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लैंगिक विषय
रोहिणी निलेकनी फ़िलांथ्रपीज द्वारा समर्थित

लैंगिक संवेदनशीलता के बारे में बचपन से ही बताया जाना चाहिए

लिंग मानदंडों में बदलाव लाने के लिए लिंग जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लड़कों और लड़कियों को बचपन से ही संवेदनशील बनाया जाना चाहिए।

रोहिणी निलेकनी फ़िलांथ्रपीज (आरएनपी) उन विचारों, व्यक्तियों और संस्थानों का समर्थन करना चाहता है जो नैतिक नेतृत्व, तात्कालिकता की भावना और सीखने के साहस के साथ एक मजबूत समाज को सक्षम बनाने जैसा महत्वपूर्ण काम करते हैं। आरएनपी उन समुदायों को मजबूत करना चाहता है जो अपनी बेहतरी के लिए काम करते हैं। यह उन नेटवर्क और आंदोलनों का समर्थन करके ऐसा करता है, जो अक्सर समाज, सरकार और बाजार के बीच बैठता है। यह पर्यावरण, जैव विविधता और संरक्षण, लैंगिक समानता, और सक्रिय नागरिकता और न्याय तक पहुंच जैसे चार क्षेत्रों में फ़ंडिंग करता है।

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31 अगस्त 2022 को प्रकाशित

प्रारम्भिक किशोरावस्था (नौ वर्ष से 13 वर्ष तक) एक महत्वपूर्ण चरण है जिसे वर्तमान में भारत में बाल विकास कार्यक्रमों के दायरे में नहीं रखा जाता है। बच्चों के कल्याण एवं विकास के लिए बनाई गई योजनाएं आमतौर पर बचपन के प्रारम्भिक दिनों— शून्य से छः वर्ष—की उम्र पर केंद्रित होती हैं। इनमें इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज़ योजना (एकीकृत बाल विकास सेवा योजना) के तहत 15 वर्ष या उससे अधिक उम्र के युवाओं के लिए बनाए गए कार्यक्रम शामिल होते हैं।

हालांकि नौ से 13 वर्ष वाला आयु वर्ग मौजूदा पितृसत्तात्मक संरचनाओं के बारे में बच्चों में जागरूकता फैलाने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। यही वह उम्र होती है जब वे अपने शरीर में होने वाले नए विकास एवं बदलावों का अनुभव करते हैं और धीरे-धीरे लिंग से जुड़ी भूमिकाओं एवं मानदंडों तथा सेक्शूऐलिटी के बारे में जानते हैं। इस उम्र में शुरू होने वाले लिंग तथा पुरुषत्व और स्त्रीत्व के इन मूलभूत ढांचों को चुनौती देने के लिए, देश में लिंग जागरूकता कार्यक्रमों को छोटे बच्चों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

कमिटी ऑफ़ रिसोर्स ऑर्गनायज़ेशन (कोरो) की ऑर्गनायज़ेशन प्रोसेस डायरेक्टर पल्लवी पलव कहती हैं कि “लिंग से जुड़े मानदंड बहुत ही कम उम्र में बनने शुरू हो जाते हैं। यदि हम इसे बदलना चाहते हैं तो हमें कम उम्र से ही उसकी शुरुआत करने की ज़रूरत है और साथ ही हमें संस्थाओं के माध्यम से इस काम को करना चाहिए ताकि बड़े स्तर पर बदलाव को देखा जा सके।”

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कोरो राजस्थान एवं महाराष्ट्र के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक पिछड़े समुदायों के नेताओं के सशक्तिकरण पर काम करने वाला एक एनजीओ है। वर्षों से अपने काम के अनुभव के आधार पर कोरो का ऐसा मानना है कि लिंग मानदंडों में बदलाव लड़कों और लड़कियों दोनों में ही प्रारम्भिक किशोरावस्था में शुरू होना चाहिए।

संस्थाओं के माध्यम से काम करना महत्वपूर्ण है

युवा किशोरों को शामिल करने के लिए लिंग जागरूकता कार्यक्रमों के दायरे का विस्तार करने के प्रयास के अंतर्गत कोरो ने जेंडर इक्विटी मूवमेंट इन स्कूल्स (जीईएमएस) नामक एक स्कूल-आधारित कार्यक्रम विकसित किया। इस कार्यक्रम को मुंबई के 45 स्कूलों में कक्षा 6 और 7 के छात्रों के लिए डिज़ाइन किया गया था। इस कार्यक्रम को इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन वीमेन और टाटा इंस्टीट्यूट फ़ॉर सोशल साइयन्सेज के साथ मिलकर तैयार किया गया था।

इन सत्रों और संवादों के दौरान जो बात सामने आई वह यह है कि इस छोटी सी उम्र में भी बच्चों में शक्ति और शक्ति के डायनमिक्स की धारणा थी।

कुछ स्कूलों में जीईएमएस हस्तक्षेप में लिंग अभियानों के साथ ही साप्ताहिक को-एड जेंडर एजुकेशन के सत्रों को शामिल किया गया था। इन सत्रों में छात्रों को लिंग से जुड़े विषयों पर निबंध लिखने या नाटक में भाग लेने के लिए कहा जाता था। अन्य स्कूलों में हस्तक्षेप के रूप में केवल अभियान ही चलाए गए थे। और इसके बाद ऐसे स्कूल भी थे जो कंट्रोल ग्रुप के रूप में काम करते थे। इन स्कूलों में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं थी। शिक्षा सत्रों में रोल प्ले जैसी कई एक्शन आधारित गतिविधियां करवाई जाती थीं। इन सत्रों के दौरान जो बात सामने आई वह यह है कि इस छोटी सी उम्र में भी बच्चों में शक्ति और शक्ति के डायनमिक्स की धारणा थी। उदाहरण के लिए एक वर्कशॉप में यह बात सामने आई कि अपने-अपने घरों में वे अपनी माँ की शक्ति को अपने पिता की शक्ति से कमतर आंकते हैं। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि उनके पिता काम करने बाहर जाते थे और इसलिए उनके अनुसार उनके पिता को अधिक सुविधाएं, खाना और आराम की ज़रूरत थी।

घरेलू हिंसा के विरोध में पोस्टर लिए सड़क पर घूमती युवतियां-लैंगिक संवेदनशीलता
देश में लिंग जागरूकता कार्यक्रमों को छोटे बच्चों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। । चित्र साभार: वाचा रिसोर्स सेंटर फ़ॉर वीमेन एंड गर्ल्स

बच्चों के जीवन में उपस्थित प्रभावशाली लोगों के साथ मिलकर काम करना महत्वपूर्ण है

अपने कार्यक्रम के तीसरे साल में कोरो ने शिक्षकों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया क्योंकि वे बच्चों के जीवन को प्रभावित करने वाले मुख्य लोगों में से होते हैं। अंतत: कोरो ने यूनिसेफ़ और महाराष्ट्र सरकार के साथ साझेदारी के माध्यम से राज्यों के सभी स्कूलों में अपने पाठ्यक्रम को पढ़ाना शुरू कर दिया। पल्लवी इस बात को लेकर स्पष्ट थीं कि पाठ्यक्रम को संस्थागत बनाना महत्वपूर्ण है। “उन्होंने कार्यक्रम को उनके स्कूलों में लागू करने के लिए कहा लेकिन हमें ऐसा महसूस हुआ कि इस कार्यक्रम को संचालित करने के लिए उनका क्षमता निर्माण करना अपेक्षाकृत अधिक स्थाई तरीक़ा है। और इसलिए हमने ऐसा ही किया।” इस कार्यक्रम का नाम मीना-राजू मंच है और इसने किशोर लड़के एवं लड़कियों दोनों के साथ काम किया। दस साल बाद यह कार्यक्रम आज भी सरकारी स्कूलों में चालू है। कार्यक्रम से मिलने वाले अनुभवों ने स्टेट काउन्सिल ऑफ एज़ुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग के इक्विटी सेल की अवधारणा को सूचित किया जो लिंग विविधता और दिव्यांग बच्चों की ज़रूरत पर केंद्रित था।

समाज के रक्षकों के साथ काम करना लिंग जागरूकता हस्तक्षेप का एक अभिन्न अंग होना चाहिए अन्यथा प्रतिरोध या प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ सकता है।

सरकारी प्रणाली के साथ काम करने के महत्व के अलावा इस कार्यक्रम का एक और सबक़ यह था कि गेटकीपर (समाज के रक्षकों) के साथ काम करना लिंग जागरूकता हस्तक्षेप का एक अभिन्न अंग होना चाहिए अन्यथा प्रतिरोध या प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए कोरो के जीईएमएस कार्यक्रम के शुरुआती कुछ वर्षों में विभिन्न स्कूलों के शिक्षक इससे सहमत नहीं थे। उनका दावा था कि यह कार्यक्रम बच्चों को विद्रोही बना रहा था और उन्हें अपना पाठ्यक्रम पूरा करने नहीं दे रहा था। बाद में जब उन्होंने कार्यक्रम के कारण लड़के और लड़कियों के व्यवहार में आए बदलावों का अनुभव किया तब जाकर हमारे साथ आए। उदाहरण के लिए लड़कियों ने अपने साथ होने वाली हिंसा के बारे में खुलकर बात करनी शुरू कर दी; लड़कों ने घरों में अपनी बहनों और माँ के साथ होने वाले भेदभाव के बारे में सवाल करना शुरू कर दिया और घर के कामों में हिस्सा लेने लगे।

वाचा ट्रस्ट की परियोजना वाचा रिसोर्स सेंटर फॉर वीमेन एंड गर्ल्स एक अन्य ऐसा संगठन है जो लिंग के मुद्दों पर कई हितधारकों और द्वारपालों के साथ मिलकर काम कर रहा है। वाचा मुंबई बस्तियों में शुरुआती किशोरों के साथ विशेष रूप से जुड़ने वाले देश के पहले संगठनों में से एक है। इस नाते वाचा ने समय के साथ एक ऐसा मॉडल विकसित किया है जो समुदायों के भीतर व्यापक रूप से इस तरह काम करता है जिसमें उनके द्वारा किए गए हर काम में लिंग का नज़रिया शामिल होता है। यह मॉडल मानता है कि बच्चों के दैनिक जीवन में भूमिका निभाने वाले प्रत्येक व्यक्ति एवं संस्था—अभिभावकों, शिक्षकों, आशा कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व—के अलावा लड़कों को लिंग के विषय पर संवेदनशील बनाना महत्वपूर्ण है ताकि वे लड़कियों के लिए सहायक बन सकें।

पहले निष्पक्षता और फिर समानता पर ध्यान दें

हालांकि, लड़कों को संवेदनशील बनाते समय यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि उस उम्र में भी प्रचलित लिंग मानदंडों के कारण लड़कों और लड़कियों के बीच पहले से ही एक प्रकार का शक्ति अंतर है। जब स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, सुरक्षित स्थान आदि तक पहुंच की बात आती है तो युवा लड़कियों और महिलाओं को लैंगिक अंतर के अतिरिक्त बोझ का सामना करना पड़ता है। इसलिए लड़कियों को सशक्त बनाने की यात्रा में ऐसे सुविधाओं को मुहैया करवाने पर ध्यान देने की ज़रूरत है जो सिर्फ़ उनके लिए हो। और उसके बाद इस अंतर को कम करने के लिए लड़कों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि शक्ति का ढांचा संतुलित हो। वाचा रिसोर्स सेंटर फॉर वीमेन एंड गर्ल्स की निदेशक यगना परमार बीएमसी स्कूल में हुए एक घटना के बारे में बताती हैं जहां वे लोग युवा सशक्तिकरण कार्यक्रम के हिस्से के रूप में कम्प्यूटर की क्लास संचालित करवा रहे थे। “लड़कियों के लिए आयोजित एक सत्र में ग़लती से एक लड़का आ गया। हालांकि उसने कुछ नहीं कहा था लेकिन उसके आते ही एक लड़की ने खड़े होकर उसे अपनी जगह दे दी। मेरे पूछने के बाद ही उसे यह एहसास हुआ कि यह सत्र केवल उसके लिए है न कि लड़कों के लिए, और साथ ही किसी ने भी उसे अपनी जगह देने के लिए नहीं कहा था।”

इस कारण से ही जब वाचा ने समुदायों के साथ काम करना शुरू किया तो उसका पूरा ध्यान लड़कियों के लिए एक सुरक्षित स्थान के निर्माण पर था ताकि वे अपने विचारों को व्यक्त कर सकें। इस काम के लिए उन लड़कियों को कौशल-आधारित प्रशिक्षण सत्रों से लेकर विभिन्न प्रकार के खेलों आदि जैसी रचनात्मक गतिविधियों में लगाया गया। इससे उनके अधिकार और आत्मविश्वास का निर्माण होता है। साथ ही इन सभी गतिविधियों में लिंग और उससे जुड़े विचार और बातचीत को शामिल किया जाता है। लड़कियों द्वारा एक-दूसरे के साथ बंधन बनाने और अपने समुदायों के भीतर पहल करने के साथ ही उनकी सामाजिक पूंजी का विकास भी होता है। वे अपने आसपास की दुनिया और पहले से मौजूद मानदंडों और तरीक़ों के अलावा अन्य हितधारकों जैसे अभिभावकों, शिक्षकों और समुदाय के नेताओं से प्रश्न पूछने लगती हैं।

लिंग मानदंडों को बदलने के स्तर पर काम करते समय बड़े समुदाय के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे भी बदलाव को प्रोत्साहित करें और उसे अपना समर्थन दें।

इसलिए लड़कियों के साथ मिलकर लिंग जागरूकता कार्यक्रम को शुरू करना ज़रूरी है। एक बार जब वे नेताओं की भूमिका में आ जाएंगी तब वे अपने साथ लड़कों को भी ला सकती हैं। लेकिन काम यहीं नहीं रुक सकता है। लिंग मानदंडों को बदलने के स्तर पर काम करते समय बड़े समुदाय के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे भी बदलाव को प्रोत्साहित करें और उसे अपना समर्थन दें। वाचा इस प्रकार कॉलेजों में भविष्य के शिक्षकों, छात्रों के साथ स्कूलों में, समुदाय में विभिन्न संवेदीकरण सत्रों और एक वार्षिक स्वास्थ्य और लिंग मेले के माध्यम से तथा अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ काम करता है। यह एकीकृत, व्यापक दृष्टिकोण है जिसने अंततः सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए हैं। उदाहरण के लिए लड़कियों की शादी की उम्र में देरी करना और उनकी उच्च शिक्षा पूरी करना।

युवा लड़कों और पुरुषों के साथ काम करने के विषय पर पल्लवी स्वर्गीय कमला भसीन की कही गई बातों की व्याख्या करती हैं: “दृष्टिकोण ऐसा नहीं होना चाहिए जहां महिलाओं को पुरुषों के खिलाफ खड़ा किया जाए। वास्तव में, हमें उनके साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है, क्योंकि पितृसत्तात्मक मानदंड पुरुषत्व की विषाक्त धारणाओं को उतना ही लागू करते हैं, जितना कि वे स्त्रीत्व की कठोर धारणाओं को करते हैं।” कोरो ने 2000 और 2007 के बीच जनसंख्या परिषद के साथ साझेदारी में एक क्रिया अनुसंधान कार्यक्रम के दौरान पुरुषत्व के अवधारणा निर्माण प्रक्रिया और लिंग हिंसा के कारणों का अध्ययन किया था। इस सत्र में कई पुरुषों ने बताया कि कैसे पुरुष के महिला से श्रेष्ठ होने का विचार कुछ ऐसा है जो वे न केवल अपने आसपास के अन्य पुरुषों के व्यवहार से सीखते हैं, बल्कि अपने जीवन में उपस्थित महिलाओं के व्यवहार से भी सीखते हैं। अध्ययन के दौरान इस तथ्य के बावजूद कि महिलाएं घर के अंदर और बाहर दोनों जगह काम करती हैं, घर के नियंत्रक और रोटी कमाने वालों के रूप में पुरुषों की मर्दानगी की रूपरेखा भी सामने आई। मीडिया द्वारा प्रोत्साहित किए गए ‘पुरुष केवल उस तरह के होते हैं’ या ‘अगर वह मुझे मारता है, तो वह मुझसे प्यार करता है’ जैसे विचार आम थे जिनका सामना कोरो को करना पड़ा।

यगना कहती हैं “कुल मिलाकर, बहुक्षेत्रीय दृष्टिकोण एकल हस्तक्षेप की तुलना में अधिक प्रभावी होने की संभावना है। इसका कारण यह है कि किशोर सशक्तिकरण के जोखिम कारक आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। किशोरों को कम उम्र में शादी या हिंसा के जोखिम में डालने वाली कई कमज़ोरियों को एक साथ संबोधित करने की आवश्यकता है।” अंततः यह एक साथ निर्माण करने के बारे में है, क्योंकि पितृसत्ता हम सभी को प्रभावित करती है और इसका आकार पीढ़ियों और संदर्भों में बदलता रहता है। स्वयंसेवी संस्थाओं और फ़ंडरों के लिए यह अच्छा होगा कि वे समान रूप से इसकी पहचान करें कि लिंग बायनेरीज़ को तोड़ने की प्रक्रिया के लिए धैर्य और प्रतिबद्धता के साथ ही प्रतिक्रिया व विफलता का सामना करने की तत्परता की भी ज़रूरत होती है।

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रोहिणी निलेकनी फ़िलांथ्रपीज (आरएनपी) उन विचारों, व्यक्तियों और संस्थानों का समर्थन करना चाहता है जो नैतिक नेतृत्व, तात्कालिकता की भावना और सीखने के साहस के साथ एक मजबूत समाज को सक्षम बनाने जैसा महत्वपूर्ण काम करते हैं। आरएनपी उन समुदायों को मजबूत करना चाहता है जो अपनी बेहतरी के लिए काम करते हैं। यह उन नेटवर्क और आंदोलनों का समर्थन करके ऐसा करता है, जो अक्सर समाज, सरकार और बाजार के बीच बैठता है। यह पर्यावरण, जैव विविधता और संरक्षण, लैंगिक समानता, और सक्रिय नागरिकता और न्याय तक पहुंच जैसे चार क्षेत्रों में फ़ंडिंग करता है।

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