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मिथुन क्या है और अरुणाचल के जंगलों में इसे लेकर तनाव क्यों बढ़ रहा है?

ढोल मिथुनों का शिकार करने लगे हैं क्योंकि उनके आम शिकारों को इंसानों ने खत्म कर दिया है। इन हमलों में मिथुन खोने वाले किसान परेशान हैं क्योंकि वे आर्थिक रूप से इन्हीं पर निर्भर है।
17 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित

इस साल की शुरुआत में, जब 40 साल के ताउम तामुट अरुणाचल प्रदेश के सियांग जिले में स्थित अपने गांव जोमलो मोबुक के नजदीकी जंगल में अपने मिथुनों (बोस फ्रंटलिस) को ढूंढने गए, तो उन्हें एक दर्दनाक मंजर देखने को मिला। खून से लथपथ उनका एक मिथुन झाड़ियों में मरा पड़ा था। उसके शव पर ढोल (क्यूऑन एल्पिनस) के हमले के निशान साफ नजर आ रहे थे।

आदी जनजाति के सदस्य और तीन छोटे बच्चों के पिता ताउम के पास तकरीबन 50 मिथुन हैं और वे सब्जियां, झाड़ू और कभी-कभी अपने एक या दो मिथुन बेचकर अपना जीवन यापन करते हैं। मिथुन की मौत से आहत ताउम ने कहा, “ढोल मिथुन के बछड़ों को भी नहीं छोड़ते। यहां ढोलों की संख्या काफी ज्यादा है। वह हमारे बछड़ों को खा रहे हैं।”

यहां से सैकड़ों किलोमीटर दूर दोईमुख में न्यीशी जनजाति के 54 साल के नबूम तानिया ने भी ऐसी ही एक घटना साझा की। उन्होंने कहा, “ढोल शिकार करने के लिए बदनाम हैं। वे 15 से 20 के झुंड में आते हैं और पूरे एक मिथुन को मारकर खा जाते हैं।” तानिया के पास 20 मिथुन थे और इस साल की शुरुआत में ढोलों के हमलों में उन्होंने अपने सात मिथुन खो दिए। तानिया कहते हैं, “मेरे जैसे गरीब किसान के लिए यह बहुत बड़ा नुकसान है। मिथुन हमारी आजीविका हैं। मैंने मिथुन को पालकर और बेचकर अपने बच्चों को पढ़ाया है।”

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

ताउम और तानिया की तरह, अरुणाचल प्रदेश के कई किसानों ने ढोलों के हमलों में अपने अर्ध-पालतू मवेशी ‘मिथुन’ को खो दिया है। साल 2025 की शुरुआत से पापुम पारे, सियांग, अपर सुबनसिरी, वेस्ट सियांग, ईस्ट कामेंग, लोअर दिबांग वैली और चांगलांग जैसे जिलों में मिथुन और दूसरे जानवरों पर ढोलों के हमलों में बढ़ोतरी देखी गई है।

राज्य में ढोल मिथुनों का शिकार करने लगे हैं क्योंकि हिरण और जंगली सूअर जैसे उनके आम शिकारों को इंसानों ने खत्म कर दिया है। वहीं, इन हमलों में मिथुनों को खोने वाले किसान परेशान हैं क्योंकि वे आर्थिक रूप से इन्हीं जानवरों पर निर्भर है। यह स्थिति जटिल है, जो परंपरा, आवास और शिकार की कमी और जीवनयापन की अन्य जरूरतों से जुड़ी है।

बढ़ते टकराव

बांदरदेवा वन प्रभाग के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर विजय दुपित ने जानकारी साझा करते हुए कहा, “हमारे पास मौजूद आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, दोईमुख और अरुणाचल प्रदेश के सबसे बड़े प्रभाग बांदरदेवा में 50 से अधिक मिथुन मारे गए हैं। इस क्षेत्र का लगभग 80 से 90% भाग आरक्षित वन में आता है।” दोईमुख के सीनियर वेटनरी ऑफिसर टी.आर. नबाम हिना का अनुमान है कि पूरे पापुमपारे जिले को मिलाकर मिथुन की कुल मौतों की संख्या आसानी से 70 के आसपास हो सकती है। वह कहते हैं, “वन विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज मौतों के अलावा, अकसर दो से छह मामले सामने आते रहे हैं।”

ढोल और मिथुन दोनों आईयूसीएन रेड लिस्ट में सूचीबद्ध हैं। 2015 के आकलन के अनुसार, ढोल को “लुप्तप्राय” और मिथुन को “असुरक्षित” श्रेणी में रखा गया है।

ढोल या जंगली कुत्ते शिकार करते हुए_मिथुन
कभी-कभी, तेंदुए जैसी अन्य शिकारी बिल्लियां भी मिथुनों का शिकार करती हैं और इसी तरह बदले की कार्रवाई में उन्हें भी मार दिया जाता है। प्रतिकात्मक तस्वीर- डॉ. राजू कसम्बे, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)।

ये जंगली कुत्ते हिरण और जंगली सूअर जैसे खुर वाले जानवरों को अपना शिकार बनाना पसंद करते हैं, लेकिन जंगली शिकार की अनुपलब्धता में अब वे खुले में चरने वाले मिथुनों को मार रहे हैं। मिथुन अर्ध-पालतू मवेशी हैं, जिन्हें अन्य मवेशियों की तरह बाड़ों में नहीं रखा जाता है। वे गांवों के सामुदायिक जंगलों में चरते हैं और अधिक असुरक्षित हैं। अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों में मिथुन को पद, प्रतिष्ठा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मिथुन जनजातीय अनुष्ठानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं का अभिन्न अंग है। एक मिथुन की कीमत ₹80,000 से ₹1,00,000 के बीच होती है। लेकिन मिथुन के शिकार के लिए दिया जाने वाला सरकारी मुआवजा महज ₹40,000 से ₹50,000 के बीच है। लेकिन मुआवजे की धीमी और लम्बी प्रक्रिया ने कई किसानों को निराश और असहाय बना दिया है।

अशोका यूनिवर्सिटी में डॉक्टरेट की छात्रा और ‘चेंजिंग एफिनिटीज: इकोलॉजीज ऑफ ह्यूमन-मिथुन रिलेशनशिप्स इन नॉर्थईस्ट इंडिया’ की सह-लेखिका अभिश्रुति सरमा ने बताया, “मिथुन का आर्थिक महत्व काफी है। अरुणाचल प्रदेश के कई ऊंचे इलाकों के समुदायों के लिए ये जानवर एक तरह की बचत की तरह होते हैं, जिन्हें वे वित्तीय आपात स्थितियों में, बेहतर स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा जैसी जरूरतों के लिए बेच देते हैं।”

ढोल को मारने की घटनाओं में तेजी

ढोल का शिकार करना गैर-कानूनी है। लेकिन मिथुन पर किए गए हमलों के बाद, गांव के लोग अकसर मामला अपने हाथ में ले लेते हैं। हालांकि, मोंगाबे इंडिया ने जिन भी किसानों से बात की, उनमें से किसी ने भी जंगली कुत्तों को मारने की बात स्वीकार नहीं की, लेकिन वीडियो और फोटोग्राफिक सबूत कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। एक किसान ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हमने उन्हें मारने के लिए वन विभाग से पूछा था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।”

कभी-कभी, तेंदुए जैसी अन्य शिकारी बिल्लियां भी मिथुनों का शिकार करती हैं और इसी तरह बदले की कार्रवाई में उन्हें भी मार दिया जाता है। वन अधिकारी ऐसी हत्याओं के किसी भी पुष्टि किए गए मामले से इनकार करते हैं, लेकिन आईयूसीएन रेड लिस्ट बताती है कि मवेशियों के शिकार के चलते बदले में की जाने वाली हत्याएं पूर्वोत्तर भारत में ढोलों के लिए एक बढ़ता हुआ खतरा है।

ढोल और मिथुन दोनों आईयूसीएन रेड लिस्ट में सूचीबद्ध हैं। 2015 के आकलन के अनुसार, ढोल को “लुप्तप्राय” और मिथुन को “असुरक्षित” श्रेणी में रखा गया है।

स्वतंत्र शोधकर्ता प्रिया रघुनंदिनी सिंह के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में ढोलों पर शिकार का व्यापक दबाव है। वह कहती हैं, “जहां भी ढोल पाए जाते हैं, उन्हें शिकार का खतरा बना रहता है। कार्बी आंगलोंग में हाल ही में एक ढोल के देखे जाने से हलचल मच गई, हालांकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। यह उनका प्राकृतिक आवास है। उनकी अनुपस्थिति दशकों से हो रहे उत्पीड़न और आवास के नुकसान को दर्शाती है।”

निरजुली में कंपोजिट लाइवस्टॉक फार्म के संयुक्त निदेशक ताबा हेली के मुताबिक, बड़े पैमाने पर शिकार और तेजी से वनों की कटाई के कारण शिकार कम हो रहे हैं, जिससे जंगली कुत्ते मिथुन, खासकर उनके बछड़ों को निशाना बना रहे हैं। पारंपरिक झूम खेती से इलायची और अन्य व्यावसायिक फसलों की ओर रुख करना (जिसके लिए जंगलों को साफ करना पड़ता है) भूमि उपयोग में बदलाव को दर्शाता है, जो जंगलों के पारिस्थितिक तंत्र को भी बदल रहा है। इसके अलावा, जंगली जानवरों का शिकार किया जा रहा है, जिस वजह से जंगली कुत्ते और बाघ जैसे शिकारी जानवरों के पास शिकार के बहुत कम विकल्प बचे हैं।

डिप्टी कमिश्नर जिकेन बोमजेन के साथ एक बैठक में रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर डुपिट ने जंगली कुत्तों को मारने की ग्रामीणों की मांग का विरोध किया था। उन्होंने बताया, “कई लोगों ने चेतावनी दी कि अगर मुआवजा जल्द नहीं मिला, तो वे खुद ही इस मामले को अपने हाथ में ले लेंगे।”

एक पुरानी समस्या

ढोल का मिथुनों का शिकार करना कोई नई बात नहीं है। पिछले दो दशकों से यह एक गंभीर समस्या बनी हुई है। नवंबर 2000 में, पापुम पारे जिले के सागली से वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) को पहली बार ढोल और अन्य शिकारी जानवरों द्वारा मिथुनों पर हमला करने और उनका शिकार करने की खबरें मिली थीं। डब्ल्यूटीआई के 2003 के एक अध्ययन में कहा गया, “मिथुन, एक अर्ध-पालतू मवेशी है। इन पर शिकारी जानवर, खासकर जंगली कुत्ते हमला करते हैं और ग्रामीण इन शिकारी जानवरों को मारकर इसका बदला लेते हैं।”

अरुणाचल प्रदेश में 26 से अधिक आदिवासी समुदाय रहते हैं। इनमें से 80% मुख्य रूप से झूम खेती करने वाले किसान हैं और ज्यादातर जमीन सामुदायिक स्वामित्व वाली है।

हेली कहते हैं, “कई किसानों को इस बात का एहसास नहीं है कि वनों की कटाई और जंगली जानवरों का शिकार सीधे तौर पर इन संघर्षों को बढ़ा रहा है। अवैध बंदूकों को सौंपने जैसी पहल हुई है, लेकिन उनका असर सीमित रहा है। बहुत से लोगों के लिए, शिकार करना और जंगली मांस बेचना अब भी आय का एक जरिया है, इसलिए जब तक आजीविका के वैकल्पिक साधन उपलब्ध नहीं कराए जाते, ये समस्याएं बनी रहेगी।”

अरुणाचल में शिकार लंबे समय से एक परंपरा रही है, जहां जंगली मांस बहुत ऊंचे दामों पर बिकता है। संरक्षणवादी तालुत सिरम उन कई लोगों में से एक हैं जो जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करके और एयरगन सरेंडर को प्रोत्साहित करके इस स्थिति को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। सिरम ने कहा, “हिरण जैसे जंगली मांस की काफी मांग है। यह ₹30,000 से ₹40,000 में बिकता है। बेरोजगार लोग, जिनके पास आय का कोई साधन नहीं है, वे जंगली मांस बेचकर पैसे कमाते हैं।”

किसानों की आवाज

किसान समूहों ने राज्य सरकार से मिथुन पर ढोलों के हमलों के लिए तत्काल मुआवजा और दीर्घकालिक समाधान की मांग करते हुए याचिका दायर की है। लेकिन वन विभाग ने सामुदायिक स्वामित्व वाली चरागाह भूमि पर अधिकार क्षेत्र न होने का हवाला देते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।

दोइमुख-गुमटो सर्कल मिथुन फार्मर्स क्लब के अध्यक्ष चुखु ताजे ने पिछले छः महीनों में ढोलों के हमलों में अपने चार मिथुन खो दिए। वह बताते हैं, “ढोलों द्वारा 52 मिथुन मारे जाने के बाद, हमने सोशल मीडिया का सहारा लिया और वन विभाग से शिकायत की। लेकिन हमें आज तक मुआवजा नहीं मिला है। चार से पांच महीने बीत चुके हैं, और तब से और भी मिथुन हमले में मारे जा चुके हैं। हम निराश हैं।” वह इस बात से इनकार करते हैं कि ग्रामीण इस क्षेत्र में शिकार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि यहां मछली पकड़ना भी प्रतिबंधित है।

एसबीबीएल बंदूक लाइसेंस आत्मरक्षा के लिए होते हैं, लेकिन अब उनका दुरुपयोग शिकार के लिए किया जा रहा है।

संघर्ष को दूर करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी देते हुए रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर डुपिट ने बताया कि वन विभाग गांवों और कस्बों में जागरूकता सत्र आयोजित कर रहा है, वन्यजीवों और जंगलों के महत्व को समझा रहा है। लेकिन सिंगल-बैरल ब्रीच लोडिंग (एसबीबीएल) बंदूकों का व्यापक इस्तेमाल अभी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

सियांग में जोमलो मोंगकू मिथुन फार्मर्स फेडरेशन के अध्यक्ष ताडांग तामुत और तालुत सिरम के अनुसार, चीनी आक्रमण और जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए एसबीबीएल बंदूकों की अनुमति दी गई थी (हालांकि, आज उनकी जरूरत नहीं है)। लेकिन अब इनका इस्तेमाल शिकार के लिए किया जा रहा है।

ग्रामीणों द्वारा जंगली जानवरों के शिकार के लिए आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली सिंगल-बैरल ब्रीच लोडिंग (एसबीबीएल) बंदूकों के अनियंत्रित इस्तेमाल से शिकार जानवरों का बड़े पैमाने पर शिकार हुआ है। इस कारण जंगली कुत्तों के लिए कोई शिकार नहीं बचा तो अब वे मिथुनों पर हमला करने लगे हैं।

राज्य के ‘एयरगन सरेंडर अभियान’ के तहत 2,400 से अधिक एयरगन स्वेच्छा से आत्मसमर्पण की जा चुकी हैं, लेकिन एसबीबीएल बंदूकें घरों में अभी भी आम हैं। सिरम, जो इन बंदूकों के लिए सरकार द्वारा आत्मसमर्पण नोटिस जारी करने की वकालत कर रहे हैं, कहते हैं, “कई लोगों ने एयरगन सौंप दी हैं, लेकिन एसबीबीएल बंदूकों को अभी भी बड़े पैमाने पर नहीं छुआ गया है।” वह आगे कहते हैं, “एसबीबीएल बंदूक लाइसेंस आत्मरक्षा के लिए होते हैं, लेकिन अब उनका दुरुपयोग शिकार के लिए किया जा रहा है। आज के समय में, जीवन के लिए ऐसा कोई वास्तविक खतरा नहीं है जो इन्हें रखने को सही ठहराए।”

हेली राज्य में वन्यजीवों के शिकार के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत पर जोर देते हैं, लेकिन उनका यह भी कहना है कि विभाग को पहले जंगली कुत्तों की समस्या से निपटना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया, “एक समर्पित, सुस्थापित पुनर्वास क्षेत्र होना चाहिए जहां ऐसे जानवरों को स्थानांतरित करके उनकी उचित देखभाल की जा सके, ठीक उसी तरह जैसे पक्की घाटी में बाघ अभयारण्य हैं। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ द्वारा संचालित केंद्रों जैसा यह दृष्टिकोण वन एवं पर्यावरण विभाग को इन समस्याओं को अधिक प्रभावी ढंग से हल करने में सक्षम बनाएगा।” उनके मुताबिक, जब तक पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बहाल नहीं होता और किसानों में जागरूकता नहीं बढ़ती, ये संघर्ष बने रहेंगे।

यह लेख मूलरूप से मोंगाबे हिन्दी पर प्रकाशित हुआ है।

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