में, यह ‘थेरेप्यूटिक मिसएलाइन्मेंट’ (क्लाइंट–थैरेपिस्ट रिश्ते में बेमेल समझ) का एक उदाहरण था। कैटलिन ओप्लैंड और टायलर जे. टॉरिको के अनुसार इसे ‘पेशेंट –प्रोवाइडर मिसमैच’ भी कहा जा सकता है।
लक्ष्मण ने आगे बताया, “मुझे लगता है कि उनका रवैया बहुत समानुभूतिपूर्ण था। उनसे जितना हो सकता था, उन्होंने मुझे समझने की कोशिश की। लेकिन उनकी व्यक्तित्व शैली मेरे लिए अनुकूल नहीं थी। ऐसे समय में मुझे ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो ज़्यादा दृढ़ और हठी होकर मुझे निर्देश दे पायें। वह मुझे निष्क्रिय लगी। वह मेरे लिए खुलकर अपनी बात रखने का माहौल तैयार कर रही थी, लेकिन हमारे बीच कोई जुड़ाव नहीं बन पाया।”
यह उदाहरण दर्शाते हैं कि केवल क्वीयर मुद्दों के प्रति जागरूकता भर ही पर्याप्त नहीं होती। शोध बताते हैं कि थैरेपी तब सबसे प्रभावी होती है, जब व्यक्तित्व और दृष्टिकोण के बीच वास्तविक सामंजस्य हो और एक मजबूत थेरेप्यूटिक एलायंस (जुड़ाव) बन सके। क्वीयर क्लाइंट अक्सर एक साथ कई दबावों (आजीविका, पारिवारिक अपेक्षाएं, व्यक्तिगत पहचान और सामाजिक पूर्वाग्रह) से जूझते हैं, इसलिए उनके लिए ‘सही’ थैरेपिस्ट ढूंढना और भी कठिन हो जाता है।
थैरेपी को क्वीयर-योग्य बनाना
भारत में थैरेपी न केवल व्यापक रूप से महंगी और असमान गुणवत्ता वाली है, बल्कि यह अक्सर क्वीयर लोगों की विशिष्ट मानसिक स्वास्थ्य जरूरतों को पर्याप्त रूप से नहीं समझ पाती।
दुनिया भर की स्वास्थ्य प्रणालियों में पेशेवरों के पास अक्सर क्वीयर क्लाइंट के साथ प्रभावी ढंग से काम करने का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं होता। भारत की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। मुख्यधारा की मनोविज्ञान डिग्रियों में जेंडर और यौन विविधता पर कोई अनिवार्य मूल पाठ्यक्रम नहीं है। अगर कहीं क्वीयर-अफर्मेटिव प्रशिक्षण मौजूद है, तो वह औपचारिक शिक्षा से बाहर या वैकल्पिक विषयों तक ही सीमित रहता है, न कि बुनियादी क्लिनिकल ज्ञान के रूप में। इसके विपरीत, पश्चिम के कुछ स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में क्वीयर मुद्दों पर समर्पित पाठ्यक्रम या सर्टिफिकेट से संबंधित अध्ययन शामिल हैं। अमेरिका और यूरोप के कई हिस्सों में स्वास्थ्य सेवाओं के भीतर यौन रुझान (ओरिएंटेशन) और जेंडर पहचान पर आधारित सांस्कृतिक दक्षता प्रशिक्षण भी आम होता जा रहा है।
भारत में ऐसे प्रशिक्षण की कमी के कारण, कई अच्छे इरादों वाले थैरेपिस्ट भी क्वीयर क्लाइंट के साथ सार्थक रूप से काम करने के लिए जरूरी ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। औपचारिक और संस्थागत शिक्षण के अभाव में, इस समझ को विकसित करने के लिए उन्हें अनौपचारिक रास्तों का सहारा लेना पड़ता है, जैसे स्वयं के खर्च पर लघु प्रशिक्षण, अनौपचारिक मेंटरशिप नेटवर्क या समुदाय-आधारित सीखने के माध्यम।
कई समीक्षकों के मुताबिक, यह भाषाई और आर्थिक भेदभाव भारत में थैरेपी के क्षेत्र में संभ्रांतवाद को बढ़ावा देता है। यह पूरा तंत्र अमूमन केवल शहरी, सवर्ण, अंग्रेज़ीदा, व्हाइट-कॉलर वर्ग के लोगों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहता है।
मुंबई की क्वीयर मनोवैज्ञानिक त्रिशा*, जो 2018 से अभ्यास कर रही हैं, ने इस अंतर को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। उनका कहना है, “मेरे पास मनोविज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री है और स्नातकोत्तर के बाद मैंने कई कोर्स किए ताकि अपडेट रह सकूं… मैं कई क्वीयर क्लाइंट के साथ काम भी करती हूं।” इसके बावजूद, उनकी औपचारिक शिक्षा में क्वीयर जीवन का लगभग कोई जिक्र नहीं था। उन्होंने बताया, “पढ़ाई के दौरान किसी शिक्षक ने कभी समलैंगिकता पर बात नहीं की। कक्षा में यह सिर्फ एक बार आया, वह भी इवोल्यूशनरी साइकोलॉजी में, सिर्फ जैविक दृष्टिकोण से।”
इस कमी के कारण मारिवाला हेल्थ इनिशिएटिव के क्वीयर-अफर्मेटिव काउंसलिंग प्रैक्टिस (क्यूएसीपी) पाठ्यक्रम जैसे कार्यक्रमों ने उनके प्रशिक्षण को एक अहम मोड़ दिया।
वह बताती हैं, “हम शुरुआती बैचों में से एक थे। सबसे पहले इस बात पर जोर दिया गया कि कॉलेज में हमें जो भी सिखाया गया था, हमें उसे भूलना होगा।”
क्यूएसीपी कार्यक्रम मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों को पैथोलॉजाइजिंग के ढांचों से अलग, जेंडर और यौनिकता की अपनी समझ को एक सकारात्मक, समुदाय-आधारित दृष्टिकोण से फिर से निर्मित करने में मदद करता है। यह दृष्टिकोण क्लाइंट की रोजमर्रा की वास्तविकताओं पर आधारित होता है। उदाहरण के तौर पर, पारिवारिक संघर्ष को केवल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत समस्या या विकार के रूप में देखने के बजाय प्रतिभागियों को यह समझने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि क्लाइंट की पीड़ा किन व्यापक सामाजिक संरचनाओं से जुड़ी है। वे जाति, वर्ग, धर्म, जेंडर, यौनिकता और विकलांगता जैसे कारकों के संदर्भ में स्थिति को पढ़ते हैं, ताकि यह समझा जा सके कि सामाजिक बहिष्कार का जोखिम मानसिक स्वास्थ्य पर किस तरह असर डालता है। यह प्रशिक्षण अंग्रेजी में उपलब्ध है और इसके ऑनलाइन संस्करण की फीस 20,000 रुपये है।
इसी तरह सोशली सोल्ड, जो एक एक बड़ा डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा मंच है, ‘क्वीयर अफर्मेटिव थेरेपी (क्यूएटी)’नामक एक लंबा पाठ्यक्रम प्रदान करता है। यह कार्यक्रम स्व-अध्ययन, लाइव कक्षाओं और पर्यवेक्षित केसवर्क को तीन से चार महीनों में संयोजित करता है। क्यूएटी पूरी तरह ऑनलाइन है और अंग्रेजी में संचालित होता है, जिसकी कीमत 2,999 रुपये है।
क्वीयर थैरेपी प्रशिक्षण तक कौन पहुंच पाता है?
इन कार्यक्रमों की मंशा सकारात्मक होने के बावजूद, इनकी पहुंच को लेकर गंभीर चिंताएं बनी रहती हैं। उदाहरण के लिए, ये लगभग पूरी तरह सिर्फ अंग्रेजी में उपलब्ध होते हैं। इसका अर्थ है कि भारत के अनेक वर्तमान और भावी मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर, जो क्षेत्रीय भाषाओं में क्वीयर-अनुकूल प्रशिक्षण से लाभान्वित हो सकते हैं, इनसे वंचित रह जाते हैं। विडंबना यह है कि यह अंग्रेजी दृष्टिकोण उस भाषाई बहिष्कार को दोहराता है, जिन्हें क्वीयर-अफर्मेटिव ढांचा समाप्त करना चाहता है।
1. क्वीयर-अफर्मेटिव थैरेपी में भाषा की भूमिका
त्रिशा बताती हैं कि थैरेपी से जुड़े परिवेशों में भाषा अक्सर विशेषाधिकार का एक ताकतवर संकेत होती है। वह कहती हैं, “मेरे पास आने वाले लोगों में एक खास तरह का वर्गीय विभाजन दिखता है। एक निश्चित स्तर का विशेषाधिकार। मैं केवल अंग्रेजी और हिंदी बोलती हूं, इसलिए क्लाइंट को मुझ तक पहुंचने के लिए इन भाषाओं में से एक को जानना जरूरी है। मेरी मातृभाषा कोंकणी है। लेकिन शायद ही कोई कोंकणी में थैरेपी लेना चाहता है, इसलिए मैं उनसे नहीं जुड़ सकती।” उनका यह कथन दर्शाता है कि थैरेपी, विशेषकर क्वीयर-अफर्मेटिव थैरेपी तक पहुंच, भाषा, वर्ग और शहरी परिवेश के आधार पर निर्धारित होती है। इससे एक-दूसरे तक पहुंच पाने वाले थैरेपिस्ट और क्लाइंट दोनों का दायरा सीमित हो जाता है।
कई समीक्षकों के मुताबिक, यह भाषाई और आर्थिक भेदभाव भारत में थैरेपी के क्षेत्र में संभ्रांतवाद को बढ़ावा देता है। यह पूरा तंत्र अमूमन केवल शहरी, सवर्ण, अंग्रेज़ीदा, व्हाइट-कॉलर वर्ग के लोगों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहता है। वहीं कामकाजी आबादी और महानगरों से दूर रहने वाले समुदायों के जीवन से यह बहुत दूर नजर आते हैं।
इसका परिणाम केवल कुछ आवाज़ों का बहिष्कार नहीं है, बल्कि यह उन मुद्दों पर चुप्पी को भी मज़बूत करता है, जिनमें जाति, श्रम, अस्थिरता और संरचनात्मक हिंसा शामिल हैं, जिन्हें मुख्यधारा की चिकित्सा-संवाद में अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है, यदि इन्हें सक्रिय रूप से टाला ना जाए तब।
इस प्रक्रिया का नतीजा सिर्फ कुछ आवाजों के बहिष्कार तक सीमित नहीं रहता है। यह उन मुद्दों पर जमी चुप्पी को भी और पुख्ता करता है, जो पहले से ही हाशिये पर हैं। जाति, श्रम, अस्थिरता और संरचनात्मक हिंसा जैसे सवाल मुख्यधारा के थैरेपी-संवाद में अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं, या कई बार उन्हें व्यवस्थित रूप से टाल दिया जाता है।
2. नए काउंसलर महंगे पाठ्यक्रम का खर्च नहीं उठा सकते
इन पाठ्यक्रमों की आर्थिक लागत काफी ज्यादा होती है। 20,000 रुपये से शुरू होने वाला क्यूएसीपी कार्यक्रम कई नए काउंसलरों और सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की पहुंच से बाहर है। 2,999 रुपये वाला क्यूएटी पाठ्यक्रम अपेक्षाकृत सस्ता होने के बावजूद, कई लोगों के लिए अब भी महंगा है। वेतनमान के अनुमान के अनुसार, भारत में एक मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक की औसत वार्षिक आय लगभग 2,00,000 रुपये है, जबकि एक नया पेशेवर औसतन केवल 80,000–1,20,000 रुपये प्रतिवर्ष कमाता है। इस स्थिति में 3,000 रुपये का पाठ्यक्रम भी एक सप्ताह या उससे अधिक की आय के बराबर हो सकता है। 20,000 रुपये की फीस कुछ पेशेवरों के लिए दो से तीन महीनों की बचत के बराबर होती है।
मानसिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण के लिए एक दीर्घकालिक विकल्प
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के अनुसार, 2017 में लगभग 19.7 करोड़ भारतीय किसी न किसी मानसिक विकार के साथ जी रहे थे। 1990 से 2017 के बीच भारत में कुल रोग-भार में मानसिक विकारों का योगदान दोगुने से भी अधिक हो गया है। इस गंभीर स्थिति में क्वीयर लोगों की अतिरिक्त असुरक्षाएं भी जुड़ी हुई हैं, जिनकी संख्या, अनुभव और स्वास्थ्य परिणामों का सरकारी स्वास्थ्य विभाग द्वारा व्यवस्थित रूप से आकलन ही नहीं किया जाता है। नतीजतन, भारत में क्वीयर समुदायों के भीतर मानसिक रोगों की व्यापकता या दर के बारे में हमारे पास स्पष्ट जानकारी नहीं हैं। लेकिन हमें इतना जरूर पता है कि मानसिक स्वास्थ्य सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण से गहराई से प्रभावित होता है। भारत में क्वीयर जीवन केवल निजी अनुभवों से नहीं, बल्कि एक ऐसे सामाजिक माहौल से आकार लेता है जो विशिष्ट प्रकार की सामाजिक वर्जनाओं, अस्थिरता और बहिष्कार से भरा हुआ है।
ऐसे संदर्भ में, क्वीयर-अफर्मेटिव मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए तात्कालिक, महानगर-केंद्रित और केवल ‘सर्टिफिकेट-आधारित’ मॉडल पर्याप्त नहीं हैं। खासकर तब, जब इनको टियर-II और टियर-III शहरों, अर्ध-शहरी क्षेत्रों और ग्रामीण भारत तक सार्थक रूप से पहुंचाना हो। इन क्षेत्रों में क्वीयर पहचान की समझ और भी विविध है, और यह जाति, भाषा, उम्र, भूगोल और धर्म जैसे कारकों से प्रभावित होती है।
इसलिए सरकार और अन्य सार्वजनिक हितधारकों को अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है। इन वास्तविकताओं से निपटने की राज्य की क्षमता पर आज भी सवाल बने हुए हैं। उदाहरण के लिए, मीनाक्षी अधिकार-आधारित कानूनों की परिवर्तनकारी क्षमता को लेकर बिलकुल आश्वस्त नहीं थी। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि मेंटल हेल्थकेयर ऐक्ट का क्वीयर और ट्रांस लोगों की वास्तविकताओं से कोई सीधा संबंध है। यह कानून बहुत अमूर्त है और चिकित्सकों के प्रशिक्षण अनुभवों तक शायद ही पहुंचेगा।”
हालांकि, गौरतलब है कि राज्य ने इस खाई को पाटने के लिए कुछ प्रयास किए हैं। वर्ष 2022 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत केंद्रीय बजट में नेशनल टेली मेंटल हेल्थ प्रोग्राम-टेली-मानस की घोषणा की गई। यह पहल सार्वभौमिक, समान और सुलभ मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का वादा करती है। अक्टूबर 2025 तक, टेली-मानस के देशभर में 53 केंद्रों में संचालित होने की बात कही गई, जहां 600 से अधिक प्रशिक्षित काउंसलर, 20 भाषाओं में 24×7 सहायता प्रदान कर रहे हैं। इसके अलावा, इस कार्यक्रम ने कथित तौर पर 27 लाख से अधिक कॉल्स का जवाब दिया है। पैमाने और आधारभूत संरचना के लिहाज से यह भारत की सबसे महत्वाकांक्षी सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य पहलों में से एक है।
फिर भी, केवल विस्तार अपने आप में पहुंच सुनिश्चित नहीं कर सकता। वर्ष 2024 में दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के 207 प्रतिभागियों पर किए गए एक क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन में पाया गया कि इस कार्यक्रम के बारे में सार्वजनिक जागरूकता सीमित थी। केवल 34.3 प्रतिशत लोग टेली-मानस से परिचित थे, जबकि 65.7 प्रतिशत को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यदि सरकार सही मायने में समावेशी मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना चाहती है, विशेषकर उन क्वीयर लोगों के लिए जो सभ्रांत शहरी ताने-बाने से बाहर रहते हैं, तो उसे अपने जागरूकता और सुगमता से जुड़े अभियानों को और सशक्त करना होगा।
1990 से 2017 के बीच भारत में कुल रोग-भार में मानसिक विकारों का योगदान दोगुने से भी अधिक हो गया है। इस गंभीर स्थिति में क्वीयर लोगों की अतिरिक्त असुरक्षाएं भी जुड़ी हुई हैं।
सरल शब्दों में कहें तो क्यूएसीपी और क्यूएटी जैसे कार्यक्रमों की सीमाएं हों या मानसिक स्वास्थ्य कानूनों और नीतियों की व्यापक कमियां—इनका टिकाऊ समाधान तभी संभव है, जब देखभाल पाने की कोशिश कर रहे क्वीयर लोगों के वास्तविक अनुभवों को केंद्र में रखा जाए। इसके लिए ऐसे दृष्टिकोण और तरीकों की जरूरत है, जो समानता पर आधारित हो, सचमुच समावेशी हो, और अलग-अलग सामाजिक पहचानों व स्थितियों के अंतर्संबंधों को समझते हो।
जैसा कि मीनाक्षी ने कहा, “मैं एक ऐसे नए थैरेपिस्ट की तलाश में हूं, जो ट्रांस-अफर्मेटिव हो, मेरे बजट में हो और थोड़ा अधिक मुखर हो, ताकि मैं अपनी बात समझा सकूं।” व्यवहार में, मुखर होने का अर्थ आक्रामक होना नहीं है, बल्कि एक ऐसा स्थिर दृष्टिकोण अपनाना है जिसमें थैरेपिस्ट सक्रिय रूप से पैटर्न को पहचानने और नाम देने में मदद करे, बजाय इसके कि क्लाइंट पर ही सारी व्याख्या का भार डाल दिया जाए। मीनाक्षी जैसे क्लाइंट के लिए, जो अभी भी अपने जेंडर और यौनिक अनुभवों की भाषा तलाश रहे हैं, “शब्दावली खोजना” उस धीमी और नाजुक प्रक्रिया को दर्शाता है जिसमें उन्हें अस्पष्ट बेचैनी और हताशा से बाहर ऐसे शब्द मिलते हैं, जो सामाजिक रूप से समझने योग्य और भावनात्मक रूप से सटीक लगें। वह कहती हैं, “उदाहरण के लिए, मेरे और मेरे थैरेपिस्ट के पास भी डिस्फोरिया या ट्रांस व्यक्ति के रूप में अस्तित्व से सम्बंधित शब्दावली ही नहीं थी।”
इसलिए, असली चुनौती केवल अधिक निजी पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की नहीं है। बल्कि भारत जैसे भाषाई, आर्थिक और सामाजिक रूप से विविध देश में क्वीयर-अफर्मेटिव मानसिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण की नई कल्पना करने की है।
* गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदले गए हैं।
रोहिणी नायर ने भी इस लेख में योगदान दिया है।
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।
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लेखक के बारे में
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कनव नारायण सहगल विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में न्याय, द ऐक्सेस टू जस्टिस वर्टिकल में प्रोग्राम और कम्युनिकेशंस मैनेजर हैं। वह नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में क्वीयर अधिकार और राजनीति पर एक वैकल्पिक पाठ्यक्रम भी पढ़ाते हैं। कनव कोलकाता में रहते हैं।
