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मनरेगा में रोजगार बंद होने से पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों पर क्या असर पड़ा है?

मनरेगा योजना के बंद होने से न केवल ग्रामीण स्तर पर लोगों का रोजगार जा रहा है बल्कि उन्हें पलायन के लिए भी मजबूर होना पड़ रहा है।
मनरेगा योजना के तहत काम करती महिलाएं_मनरेगा

पश्चिम बंगाल में पिछले ढाई साल से केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन न किए जाने के आधार पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट, 2005 (मनरेगा) के तहत कार्य गतिविधियां बंद हैं। लगातार तीन वित्तीय वर्षों से, पश्चिम बंगाल में केंद्र की ओर से आवंटित किया जाने वाला मनरेगा बजट लगातार शून्य है।

इसका सीधा असर यहां से पलायन कर रहे श्रमिकों की बढ़ती संख्या के रूप में देखा जा सकता है। यह लेख इसी समस्या से जूझ रहे तीन जिलों उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर और पुरुलिया के श्रमिकों के अनुभव पर आधारित है।

पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले की ईटाहार पंचायत के कमालपुर गांव में 29 साल के भजन बर्मन और 27 साल की उनकी पत्नी किरण पॉल के साथ रहते हैं। ये दोनों हैं कि उन्हें उनके गांव या उसके आसपास के क्षेत्रों में ही काम मिल जाए ताकि रोजगार के लिए किसी और राज्य ना जाना पड़़े।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाके से भजन और उनके जैसे हजारों युवा पलायन कर रोज़गार के लिए कहां जाएंगे, यह तय नहीं है। भजन कहते हैं, “हम साल में आमतौर पर आठ महीने पैसा कमाने के लिए दूसरे राज्य में जाते हैं और शेष चार महीने खेती-बाड़ी के समय गांव में रहते हैं। दिल्ली, हरियाणा, हैदराबाद जहां हमें काम मिलता है, वहां चले जाते हैं। फिलहाल तो हम लोग हैदराबाद के एक अस्पताल में हाउस कीपिंग का काम करते हैं जिसमें हमें 12 हजार रुपये महीने की तनख्वाह मिलती है। उसी में घर के लिए पैसे बचाना होता है हालांकि गांव और यहां दोनों जगहों के खर्च की वजह से बहुत दिक्कत होती है”। वे मानते हैं कि बेशक मनरेगा में 100 दिन का ही रोजगार मिलता है और मजदूरी भी कम है, लेकिन ये बाहर जाने से बेहतर विकल्प है।

मनरेगा फ़ंड की दिक्कत

कमालपुर के बुजुर्ग मनरेगा मजदूर जुलाल बर्मन कहते हैं कि जब मनरेगा चालू था तो उन्होंने काम किया था, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा बजट आवंटन रोके जाने के कारण उनका 30 से 40 दिन का पैसा अभी भी बकाया है। हालांकि अब पैसा और काम रोके जाने का केस कोर्ट में चल रहा है।

स्थानीय मनरेगा कार्यकर्ता एवं श्रमिक संगठन पीबीकेएमएस (पश्चिम बंग खेत मजूर समिति) के एरिया-कोआर्डिनेटर हसीरुद्दीन अहमद कहते हैं, “केंद्र सरकार के द्वारा मनरेगा का फंड रोके जाने के बाद पलायन बहुत बढ़ा है। कमालपुर और बलरामपुर में अनुसूचित जाति, मुस्लिम वर्ग और ओबीसी समुदाय के लोग ज्यादा रहते हैं। दोनों गांवों को मिलाकर करीब 600 घर हैं और लगभग हर घर का कोई न कोई सदस्य बाहर काम की तलाश में पलायन करने पर मजबूर है।”

दोनों गांव के लोग बताते हैं कि जब पहले यहां मनरेगा का काम चल रहा था, तब उसमें कई सारी गड़बड़ियां की जाती थीं। जो काम मनरेगा श्रमिकों से लिया जाना चाहिए था उसकी जगह जेसीबी मशीन का इस्तेमाल किया जाता था ताकि श्रमिकों के मुकाबले मशीन से जल्दी काम लेकर पैसा बनाया जा सके।

हालांकि इस वर्ष के शुरुआत में राज्य सरकार ने बकाया मजदूरी करीब 30 लाख मनरेगा कर्मियों के खाते में ट्रांसफर करने का निर्णय लिया है। इसमें कुछ लोगों को उनकी मज़दूरी मिल चुकी हैं तो कुछ को नहीं। हालांकि आंकड़ों के अनुसार राज्य में वास्तविक मनरेगा मजदूरों की संख्या कहीं अधिक है।

पीबीकेएमएस के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अबू बकर कहते हैं, “मनरेगा में बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान होने के बावजूद कोई लाभ नहीं मिलता है। जब भत्ता मांगने के लिए पंचायत में जाते हैं तो कहा जाता है कि बीडीओ ऑफिस जाएं, वहां जाकर कहा जाता है कि डीएम (कलेक्टर) ऑफिस जाएं। आखिर में जब डीएम ऑफिस हम जाते हैं तो वहां कहा जाता है कि इसके लिए हम बीडीओ या प्रखंड विकास अधिकारी को आदेश कर देंगे”।

मनरेगा योजना के तहत काम करती महिलाएं_मनरेगा
मनरेगा ने आत्मनिर्भर महिलाओं का एक वर्ग भी तैयार किया था जो अब काम बंद होने से खत्म होता नज़र आ रहा है। | चित्र साभार: यूएन वुमन एशिया एंड द पैसिफिक / सीसी बीवाई

काम बंद होने के बाद सूची से नाम हटाना

उत्तर दिनाजपुर के ईटाहार ब्लॉक के कमालपुर गांव की ही निवासी सुचित्रा दास बताती हैं कि उनका और उनके पति दीपक दास का नाम मनरेगा सूची से हटा दिया गया है। अब उनके पति दिल्ली में काम करते हैं जबकि वह गांव में ही रहती हैं। मनरेगा एमआइएस (प्रबंधन सूचना प्रणाली) की पड़ताल में यह पाया गया कि दोनों का नाम तीन फरवरी 2023 को हटा दिया गया था और इसकी वजह काम की मांग नहीं होना बताया गया है।

उत्तर दिनाजपुर के रायगंज ब्लॉक की  कमलाबाड़ी पंचायत के 733 मनरेगा मजदूरों में से 242 मनरेगा मजदूरों यानी करीब एक तिहाई श्रमिकों के नाम विभिन्न वजहों से डिलीट किये गये हैं। यहां रायगंज शहर का विस्तार हो चुका है, जहां कई सरकारी दफ़्तर और बाजार हैं। इस वजह से यहां रोजगार के दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं और अपेक्षाकृत पलायन का असर यहां कम है। लेकिन ग्रामीणों का अनुमान है कि यहां के करीब 50 लोग बाहर काम करने गये हैं।

मनरेगा सूची से नाम हटाये जाने की शिकायत पश्चिम बंगाल के सबसे अधिक गरीब आबादी वाले जिले पुरुलिया से भी मिलती है। यहां के बड़ा बाजार ब्लॉक के तुमरासोल गांव की रहनेवाली पूर्णिमा महतो और ममानी रजक बताती हैं कि उनका नाम 17 मार्च 2023 को मनरेगा सूची से डुप्लीकेट जॉब कार्ड होने की बात कहकर हटा दिया गया था। लेकिन उनका दावा है कि यह पूरी तरह से गलत है।

सूची से नाम हटाए जाने पर केंद्र सरकार क्या कहती है?

25 जुलाई 2023 को तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गिरिराज सिंह द्वारा लोकसभा में दिये गये एक जवाब के अनुसार, सूची से जॉब कार्ड को हटाए जाने के कई कारण हैं। इसमें फर्जी या डुप्लीकेट जॉब कार्ड होना, काम की मांग न होना, परिवार का अपनी ग्राम पंचायत से कहीं और स्थायी रूप से चले जाना या फिर मृत्यु हो जाने के बाद भी जॉब कार्ड में उस व्यक्ति का नाम चल रहा हो। इन तमाम मामलों में जॉब कार्ड से नाम हटाया जा सकता है।

केंद्रीय मंत्री के जवाब के अनुसार, वर्ष 2022-23 डिलीट किये गये जॉब कार्ड में पांच करोड़ से अधिक नाम हैं। राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2021-22 की तुलना में वर्ष 2022-23 में 247 प्रतिशत अधिक नाम डिलीट किये गए हैं।

पश्चिम बंगाल में मनरेगा सूची से नाम डिलीट किये जाने के मामले राष्ट्रीय औसत से 21 गुणा अधिक हैं।

नाम डिलीट किये जाने में पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर है। वित्त वर्ष 2022-23 में 83 लाख से अधिक श्रमिकों के नाम डिलीट किये गये जबकि वर्ष 2021-22 में करीब डेढ़ लाख श्रमिकों के नाम डिलीट किये गये थे। मात्र एक वित्तीय वर्ष के अंतराल पर पश्चिम बंगाल में 5199.20 प्रतिशत नाम अधिक डिलीट किये गये। यानी, पश्चिम बंगाल में मनरेगा सूची से नाम डिलीट किये जाने के मामले राष्ट्रीय औसत से 21 गुणा अधिक हैं।

पश्चिम बंग खेत मजूर समिति ने नवंबर 2022 में कलकत्ता हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर पश्चिम बंगाल के वैध मनरेगा मजदूरों को मजदूरी से वंचित रखने का विरोध किया था। हाईकोर्ट ने 19 जनवरी 2024 को इस जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान एक चार सदस्यीय समिति का गठन कर उससे पश्चिम बंगाल में वास्तविक मनरेगा मजदूरों की पहचान सुनिश्चित कराने का फैसला दिया।

हालांकि इस समिति के वकील पूर्वायण चक्रवर्ती ने बताया, “कमेटी तो गठित हो गई है लेकिन हमें अब तक यह पता नहीं चला है कि इसने काम करना शुरू किया है या नहीं, हमें इसका इंतजार है”।

मनरेगा में कामबंदी से महिलाओं पर असर

जैसा कि दक्षिण दिनाजपुर जिले के कुसमंडी ब्लॉक के समसिया गांव की मनरेगा मजदूर सिद्दीका बेगम कहती हैं कि उनके पति सहराब अली पंजाब में काम करते हैं और घर पर परिवार की पूरी जिम्मेवारी उन्हीं पर है। इसी तरह गांव की मरजीना खातून नाम की एक महिला ने बताया कि उनके पति कश्मीर में कमाते हैं और यहां परिवार की जिम्मेवारी उन पर है।

इस तरह, मनरेगा की काम बंदी ने महिलाओं पर दोहरा बोझ बढ़ाया है। एक तो कामबंदी की वजह से उनकी आय का जरिया छिन गया है औरनदूसरा इसमें काम न होने की वजह से घर के पुरुषों के पलायन से उन पर पारिवारिक जिम्मेवारियों का दबाव दो गुना हो गया है। मनरेगा ने आत्मनिर्भर महिलाओं का एक वर्ग भी तैयार किया था जो अब काम बंद होने से खत्म होता नज़र आ रहा है। फिलहाल, केंद्र व राज्य के बीच टकराव की वजह से कानूनन मिली रोजगार गारंटी धरातल पर लागू न होने से लोगों के पास पलायन के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है।

अधिक जानें

  • इस लेख में मनरेगा के बारे में वह सब कुछ जानें जो आपके लिए ज़रूरी है।
  • पढ़ें कि अंतर्निहित किए गए प्रयोगों से मिले सबूतों पर आधारित नीतियां किस तरह खतरनाक हो सकती हैं।
  • पांच भारतीय राज्यों में ग्रामीण रोजगार की स्थिति के बारे में जानें

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