थारू आदिवासी: जहां प्रतिरोध एक परंपरा है
उत्तर प्रदेश के घने जंगलों वाले ज़िले लखीमपुर खीरी में, दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना साल 1977 में की गई थी। तब से इलाके के थारू आदिवासी, अपने गांवों में बसे रहने के लिए वन विभाग के साथ संघर्ष कर रहे हैं। इन्हें विस्थापित करने का इरादा रखने के अलावा वन विभाग, वन संसाधनों जैसे औषधीय जड़ी-बूटियों, जंगली घास और गिरे हुए पेड़ों की लकड़ी तक इनकी पहुंच को भी सीमित करता है।
थारू आदिवासी पिछले पांच दशकों से आंदोलन कर रहे हैं। इस दौरान, समय-समय पर उनकी लड़ाई में कई बदलाव आए हैं। थारू आदिवासियों ने अदालत में क़ानूनी लड़ाई लड़ी और हारे, फिर वे राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच जैसे राष्ट्रीय मंचों के तहत संगठित हुए। इसके साथ ही, उन्होंने थारू आदिवासी महिला मजदूर किसान मंच का गठन किया जो एक जन आंदोलन है। इसके ज़रिए वे अपना संघर्ष जारी रख रहे हैं। अपने आंदोलन की शुरुआत से ही उन्होंने अहिंसक विरोध किया है। अब लोगों ने सामुदायिक वन अधिकारों की मांग के लिए वन अधिकार अधिनियम (एफआरए), 2006 जैसे कानूनी साधनों का उपयोग करना भी सीख लिया है। थारू समुदाय की युवा पीढ़ी अब उन विशेषाधिकारों की मांग कर रही है जो उन्हें संविधान द्वारा एक भारतीय नागरिक होने पर दिए गए हैं।
थारु आदिवासियों के लिए प्रतिरोध एक परंपरा बन गया है – जो एक से दूसरी और दूसरी से तीसरी पीढ़ी तक चला आ रहा है। पुरानी पीढ़ी ने युवाओं को लड़ने के लिए कैसे प्रेरित किया? युवा आंदोलन में क्या नया लेकर आए हैं? और, दोनों पीढ़ियों ने एक दूसरे से क्या सीखा है? इन तमाम बातों पर आईडीआर ने वन विभाग को अदालत में ले जाने वाले 65 वर्षीय कार्यकर्ता रामचन्द्र, और सहबिनया राना से बात की है। सहबिनया , 18 साल की उम्र से इस संघर्ष से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने सोशल वर्क की पढ़ाई की है और बैठकों और विरोध प्रदर्शनों में अपने पिता के साथ जाकर काम करना सीखा है।
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रोहिणी निलेकनी फ़िलांथ्रपीज (आरएनपी) उन विचारों, व्यक्तियों और संस्थानों का समर्थन करना चाहता है जो नैतिक नेतृत्व, तात्कालिकता की भावना और सीखने के साहस के साथ एक मजबूत समाज को सक्षम बनाने जैसा महत्वपूर्ण काम करते हैं। आरएनपी उन समुदायों को मजबूत करना चाहता है जो अपनी बेहतरी के लिए काम करते हैं। यह उन नेटवर्क और आंदोलनों का समर्थन करके ऐसा करता है, जो अक्सर समाज, सरकार और बाजार के बीच बैठता है। यह पर्यावरण, जैव विविधता और संरक्षण, लैंगिक समानता, और सक्रिय नागरिकता और न्याय तक पहुंच जैसे चार क्षेत्रों में फ़ंडिंग करता है।
लेखक के बारे में
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सहबिनया राना, दुधवा टाईगर रिज़र्व में आने वाले गांव सूरमा की थारू आदिवासी हैं। पिछले आठ वर्षों से वह अपना पूरा समय वनाधिकार आंदोलन को दे रही हैं और एक सक्रिय कार्यकर्ता हैं। वर्तमान में वे थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच की सह-महासचिव भी हैं। सहबिनया ने सन 2016 में समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र व हिन्दी विषयों में श्री भूपराम धर्मेश्वर प्रसाद महाविद्यालय, सीतापुर से बीए की परीक्षा पास की है। खेलों में बचपन से ही रूचि रखने वाली सहबिनया गोला फेंक और चक्का फेंक खेलों में राज्य स्तर पर कई बार दूसरे स्थान पर रही हैं।
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रामचन्द्र उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में स्थित सूरमा गांव के प्रधान रह चुके हैं। वे एक थारू आदिवासी हैं और तीन दशकों से अधिक समय से अपने समुदाय के वन अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। रामचंद्र, नेशनल फोरम फॉर फॉरेस्ट पीपल एंड फॉरेस्ट वर्कर्स के सदस्य हैं और उन्होंने थारू आदिवासी महिला मजदूर किसान मंच के संगठन में मदद की।
