कभी-कभी हेड ऑफिस से आने वाले फील्ड टीम की ‘मदद’ कैसे करते हैं?
कुछ स्थितियां जब हेड ऑफिस से आने वालों को ज़मीनी कार्यकर्ताओं की मदद की ज़रूरत होती है।

1. पहले तो… वेरी मच एक्साइटेड!
“मैं कल फील्ड पर ज़मीनी कार्यकर्ताओं की मदद के लिए जा रही हूं।”

2. होटल पहुंचकर… डर के आगे फोन कॉल है
“मेरे कमरे में छिपकली है! कोई और जगह ढूंढो, मुझे यहां नहीं रहना।”

3. गांव में, विज़िट पर चलते-थकते
“चलने के लिए बहुत ज्यादा है, सर्वे के लिए इतना दूर का गांव क्यों ले लिया!”

4. फील्ड पर हर समस्या का हल, एक फोन कॉल
“ओ माई गॉड, अब क्या करूं? गांव में इतने सारे कुत्ते क्यों हैं!”

5. हो गया सर्वे, हो गई मदद… बस एक और फोन
“यहां सब ठीक ही चल रहा है, मुझे अब वापस निकल जाना चाहिए, मेरे लिए गाड़ी का इंतजाम करो!”

लेखक के बारे में
- इंद्रेश शर्मा आईडीआर हिंदी में पार्टनरशिप और आउटरीच हेड हैं। वे संगठन की पहुंच बढ़ाने और असरदार साझेदारी बनाने के लिए विकास सेक्टर से जुड़े विभिन्न हितधारकों के साथ मिलकर काम करते हैं। इन्द्रेश संस्थागत सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ जमीनी संगठनों के लिए कैपेसिटी बिल्डिंग से जुड़े लेखन में भी सक्रिय रूप से योगदान देते हैं। उनके पास विकास सेक्टर में 13 वर्षों से अधिक का पेशेवर अनुभव है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, ग्रामीण विकास और पंचायती राज जैसे क्षेत्रों में काम किया है। इससे पहले वे सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च संस्था से जुड़े थे, जहां वे रिसर्च, कार्यक्रम निर्माण और प्रशिक्षण के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं।
- रवीना कुंवर, आईडीआर हिंदी में डिजिटल मार्केटिंग एनालिस्ट हैं। इससे पहले वे एक रिपोर्टर के तौर पर काम कर चुकी हैं जिसमें उनका काम मुख्यरूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित था। रवीना, मीडिया और कम्युनिकेशन स्टडीज़ में स्नातकोत्तर हैं।
