मानसून की इस लगातार होने वाली बारिश को देखकर 21 साल के शुभम* ने समझ लिया कि आज की रात काफ़ी भारी गुजरने वाली है। वह अपनी बस्ती के घरों में जमा हुए बारिश के पानी को निकालने के लिए दूसरे लोगों का इंतज़ार कर रहा है। उसके पिता अपने ‘मर्दाना’ कर्तव्यों को पूरा करने में जुटे हुए हैं। वे इतना कमा लेते हैं कि अपने पांच लोगों के परिवार के खाने, कपड़े, घर और पढ़ाई के खर्च उठा सकें। शुभम के पिता एक सुरक्षा गार्ड हैं और उनकी रातें मुंबई की ऊंची इमारतों के बाहर खड़े होकर उनपर निगरानी रखते और जाने-पहचाने चेहरों से दुआ-सलाम करते हुए बीतती हैं।
शुभम का जीवन बेशक भारत के शहरों में जी रहे मध्यम वर्गीय लड़कों के जीवन से बहुत अलग है। लेकिन, यकीनन इन दोनों ही तबकों के बीच एक समानता है: शुभम और उसके सम्पन्न समकक्षों को आज देश में एक उस दबाव का सामना करना पड़ता है जो ‘पुरुष’ की परिभाषा के इर्द-गिर्द पनपता है। दरअसल आर्थिक पृष्ठभूमि से परे आज के दौर में भारत में पुरुषों और लड़कों पर लागू किए गए मर्दानगी के सख़्त लैंगिक पैमानों से कोई भी अछूता नहीं है।
इन दबावों को गहराई से समझने के लिए रोहिणी निलेकनी फ़िलांथ्रपीज ने इस साल की शुरूआत में एक शोध1 करवाया। हम दोनों ने इस शोध का जिम्मा संभाला जिसमें अपनी भूमिकाओं को निभाने के दौरान युवा पुरुषों और लड़कों के जीवन में आने वाली चुनौतियों और उनकी चिंताओं का पता लगाने की कोशिश की गई। हमने प्रतिभागियों के कुल आठ ऑनलाइन समूह बनाए। इस अध्ययन में मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली में रहने वाले एसईसी ए और एसईसी सी/डी (सामाजिक-आर्थिक स्पेक्ट्रम के दो अलग-अलग हिस्से) के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इन 42 लड़कों और 12 लड़कियों से हमने कई तरह के प्रश्न किए। हमने उनसे पूछा कि वर्तमान में भारत में एक पुरुष या लड़का होने का क्या मतलब है? हमें लगातार और ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली जिसमें कहा गया कि इसका सीधा अर्थ ज़िम्मेदारी है। लड़कियों के मामले में इसी सवाल का जवाब प्रतिबंध था।
लड़के और लड़कियों दोनों ने स्पष्ट किया कि लड़कों के लिए वयस्कता कैसे दबे पांव आती है – बचपन की मासूमियत से शुरू होकर लड़कपन आते-आते ज़िम्मेदारी का अहसास होने लगता है, और आख़िर में ये ज़िम्मेदारियां स्वीकार कर ली जाती हैं जो एक मर्द होने की निशानी होती है। 15 वर्ष के महेश* का कहना है कि “पारिवारिक मामलों के लिए हमें ऐसा महसूस होता है कि पूरा परिवार (ज़िम्मेदारी) हमारे ही कंधों पर है। मैं दसवीं में पढ़ता हूं और अभी छोटा हूं। लेकिन मुझे यह एहसास होता रहता है कि मैं बड़ा हो रहा हूं। पर हम इसके बारे में किसी से बात नहीं कर सकते हैं…हमें पहले से ही इसकी समझ है कि आगे क्या करना है।”
तो ज़िम्मेदारी का क्या अर्थ है?
1. पूरे परिवार के लिए ‘भरण–पोषण करने वाला/कमाऊ’ बनना
ज़्यादातर लड़कों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद सबसे स्पष्ट विकल्प अपने पिता की जगह लेना और उनकी जिम्मेदारियों को अपने ऊपर लेना होता है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे कमाकर परिवार का भरण-पोषण करें। इसका दूसरा अर्थ परिवार के लिए खाना, माता-पिता के स्वास्थ्य संबंधी ख़र्चों की पूर्ति और घर के अन्य सभी ख़र्चों के लिए पर्याप्त धन कमाना है। अपने प्रतिभागियों के साथ की जाने वाली बातचीत और बहसों के दौरान हमने बार-बार जो बात सुनी वह यह थी कि एक ‘अच्छे’ बेटे को अपने भाई-बहन के लिए आदर्श बनना चाहिए। निम्न आय वाली पृष्ठभूमि से आने वाले लड़कों से भी यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने छोटे भाई-बहनों को लायक़ बनाए। इसका सीधा मतलब होता है अपने भाई की पढ़ाई पूरी करवाना और बहन की शादी की ज़िम्मेदारी उठाना।
लेकिन परिपक्वता एक दिन में नहीं आती है। कई लड़कों का कहना था कि कम उम्र में मिलने वाली उनकी आज़ादी पर धीरे-धीरे पारिवारिक भूमिकाओं ने लगाम लगानी शुरू कर दी। पुरुषों और लड़कों से की जाने वाली अपेक्षाओं में अनकहे नियमों और पहले से तय लैंगिक भूमिकाओं का काफ़ी योगदान होता है।
2. जुनून और रुचि के लिए कोई जगह नहीं है
अपने परिवार की देखभाल करने के लिए एक पुरुष को पैसे चाहिए। पैसे कमाने के लिए उसे एक स्थाई और अच्छी तनख़्वाह वाली नौकरी की ज़रूरत होती है। और, ऐसी एक नौकरी पाने के लिए उसे उचित समय और डोमेन में अच्छी शिक्षा की आवश्यकता होती है। इसके कारण आमतौर पर उनके पास केवल ऐसे दो या तीन पेशों का विकल्प होता है जिन्हें वे अपना सकते हैं। संगीत, कला, बॉडीबिल्डिंग और यहां तक कि ह्यूमैनिटीज़ के लिए भी किसी तरह की ‘गुंजाइश’ नहीं रह जाती है। इन्हें एक असफल जीवन की लम्बी यात्रा के रूप में माना जाता है। इसलिए लड़कों को विरले ही इस तरह की चीजों में भाग लेने की अनुमति दी जाती है।
3. भावनाएं व्यक्त करने की सख्त सीमाएं
नवयुवकों में हताशा को और अधिक बढ़ाने का एक कारण यह भी है कि उन्हें भावनाओं का एक सीमित क्षेत्र दिया गया है। एक अदृश्य लेकिन स्पष्ट सीमा यह बताती है कि किस बात की अनुमति है और किसकी नहीं। ताक़त के प्रदर्शन की सराहना की जाती है। भय, उदासी और स्नेह अंत में क्रोध, अवमानना या रूढ़िवाद के रूप में व्यक्त किए जाते हैं। वहीं आंसू एक छुपे हुए रहस्य जैसे हैं। 19 साल के राघव* का कहना है कि “अगर एक लड़का रोना चाहता है तो उसे अपने बिस्तर पर तकिए से मुंह ढक कर और कम्बल के नीचे रोना पड़ता है ताकि उसे कोई देख न सके।”
20 साल के आदित्य* के अनुसार “सोसायटी में इज्जत कम हो जाएगी क्योंकि लड़के मज़बूत होते हैं उन्हें स्थितियों से निपटना आना चाहिए। अगर आप अपनी कमजोरी दिखाते हैं तो वे आपको सबसे कमजोर इंसान महसूस करवा देंगे।” अक्सर ये दबी हुई भावनाएं तेज, आक्रामक और हिंसक व्यवहार का रूप ले लेती हैं। समाज को लड़कों के आंसुओं से इतना डर क्यों लगता है? हो सकता है इसका संबंध उनकी प्रतिष्ठा से ज़्यादा हमारी ज़रूरतों से हो।


4. पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रही मर्दानगी के मानदंड
हमने जिन लड़कों से बात की, उनमें से कुछ ही अपने पिता को अपने जीवन के आदर्श के रूप में देखते हैं। हालांकि गहन पूछताछ पर कई लड़कों ने उन पर पड़ने वाले अपने पिता के प्रभावों के बारे में बताया। शुरू में दोनों के बीच के रिश्ते में एक दूरी रहती है और मां बच्चे की रक्षा और उसका पालन-पोषण करती है। अक्सर पिता की छवि एक रहस्यपूर्ण या अस्पष्ट व्यक्ति की होती है। वह रात में कुछ घंटे के लिए घर पर होता है और उस समय इतना अधिक थका होता है कि उसके पास अपने बेटे में दिलचस्पी लेने या उसके साथ समय बिताने की ताक़त नहीं होती है। एक निश्चित उम्र में एक दूसरे के बीच होने वाली दूरी और डर का यह रिश्ता एक दूसरे को समझने में बदल जाता है। ऐसा अक्सर तब होता है जब बेटा परिवार की ज़िम्मेदारियां उठाने लायक़ हो जाता है। इस तरह से मर्दानगी का यह विचार एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुंचता है।
5. पत्नी के ‘लायक’ बनना ज़रूरी है
लड़कों पर दबाव बनाने वाली एक और अपेक्षा है ‘लड़की के लायक़ बनना’। बेहतर होते शिक्षा-स्तर और आर्थिक आत्मनिर्भरता के कारण लड़कियां अपने जीवन में आने वाले पुरुषों के लिए पैमानों को उंचा कर रही हैं। लड़कों ने ध्यान दिया है कि आज की लड़कियां और किशोरियां अपना ध्यान रख सकती हैं, फ़ैसले ले सकती हैं, अपनी आवाज़ उठा सकती हैं और पुरुष की कमियों को लेकर कम सहिष्णु हैं। इसलिए वे किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में होती हैं जो जीवन में उनसे बेहतर कर रहा हो।
तो कौन सी चीज़ लड़कों को लड़कियों से शादी करने योग्य बनाती है? हमने 22–24 साल के लड़कों के समूह के साथ इंटरव्यू किया। उन लड़कों का कहना था कि लड़कियां और उनके माता-पिता एक ही आदमी में सब कुछ चाहते हैं। कोई ऐसा जो सफल हो, अच्छा कमाता हो, अच्छे इलाके में रहता हो। उसके पास एक कार, अच्छी और प्रतिष्ठित नौकरी, माता-पिता और कुछ सभ्य दोस्त होने चाहिए। यह सूची लम्बी है और हमारे अध्ययन में शामिल ज़्यादातर लड़के इस सूची से घबराए हुए थे।
6. करियर में सफलता और सामाजिक सम्मान दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं
एक लड़के के लिए तय किया गया अंतिम लक्ष्य ‘घर बसाना’ है। लेकिन इस तमग़े को हासिल करने के लिए दो पूर्व निर्धारित शर्तें हैं – भौतिक सफलता और इज्जतदार छवि। हमारे अध्ययन में भाग लेने वाले प्रतिभागियों के अनुसार ‘इज्जतदार छवि’ का अर्थ था पढ़ाकू होना, सिगरेट और शराब न पीना और सफलता के रास्ते से भटकाने वाले लोगों से बच कर रहना। उनका कहना था कि इस दोषहीन जीवन से उनका विवाह एक अच्छे परिवार की लड़की से हो जाएगा।
7. पिछली पीढ़ियों की तुलना में लड़कों की सफलता की उम्मीदें बहुत अधिक हैं
हालांकि ये दबाव नए नहीं है लेकिन आज की तारीख़ में लड़कों के पास पिछली पीढ़ियों की तुलना में नई चीज़ें ढूंढने और पढ़ने के लिए अधिक साधन मौजूद हैं। जिम्मेदारियों को कुछ समय तक परे रखा जा सकता है। 18 साल की उम्र से ही काम शुरू करने वाले पिता अपने बेटों को एमबीए करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं।
तब से अब तक रोज़गार के अवसरों में भी विस्तार हुआ है और इसके साथ ही प्रतिस्पर्धा में भी वृद्धि हुई है। यह स्थिति न केवल लड़कों के लिए बदली है बल्कि अब पहले से अधिक पढ़ाई-लिखाई करने वाली और परीक्षाओं में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली लड़कियों के लिए भी बदली है। एक तरफ़ जहां रास्ते अधिक जटिल होते जा रहे हैं वहीं लक्ष्य भी लगातार बदल रहे हैं। अब मेहनती और कर्तव्य निभाने वाला पुरुष होना भर काफ़ी नहीं है। अपने परिवार (और साथी) से सम्मान पाने के लिए एक पुरुष को ‘अपने काम में सबसे अच्छा’ होना ज़रूरी है। एक आदर्श सामाजिक स्थिति है – अत्यधिक प्रतिष्ठित और दूसरों द्वारा प्रशंसित। अक्सर मुकेश अम्बानी को आदर्श माना जाता है – एक ऐसा आदमी जो न केवल सफल है बल्कि उसकी समाज में प्रतिष्ठा भी है और वह एक सच्चा ‘फ़ैमिली मैन’ भी है।
ये सभी उम्मीदें हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इस कदर शामिल हैं कि हम अक्सर लड़कों को सही रास्ते पर रखने वाले बारीक (और इतने बारीक नहीं भी) तरीक़ों को देखने में असफल रहते हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वह जो भी काम करें उसमें प्रतिस्पर्धा हो और वे हमेशा जीतें। यह एक आम धारणा है कि “अगर वह इसका हिस्सा है तो उसे सबसे आगे होना चाहिए।” इस प्रतिस्पर्धा को ‘शर्माज़ी का बेटा सिंड्रोम’ से और बढ़ा-चढ़ा दिया गया है जिसमें माता-पिता लगातार अपने बेटों की तुलना दूसरे लड़कों से करते हैं। यहां तक कि रिश्तेदार भी उनके प्रदर्शन पर अपनी टीका-टिप्पणी करने से बाज नहीं आते हैं। यह तुलना शादी की उम्र तक आते-आते और ज़्यादा गहरी हो जाती है। जब लड़की का परिवार उसकी शादी के लिए एक उपयुक्त लड़का खोजने निकलता है तब नौकरी, वेतन और ज्ञान जैसी बातें ज़रूरी पैमाना होते हैं।
8. उच्च अपेक्षाएं सख्त निगरानी और यहां तक कि सजा की स्थिति तक पहुंचा देती हैं
लड़कों का मूल्यांकन उनके कामकाज के अलावा उनके व्यक्तित्व के लिए भी किया जाता है। “बालों को ऐसे क्यों रखा है? क्या जंगली की तरह रह रहे हो? ऊंची आवाज़ में नहीं बोलना, बड़ों की बात सुननी है – यह तब भी सुनना पड़ता है जब हम बड़े हो चुके हैं। माता-पिता को इस बात की चिंता होती है कि दोस्त कुछ सिखा न दें, ये सब आदतें नहीं पालनी चाहिए।”
उनके दोस्तों पर नज़र रखी जाती है ताकि वे ‘बुरी संगत’ में न पड़ जाएं। यह जांच-परख लड़कियों के साथ उनके रिश्तों तक पहुंच जाती है। माता-पिता और शिक्षक लड़कों को शक की नज़र से देखते हैं। बिना किसी टीका-टिप्पणी और पूर्वाग्रह के किसी लड़की के साथ एक साधारण दोस्ती रखना असम्भव है। ‘मैंने प्यार किया’ फ़िल्म आए तीस साल हो गए लेकिन आज भी हमारे युवाओं की मानसिकता इस तरह बनाई जाती है कि “एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते।”
अनुशासन के इन निम्न-स्तरीय तरीक़ों में शारीरिक सजा चार-चांद लगाने का काम करती है। जिन लड़कों से हमने बात की, उन्हें उनके माता-पिता या शिक्षकों ने या तो थप्पड़ मारा था या पीटा था। सामाजिक संस्कार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कई लोगों का ऐसा मानना है कि उन्हें शारीरिक दंड का भागी होना चाहिए। वे अपनी ‘अक्षमताओं’ को उजागर कर इसे सही ठहराते हैं। “रीजन से मारते हैं, पढ़ाई नहीं की – तो मारना ठीक है। शिक्षक का तुम्हें मारना सही है। जब कोई तुम्हें पढ़ाएगा तो ग़ुस्सा आएगा। यहां तक कि अभिभावकों का अपने बच्चों को पीटना भी सही है – वे हमें सिखा रहे हैं।” समाज की पारंपरिक मांगों को पूरा करने में असफल होने वाले पुरुषों को अक्सर ही बेरोज़गार, निकम्मा, बर्बाद, कामचोर और नालायक जैसे तमग़े दिए जाते हैं। और ये सब नरम शब्द हैं जिन्हें लड़के हमारे साथ साझा करना चाहते थे; आमतौर पर तो उन्हें गालियां सुननी पड़ती हैं।
9. ‘लड़कों के गिरोह’ का हिस्सा होने से सुरक्षा और साथ तो मिलता है लेकिन दुर्व्यवहार भी होता है
शायद ‘लड़कों का गिरोह’ ही वह जगह है जहां लड़के खुद होकर रह सकते हैं। यह आपस में मज़बूती से जुड़े हुए लड़कों का एक समूह है जहां वे एक-दूसरे के भाई/दोस्त/यार बन जाते हैं। वे बिना ज्यादा कुछ कहे गहरी समानुभूति और एक-दूसरे के जीवन की समझ पर आधारित एक अनोखी दोस्ती बनाते हैं। लड़कों के साथ हमारी बातचीत से हमने जाना कि लड़कों का किसी समूह में शामिल होने से उनकी पहचान तय होती है और इससे उनकी सोच बनती है और उन्हें सुरक्षा मिलती है। समूह का आपसी समीकरण उनके द्वारा एक दूसरे के जीवन में निभाई जाने वाली भूमिकाओं के बारे में बताता है। यह भूमिका एक लीडर या मेंटॉर आदि की हो सकती है।
समूह का हर एक लड़का अपनी मर्दानगी साबित करना चाहता है। इसलिए जहां उनका यह गिरोह बाहरी दुनिया से उनकी सुरक्षा करता है वहीं समूह के भीतर एक दूसरे को चिढ़ाना, मिलकर उपद्रव करना और आपस में गाली देना वगैरह आम बातें है। हमें बताया गया कि यह सब बॉडी शेमिंग का रूप ले लेता है। लड़कों को उनके आकार, उंचाई, रंग, दाढ़ी-मूंछ आदि जैसी शारीरिक अपेक्षाओं के आधार पर चिढ़ाया जाता है। अक्सर मोटा, सूखा, गिट्टा, बौना, कलुआ और चिकना (गोरे या समलैंगिक लड़कों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द) जैसी गालियों का इस्तेमाल कर उन्हें चिढ़ाया जाता है।
सबसे ख़राब स्थिति में यह समूह वही ‘बुरी संगत’ बन जाता है जिससे बचने के लिए माता-पिता उन्हें आगाह करते हैं। लड़कों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस समूह की बदमाशियों की पुष्टि करें। इन बदमाशियों और ग़लतियों में धूम्रपान करना, शराब पीना, नशीले पदार्थों (ड्रग आदि) का सेवन करना और कभी-कभी लड़कियों का पीछा करना और हिंसा भी शामिल होता है।
समाज की कभी ख़त्म न होने वाली पूछताछ एक प्रकार की निगरानी का काम करती है ताकि लड़के अपनी ज़िम्मेदारियों को गम्भीरता से लें। इसका इरादा इस तथाकथित योग्य लिंग को सफलता के लिए तैयार करना है। लेकिन नज़दीक से देखने पर हम पाते हैं कि ये अपेक्षाएं दरअसल वे बोझ हैं जिन्हें लड़कों को चाहे-अनचाहे उठाना पड़ता है। उससे मिलने वाली आज़ादी, छूट और विशेषाधिकार के साथ एक अनकही समझ जुड़ी होती है। एक लड़के की सफलता वह आरओआई है जिसमें परिवार अपना निवेश करता है। यह उनके बुढ़ापे का बीमा है। यह फोकस समूह चर्चाओं में लड़कियों और लड़कों दोनों द्वारा व्यक्त किया गया विचार था।
इसलिए, सफलता की उम्मीद ही काफी नहीं है। एक सफल फ़ैमिली मैन (पारिवारिक आदमी) ही आदर्श होता है। एक ऐसा पुरुष जो न केवल करियर में बेहतर कर रहा हो बल्कि अपने परिवार का भी ख़्याल रखने वाला हो। उपलब्धियों को हासिल करने वाला एक ऐसा पुरुष जो अब भी अपनी जड़ों से जुड़ा है।
जहां इस अध्ययन से हमें कई जवाब मिले वहीं कई ज़रूरी सवाल भी पैदा हुए। क्या लड़के जिस आज़ादी का आनंद लेते हैं वह सशर्त होती है? क्या लोगों की उम्मीदें लड़कों को उन पर खरा उतरने की चिंता से भर देती हैं? जब उन्हें कई तरह के फ़ायदे मिलते हैं तो वहीं क्या उन्हें मिलने वाले विशेषाधिकार के पीछे बेहतर करने का दबाव भी छुपा होता है?
क्या नवयुवकों और लड़कों से जुड़ी हमारी कुछ अवधारणाओं पर दोबारा सोचने का समय आ गया है?
*नाम बदल दिए गए हैं।
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फुटनोट:
- इस अध्ययन का इरादा चिंताओं, चुनौतियों और रिश्तों में लड़कों की भूमिकाओं को समझना है। यह शोध ऑनलाइन फ़ोकस ग्रुप और मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली में रहने वाले प्रतिभागियों के माध्यम से किया गया है। इस अध्ययन में प्रश्नों के जवाब देने वाले सामाजिक-आर्थिक स्पेक्ट्रम के दो स्पष्ट अलग-अलग वर्गों एसईसी ए और एसईसी सी/डी से हैं। इन छह फ़ोकस समूहों में शामिल प्रतिभागियों में 14 से 25 वर्ष की उम्र (विद्यालय से कॉलेज के बाद) के लड़के थे। इसके अलावा दो अन्य फ़ोकस ग्रुप भी बनाए गए थे जिसमें कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुकी 22 से 25 वर्ष की उम्र वाली लड़कियों ने भाग लिया था। यह बातचीत हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं में की गई थी। सैम्पल के चुनाव में ग़ैर-बाइनरी लोगों को मानदंड नहीं बनाया गया था और ऐसा सम्भव है कि यह अध्ययन ग़ैर-बाइनेरी विचारों को प्रस्तुत न करे।
इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें।
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लेखक के बारे में
- आशुतोष वाकणकर बैंगलोर स्थित क्रैकर एंड रश नाम की एक ब्रांड स्ट्रेटेजी एंड आइडेंटिफ़िकेशन फर्म के सह-संस्थापक हैं। वे ब्रांड्स की परिभाषा, डिज़ाइन और उन्हें विकसित करने जैसे विषयों का अध्ययन करते रहे हैं। उनका विश्वास है कि जीवन को बेहतर करने में ब्रांड महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आशुतोष मानते हैं कि इस अति-प्रतिस्पर्धी समय में संगठनात्मक पहचान भेदभाव का सबसे स्थायी रूप है और इसे रणनीतिक सोच के केंद्र में होना चाहिए।
- ऋचा छाबरा क्रैकर एंड रश में वरिष्ठ रणनीतिज्ञ (सीनियर स्ट्रैटेजिस्ट) हैं। ग्राहक रिसर्च एंड ब्रांड स्ट्रैटेजी के क्षेत्र में उन्हें एक दशक से अधिक का अनुभव हासिल है। उनकी रुचि मनोविज्ञान में है और वे दुनिया को इसी मनोविज्ञान और अनकहे को समझने के अपने नज़रिए से देखती हैं। ऋचा अपने इस नज़रिए का इस्तेमाल शोध में नई अंतर्दृष्टि लाने के लिए भी करती हैं। वे एक ऐसी दुनिया में रहती हैं जहां धारणाएं नहीं हैं और हर दिन एक क्षेत्र, ब्रांड या उपभोक्ता के बारे में कुछ अनोखा पता लगाने की कोशिश की जाती है।






