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हल्का-फुल्का

तारीख पर तारीख!

गांव और शहर के चुनाव में उतना ही फर्क है, जितना घर की दीवार और फेसबुक वॉल में।
6 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित

गांव का नाम था न्यूली, लेकिन वहां सब कुछ पुराना था। सरकारी कागजों में उसे नागौन ग्राम पंचायत लिखा जाता था, लेकिन लोग न्यूली ही कहते थे। उनके लिए अपना गांव सरकारी नाम कम, आदत का मामला ज्यादा था।

उस दिन चौक पर भीड़ जुटी थी। न शादी थी, न शोक। फिर भी सब जुटे हुए थे। खबर क्या थी? पंचायत चुनाव।

“फिर टल सकता है,” मास्साब रामसनेही ने कहा और स्प्लेंडर का स्टैंड जमाया।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

“क्यों?” हर्षमणि ने पूछा। नौ लोगों के परिवार से आने वाले हर्षमणि को पिछले चुनाव में खुद दो वोट पड़े थे।

“सीमा-निर्धारण अटका है,” मास्साब बोले।

न्यूली में सीमा-निर्धारण कोई तकनीकी प्रक्रिया नहीं थी। इससे तय होता था कि किसके चाचा किस वार्ड में पड़ेंगे और किसके ससुर दूसरे में। किसका घर किस वार्ड में जाएगा, किसकी बिरादरी किसके साथ जुड़ेगी।

“तो फिर प्रधान कौन?” बबीता ने पूछा। वह जिस सीमेंट की बेंच पर बैठी थी, उस पर पिछले प्रधान का नाम अब भी पेंट से झांक रहा था।

यह गांव में ऐसे पूछा जाता था, जैसे ‘कल बारिश होगी क्या?’ वाला सवाल। सबको कुछ न कुछ अंदाजा होता था, भरोसा किसी को नहीं।

“रमेश तो लड़ेगा,” किसी ने कहा, “उसके पीछे पूरी बिरादरी है।”

“बिरादरी है, पर करम नहीं!” दूसरे ने जोड़ा, “पिछली बार हैंडपंप का सारा पैसा नाली में बहा गया था।”

“इस बार अपने लड़के को दिल्ली से बुलाया है,” तीसरे ने कहा, “कह रहा था व्हाट्सएप पर प्रचार करेगा।”

ठीक इसी समय मीलों दूर तीसवीं मंजिल के फ्लैट में युवराज मोबाइल स्क्रॉल कर रहा था। स्मार्ट-लिविंग सोसायटी के व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज आया:‘रोड्स क्लोज़्ड टुमारो। इलेक्शन रैली।’

युवराज ने उसे पढ़ा, लाइक किया, स्लाइड कर के टोमैटो एप्प खोली और रात के लिए चिकन चंगेजी ऑर्डर करने में डूब गया।

मां ने पूछा, “लेकिन इलेक्शन है कब?”

“पता नहीं यार,” वह बोला, “हर छह-सात साल में होता है शायद…”

“कौन लड़ रहा है?”

“होगा कोई कोई पार्टी वाला,” उसने कहा, “क्या फर्क पड़ता है…”

बात दुरुस्त थी। युवराज की सोसाइटी में फर्क आसानी से एंटर नहीं कर पाता था। पहले गार्ड फोन कर के एंट्री-अप्रूवल लेते थे, “सर फर्क आया है। भेज दें?”

बाकी पानी वगैरह टैंकर से आता था, कूड़ा-कचरा एजेंसी उठाती थी, बिजली प्रीपेड होती थी, पार्क आरडब्ल्यूए मेंटेंन करता था और शिकायत एप्प पर दर्ज हो जाती थी।

चुनाव में प्रतिनिधि बदले या न बदले, झटपट कोई भी सर्विस ऑर्डर करने की एप्प रोज बदल जाती थी।

अगले ही दिन स्मार्ट-लिविंग सोसाइटी वाले शहर में नगर निगम चुनाव दो महीने आगे बढ़ गए। इसकी खबर अखबार की बायीं साइड में छपे चुटकुले के ऊपर छोटे से डिब्बे में छपी। 

युवराज ने स्मूदी का घूंट लेते हुए कहा, “चलो बढ़िया है। जाम से छुट्टी।”

ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों और शहरी जीवन की सुविधाओं व आराम के बीच का अंतर दिखाता चित्र_चुनाव
गांव को चुनाव याद रखने पड़ते हैं। शहर चुनाव भूल जाने का आराम फरमा सकते हैं। | चित्र साभार: चैटजीपीटी

न्यूली में मामला थोड़ा संगीन था। यहां चुनाव टलते ही घर के बजट बदल जाते थे। राशन की तौल, ट्यूबवेल का पंप, सामुदायिक भवन की मरम्मत, सब कुछ अगली तारीख तक चौपट।

“तो?” हर्षमणि ने पूछा, “इस बार भी फाइल अटक गयी?” रमेश ने कंधे उचका दिए।

शाम होते-होते खबर आयी कि तौल मशीन खराब हो गयी है। राशन की दुकान बंद रहेगी।

गौरा ने पूछा, “कब तक?” तुलावटी बोला, “नया प्रधान आने तक।” उस शाम ट्यूबवेल भी बंद रहा।

बिजली विभाग के सूचनापट्ट पर लिखा गया: पंचायत से साइन चाहिए।

पंचायत के सूचनापट्ट पर लिखा गया: अभी कोई चुना हुआ नहीं है।

मास्साब ने कहा, “पिछली बार भी यही हुआ था। तीन महीने तक अस्थायी आर्डर चला था।”

अस्थायी। यानी न्यूली का सबसे स्थायी शब्द।

ट्यूबवेल के वादों पर लहालोट गांव वाले अगली सुबह बाल्टी लेकर टंकी पर जमा थे। भीड़ ही भीड़।

तारीख का इंतजार करने वाली भीड़।

उधर शहर में युवराज जैसे लाखों के लिए इंतजार ज्विगी और टोमैटो एप्प की तरह था। लोड हो गया तो ठीक, नहीं तो दूसरा तो है ही।

नगर निगम चुनाव टल गए थे। लेकिन युवराज को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। सोसाइटी में कूड़ा उठा, पानी आया, खाना पहुंचा।

उसका लोकतंत्र ऑटो-अपडेट पर था। न्यूली का लोकतंत्र कीपैड फोन के मिट चुके बटन की तरह सांसें भर रहा था।

न्यूली पूछ रहा था: तारीख कब आएगी? क्योंकि तारीख आएगी, तो सड़क-पानी-राशन आएगा।

स्मार्ट-लिविंग सोसाइटी में तारीख आए न आए, बाकी सब आते रहते थे। डिलीवरी बॉय, हाउस-हेल्प, हेयर ड्रेसर, जुंबा इंस्ट्रक्टर, स्क्रैप-डीलर वगैरह-वगैरह।

शायद इसलिए गांव को चुनाव याद रखने पड़ते हैं।

शहर चुनाव भूल जाने का आराम फरमा सकते हैं।

इस बीच दोनों जगहों पर जो नहीं बदलता, वो है तारीख पर तारीख पर तारीख।

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