फोटो निबंध: ताड़ी से जुड़े पासी समुदाय पर आजीविका की दोहरी मार
बिहार के गया जिले के बांकेबाजार और इमामगंज प्रखंडों में भुइयां, मांझी, पासवान, पासी और अन्य कई महादलित समुदाय निवास करते हैं। इनमें से पासी समुदाय पीढ़ियों से ताड़ी निकालने का काम करता आया है। इस समुदाय के लिए ताड़ी केवल एक पेय पदार्थ नहीं, बल्कि वर्षों से उनकी परंपरा और रोजगार का हिस्सा रहा है।

ताड़ी (पाम टॉडी) ताड़ या खजूर के पेड़ से निकलने वाला रस है, जिसे पेय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसे निकालने की प्रक्रिया पारंपरिक और कठोर होती है। सबसे पहले खेतों में से ऐसे पेड़ों का चुनाव करना होता है, जिनकी छाल मजबूत और रस देने लायक हो। इसके बाद ताड़ी निकालने वाला व्यक्ति पेड़ पर चढ़कर फूलों के गुच्छे के ऊपरी हिस्से को साफ करके तेज चाकू से हल्का चीरा लगाता है और नीचे एक मिट्टी का घड़ा, या प्लास्टिक या धातु का बर्तन या नारियल का खोल बांध देता है। चीरे के कटाव से धीरे-धीरे रस टपकने लगता है और नीचे बर्तन में जमा होता रहता है।

ताड़ी निकालने का काम जोखिम भरा है, क्योंकि इसमें ऊंचे पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है। कई बार गिरने की दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। अक्सर लोग शाम को घड़े लगाते हैं और सुबह उतारते हैं। ताजा ताड़ी का स्वाद मीठा और हल्का होता है, लेकिन कुछ ही घंटों में यह किण्वित (फर्मेंट) होकर हल्की मादक हो जाती है। अधिकांश लोग इसे छानकर तुरंत पीना पसंद करते हैं, जबकि कुछ लोग इसे देर तक रखते हैं, जिससे इसमें शराब जैसी तासीर आ जाती है।

इसी इलाके के गांव वाजितपुर के अमरेश बताते हैं, “हम लोग सुबह चार बजे पेड़ पर चढ़ते हैं और हांडी भरकर लाते हैं। इसी से हमारा घर चलता है। लेकिन अब यह पारंपरिक काम संकट में है। शराबबंदी लागू होने के बाद ताड़ी के व्यवसाय पर कई बंदिशें लग गई हैं। पहले ताड़ी खुले में बिक जाती थी और परिवार की गुजारे लायक आमदनी हो जाती थी।”

ताड़ी निकालने वाले पासी समुदाय के अधिकांश लोगों के पास खुद की जमीन नहीं है। वे मुनाफे के आधे हिस्से के बदले किसानों के खेतों में पेड़ों पर चढ़कर ताड़ी निकालने का काम करते हैं। लेकिन अब इस काम में शराबबंदी के अलावा भी कई मुश्किलें आ गई हैं। प्रखंड के गंगटी ग्राम की रूपा देवी बताती हैं, “अधिकतर किसान अब ताड़ के पेड़ों को अपने खेतों से कटवा रहे है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इन पेड़ों की पत्तियों से उनकी फसल खराब हो जाती है। ऐसे में हमारे लिए रोजगार की मुश्किलें और बढ़ रही हैं।”

अरमेश जोड़ते हैं, “वैसे भी ताड़ी निकालने का काम सीजनल (मौसमी) है। अक्सर मार्च से जून के बीच ही यह व्यवसाय अच्छा चलता है। खेती से जुड़ा काम इस समय कम रहता है, इसलिए ताड़ी ही हमारी आमदनी का बड़ा सहारा बनती है।”

ताड़ के कम होते पेड़ और इस व्यापार में उदासीनता के चलते अब यहां के युवा गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तरफ पलायन करने लगे हैं। यह ट्रेनों में बढ़ती भीड़ के रूप में साफ दिखता है, जहां रोज सैकड़ों लोग रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं।

परिवार के भरण-पोषण के लिए जब अधिकांश पुरुष रोजगार की तलाश में सालों तक बाहर चले जाते हैं, तो घर का सारा बोझ महिलाओं और बुज़ुर्गों पर आ जाता है। इसका असर केवल बड़ों तक ही सीमित नहीं रहता। बच्चों को भी पढ़ाई छोड़कर घरेलू कामों में लगना पड़ता है।

क्षेत्र में आंगनबाड़ी जैसी मूलभूत सुविधाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं, उन्हें रोज नदी-नालों को पार करना पड़ता है, जो बरसात के दिनों में और मुश्किल हो जाता है।
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लेखक के बारे में
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सतपाल सिंह पंद्राम, ग्रीन हब सेंट्रल इंडिया (2024–25) के फेलो रह चुके हैं। राजनीति विज्ञान में एमए की पढ़ाई के दौरान वह राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) से जुड़कर समाज सेवा के कार्यों में सक्रिय रहे हैं। सतपाल आदिवासी समुदाय से संबंधित प्रकृति, वन्यजीव और समुदायों की संस्कृति व संघर्ष की कहानियों को डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के माध्यम से दुनिया तक पहुंचाने और उनके पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने के लिए प्रयासरत हैं। वर्तमान में वह एमएससी फिल्म प्रोडक्शन की पढ़ाई कर रहे हैं।
