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ग्राम से गणतंत्र तक: लोकतंत्र की असली यात्रा 

गणतंत्र की मौजूदा वास्तविकता से स्पष्ट है कि ग्राम संसाधनों का सरकारीकरण और ग्राम शासन के विकेंद्रीकरण के बीच असंतुलन है।
26 जनवरी 2026 को प्रकाशित

आज जब हम भारतीय गणतंत्र के 75 वर्ष से अधिक के इतिहास पर विचार करते हैं, तो एक बुनियादी प्रश्न उभरता है। क्या भारत का गणतंत्र उस कल्पना के अनुरूप विकसित हुआ है, जिसकी नींव स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रखी गई थी? या फिर, यह धीरे-धीरे एक ऐसी व्यवस्था में बदल गया है, जिसमें सत्ता और संसाधनों का नियंत्रण नागरिकों से दूर होता चला गया है?

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोकतंत्र को केवल सत्ता-हस्तांतरण की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा गया था। यह एक व्यापक सामाजिक पुनर्गठन की कल्पना थी, जिसमें नागरिक केवल शासित नहीं, बल्कि शासन की प्रक्रिया के सहभागी भी थे। इस संदर्भ में महात्मा गांधी की ग्राम स्वराज की अवधारणा एक प्रमुख बिंदु है, जो देश को स्वायत्त, स्वावलंबी और स्व-शासित गांवों के परिसंघ के रूप में सशक्त करने की बात सामने रखती है। ‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने जिस ग्राम स्वराज की कल्पना की थी, वह केवल प्रशासनिक विकेंद्रीकरण नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक और राजनीतिक आत्मा थी। इसमें निर्णय लेने का अधिकार सीधे लोगों को सौंपने की बात की गयी थी, और गांवों को एक ‘पूर्ण गणराज्य’ माना गया था।

‘हिन्द स्वराज’ में रखे गए कई अहम विचार भारतीय संविधान में शामिल तो हुए, लेकिन ग्राम स्वराज की वह व्यापक सोच, जिसमें गांव अपने फैसलों, संसाधनों और शासन के केंद्र में हों, पूरी तरह जमीनी हकीकत में बदल नहीं पायी। शायद यही कारण है कि स्थानीय संसाधनों पर समुदाय के अधिकारों और ग्रामसभा की भूमिका को लेकर संवैधानिक मंशा स्पष्ट रही है, लेकिन व्यवहार में उसका असर सीमित दिखाई देता है। इसका सीधा प्रभाव भारत के उन सात लाख से अधिक गांवों पर पड़ता है, जो आज भी उस व्यापक ग्राम-परिसंघ का रूप नहीं ले पाए हैं। जबकि, इसकी संभावना भारत के गणतंत्र की मूल कल्पना में निहित थी।

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ग्राम स्वराज की ऐतिहासिक कड़ियां

राजनीतिक स्वाधीनता के बाद भारत जिस विकास पथ पर आगे बढ़ा, उसमें ग्राम-केंद्रित स्वशासन की परिकल्पना धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चली गई। समय के साथ, नीति-निर्माण और विकास की प्राथमिकताएं भी ज्यादातर केंद्रीकृत ढांचों के इर्द-गिर्द आकार लेती रहीं, जिनका नेतृत्व प्रमुख रूप से सरकार और समाज के प्रभावशाली वर्गों के हाथों में ही रहा। इस प्रक्रिया में नागरिकता का अर्थ भी प्रायः अधिकारों तक सीमित होता गया। इसका एक दीर्घकालिक प्रभाव यह भी हुआ कि समाज की एक बड़ी आबादी के बीच गणतंत्र की मूल भावना धीरे-धीरे कमजोर होती गयी।

इतिहास में ग्राम-आधारित गणतंत्र की संभावनाओं के कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण मिलते हैं। 21 जनवरी 1939 को तत्कालीन महाराष्ट्र की औध रियासत द्वारा ‘स्वराज संविधान’ को अपनाया जाना ऐसा ही एक उदाहरण है। मई 1938 में किसानों और मजदूरों के जन-आंदोलनों के बाद, शासक भावन राव पंत ने जन-भावनाओं का सम्मान करते हुए शासन त्याग दिया। इसके बाद सतारा, सांगली तथा बीजापुर के 72 गांवों के परिसंघ के रूप में औध ने एक गणतांत्रिक व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ाया। यह एक ऐसा प्रयोग था, जो स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए वैकल्पिक आधार बन सकता था। इसके बाद महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में तैयार ‘स्वराज संविधान’ कुछ स्पष्ट शर्तों पर आधारित था। इसमें शासक की भूमिका का अंत, साधारण नागरिक के रूप में जीवनयापन, सीमित खर्च और ग्राम-केंद्रित व्यवस्था को अपनाना शामिल था। वर्ष 1948 में औध का भारतीय संघ में विलय हो गया, लेकिन लगभग एक दशक तक चला यह प्रयोग स्वतंत्र भारत के ‘मौलिक गणतंत्र’ के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक और व्यावहारिक संदर्भ प्रस्तुत करता है।

राजनीतिक स्वाधीनता के बाद भारत जिस विकास पथ पर आगे बढ़ा, उसमें ग्राम-केंद्रित स्वशासन की परिकल्पना धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चली गई। | चित्र साभार: भारतीय चुनाव आयोग/विकिमीडिया कॉमन्स

इसी तरह गणतंत्र की अवधारणा की एक दूसरी कड़ी वर्ष 1946 में सामने आती है। गांधी के विचारों से प्रेरित अर्थशास्त्री श्रीमन नारायण अग्रवाल द्वारा प्रस्तावित ‘गांधीवादी संविधान’ वस्तुतः उस समय आकार ले रहे भारतीय राष्ट्र-राज्य के लिए एक संवैधानिक दिशा प्रस्तुत करने का प्रयास था। 60 पृष्ठों और 22 अध्यायों में विभाजित यह मसौदा केवल शासन की संरचना का खाका नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक आधारभूमि को फिर से परिभाषित करने का प्रयास भी था। इसमें मौलिक अधिकारों को मौलिक कर्तव्यों के साथ जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया गया कि नागरिक स्वतंत्रता, सामाजिक उत्तरदायित्व से अलग नहीं हो सकती है। शासन की इकाई के रूप में ग्राम पंचायतों को केंद्र में रखकर, यह दस्तावेज एक ऐसी विकेंद्रीकृत राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का समर्थन करता है, जिसमें ग्राम पंचायतों को व्यापक अधिकार दिए गए हैं (जिनमें न्यायिक कार्य भी शामिल हैं)।

संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान, सभा के कुछ सदस्य ‘हिन्द स्वराज’ के विचारों तथा आदर्शों, और विशेष रूप से पंचायती राज व्यवस्था को भारतीय संविधान में शामिल किए जाने के पक्ष में थे। किंतु आम सहमति न बनने के कारण संविधान सभा ने पंचायती राज आधारित प्रशासन की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया। फिर भी गांधीवादी दृष्टि को पूरी तरह नकारने के बजाय, पंचायती राज, शराब निषेध और कुटीर उद्योगों जैसे विचारों को राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में जगह दी गयी। इन प्रावधानों ने संविधान में एक नैतिक संकेत तो अवश्य छोड़ा, पर न्यायालय में प्रवर्तनीय न होने के कारण, वे राज्य की बाध्यकारी जिम्मेदारी नहीं बन सके। समय के साथ, यह स्पष्ट होता गया कि गांधीवादी गणतंत्र की यह कल्पना संवैधानिक पाठ में तो दर्ज रही, लेकिन शासन की व्यवहारिक प्राथमिकताओं के सामने वह धीरे-धीरे सीमित होती चली गई।

स्वशासन प्रणाली और पंचायती राज: कल, आज और कल 

स्वतंत्र भारत का संविधान लागू होने के कई दशक बाद, पंचायती राज व्यवस्था को लेकर धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक सहमति बनी। एक ऐसी व्यवस्था, जिसकी परिकल्पना गांधी ने स्वतंत्रता से पहले ही की थी। वर्ष 1992 मे 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से भारत में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। इस संशोधन के माध्यम से तीन-स्तरीय संरचना (ग्राम, प्रखंड/ब्लॉक, जिला) के साथ ग्रामीण स्थानीय स्वशासन प्रणाली को औपचारिक रूप दिया गया। इसके उद्देश्य थे कि स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाया जा सके, जमीनी स्तर पर लोकतंत्र सुनिश्चित किया जा सके, नियमित चुनाव अनिवार्य किए जा सकें, तथा महिलाओं, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण किया जा सके। इसके तहत संविधान में भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, और राज्यों को इन ‘स्वशासन की इकाइयों’ को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई। 

लेकिन भारतीय गणतंत्र के इतिहास में 1938 के स्वराज संविधान और 1992 में पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता मिलने के बीच का अंतर केवल समय से परिभाषित नहीं होता। इन दशकों में शासन, विकास और राष्ट्र-निर्माण को लेकर अनेक नीतिगत विकल्प, वैचारिक बहसें और प्रशासनिक ढांचे स्थापित हुए। इस दौरान देश ने जिस विकास मॉडल को अपनाया, उसने केंद्रीकरण, नियोजन और राज्य-प्रेरित प्रगति को प्राथमिकता दी। ऐसे में में ग्राम-केंद्रित स्वशासन की मूल कल्पना को फिर से उसी रूप में जीवित करना सहज नहीं रह गया। नतीजतन, इस ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ में पंचायती राज के आदर्शों और उनकी संभावनाओं को लेकर अनेक व्यावहारिक शंकाएं उभरती चली गईं।

देश ने जिस विकास मॉडल को अपनाया, उसने केंद्रीकरण, नियोजन और राज्य-प्रेरित प्रगति को प्राथमिकता दी।

भावनात्मक और नीतिगत स्तर पर भले ही गणतंत्र के विकेंद्रीकरण की बात की जाती रही हो, लेकिन व्यवहार में ग्राम संसाधनों का नियंत्रण स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में ही बड़े पैमाने पर राज्य के हाथों में केंद्रित हो गया था। इस संरचनात्मक विरोधाभास के कारण विकेंद्रीकरण के प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।

साल 1952 से 1960 के बीच संशोधित भूमि सुधार कानूनों के तहत गांव की अधिकांश भूमि पर राज्य सरकारों का सर्वोपरि अधिकार स्थापित हो गया। इसमें सामुदायिक भूमि को भी शासकीय भूमि की श्रेणी में शामिल कर लिया गया। इसी तरह, 1957 के खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम के माध्यम से सतह के नीचे की समस्त भूमि को राज्य के अधिकार क्षेत्र में लाया गया, जिससे खनन और उत्खनन संबंधी निर्णयों में शासन की केंद्रीय भूमिका सुनिश्चित हो गई। वहीं, 1927 का औपनिवेशिक भारतीय वन अधिनियम बिना किसी मूलभूत संशोधन के लागू रहा, जिसने वनभूमि को वैधानिक रूप से सरकारी संपत्ति के रूप में परिभाषित किया और ग्राम तथा वन-आश्रित समुदायों की भूमिका को प्रशासनिक विवेक पर छोड़ दिया।

इन विधिक और नीतिगत व्यवस्थाओं के परिणामस्वरूप, ‘जल, जंगल और ज़मीन’ पर स्वशासन का अधिकार सैद्धांतिक रूप से तो स्थानीय लोकतंत्र से जुड़ा दिखता है, लेकिन वैधानिक और व्यावहारिक दोनों ही स्तरों पर वह मुख्य रुप से राज्य-केंद्रित गणतंत्र के अधीन ही बना रहा।

सशक्त समुदाय, सशक्त गांव, सशक्त गणतंत्र

गणतंत्र की वास्तविकता पर विचार करते समय यह स्पष्ट होता है कि ग्राम संसाधनों का सरकारी-करण और ग्राम शासन के विकेंद्रीकरण के प्रयासों के बीच एक असंतुलन मौजूद है। यदि जल, जंगल और जमीन के अधिकार व्यापक रूप से राज्य के नियंत्रण में हैं, तो ग्रामसभा की निर्णय क्षमता और स्थानीय समुदाय की भूमिका भी सीमित रह जाती है। औपनिवेशिक विधानों की परिधि में यह विकेंद्रीकरण अधिकतर प्रतीकात्मक ही साबित हुआ है। इसी संदर्भ में ग्राम स्वशासन के केंद्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों की वास्तविक वैधानिक और प्रशासनिक हैसियत पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

गौरतलब है कि गांवों में गुजर-बसर करने वाले बहुत से स्थानीय समुदाय समय-समय पर यह आवाज उठाते रहे हैं कि ‘जल, जंगल, जमीन’ से जुड़े समस्त कानूनों को पंचायती राज की मूल भावना के अनुरूप संशोधित या निरस्त किया जाना चाहिए। विकसित भारत के गणतंत्र में ग्रामसभा को संसाधनों के प्रशासन की मूल इकाई के रूप में मान्यता देते हुए ही स्थानीय स्वशासन की वास्तविक संभावना सुनिश्चित की जा सकती है।

भारत का संविधान और उसकी संवैधानिक व्यवस्था आज पूरी दुनिया में लोकतंत्र का एक उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। इसे और अधिक प्रभावी और न्यायसंगत बनाने की आवश्यकता है। सबसे व्यावहारिक और नैतिक मार्ग यही होगा कि पंचायती राज की भावना और संभावनाओं के अनुरूप औपनिवेशिक कानूनों और औपनिवेशिक शासन व्यवस्थाओं के अवशेषों को यथाशीघ्र समाप्त किया जाए। इसी आधार पर विकसित भारत अपने लोकतांत्रिक आदर्शों और ग्राम स्वराज को साकार करते हुए भारतीय गणतंत्र को स्वायत्त, स्वतंत्र और स्वावलंबी गांवों के परिसंघ के रूप में और अधिक जीवंत बना सकता है। 

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