पर्यावरण सखियां: जिनके जिम्मे है कचरा प्रबंधन से लेकर पर्यावरण की रखवाली तक
उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में अक्सर खुले में कचरा जमा होता दिखाई देता है जो पानी के स्रोतों को प्रदूषित करता है। वहीं, जब इस कचरे को जलाया जाता है तो हवा प्रदूषित होती है। देहरादून का मशहूर पर्यटन स्थल सहस्त्रधारा भी इससे बचा नहीं हैं। कभी अपने निर्मल-ताजा झरनों के लिए जानी जाने वाली यह जगह अब प्लास्टिक कचरे में दबकर, अपनी खूबसूरती खोती जा रही है।
आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल 2024 से जुलाई 2025 के बीच केवल सहस्त्रधारा मुख्य बाजार और इसके आसपास की 15 पंचायतों में पर्यटकों, घरों और स्थानीय दुकानों ने मिलकर 800 मीट्रिक टन से अधिक सूखा कचरा उत्पन्न किया है। इसका ज्यादातर हिस्सा कम कीमत वाले प्लास्टिक और कागज से बना है। यह समस्या पर्यावरण से जुड़ी होने के साथ-साथ सामाजिक भी है, इसीलिए इसके समाधान समुदाय के जीवन अनुभवों और वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर बनाए जाने जरूरी हैं।
कचरे से जुड़ी किसी भी समस्या का असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है इसलिए पिछले कुछ वर्षों में, कई समुदायों ने सिविल सोसाइटी संगठनों के साथ मिलकर इस चुनौती को हल करने की कोशिश की है। ऐसी ही एक पहल है – वेस्ट वॉरियर्स का ‘पर्यावरण सखी’ मॉडल। यह मॉडल सबसे पहले साल 2021 में कॉर्बेट क्षेत्र के पांच इलाकों में शुरू हुआ जिसमें दो ग्राम पंचायतें, दो वन पंचायतें और एक गांव शामिल था। साल 2022 में इसे सहस्त्रधारा में भी शुरू किया गया।
इस पहल में महिलाओं, जिन्हें सखी कहा जाता है, को कचरा प्रबंधन करने और जागरूकता अभियान चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है।
सखियां घर-घर और छोटे दुकानों से सूखा कचरा इकट्ठा करती हैं। इसके बाद यह कचरा प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट (पीडब्लूएमयू) में ले जाया जाता है। यहां सखियां उसे ध्यान से 15 अलग-अलग हिस्सों में छांटती हैं। जैसे अलग-अलग तरह की पॉलीथिन, मल्टी-लेयर पैकेजिंग (एमएलपी), कागज, आदि। फिर इस कचरे के एक हिस्से को मशीन की मदद से दबाकर बड़े बंडलों में बदल दिया जाता है और रीसाइक्लिंग के लिए भेज दिया जाता है।
सखियों का काम सिर्फ कचरा इकट्ठा करना और छांटना नहीं है। वे लोगों को यह भी समझाती हैं कि कचरा कैसे हमारे आसपास के माहौल को प्रभावित करता है, घरों में कचरे को अलग करने की आदत क्यों जरूरी है, और महिलाएं पर्यावरण सहज मासिक-धर्म उत्पादों का उपयोग कैसे कर सकती हैं। वे बच्चों के साथ गतिविधियां भी करती हैं ताकि उनमें पर्यावरण के प्रति समझ और जिम्मेदारी विकसित हो सके।
लेकिन यह सफर आसान नहीं रहा। उन्हें इसके लिए ढलानों और कठिन पहाड़ी रास्तों में जाकर, लोगों तक पहुंचना होता है। इसके साथ ही, उन्हें आम लोगों के नजरिए को समझने, इस काम को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने और स्थानीय नेतृत्व का भरोसा जीतने जैसे प्रयास भी करने पड़े।
हमने यह कैसे किया, जानते हैं:
1. स्थानीय प्रशासन के साथ साझेदारी
सबसे पहला कदम स्थानीय प्रधानों और वार्ड सदस्यों को साथ जोड़ने का था क्योंकि गांवों में उनका प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। कोविड-19 के दौरान, वेस्ट वॉरियर्स ने राहत कार्य के लिए 13 लाख रुपये से अधिक राशि जुटाई थी और नमक, चीनी, चावल और दाल जैसी आवश्यक सामग्री घर-घर पहुंचाईं थी। इन प्रयासों से समुदाय का भरोसा जीता जा सका।

फिर भी, स्थानीय नेतृत्व तक पहुंच बनाना आसान नहीं था। हम लगातार संपर्क करते रहे, लेकिन कई बार प्रधान मुलाकात के लिए समय नहीं निकाल पाते थे। बैठकें टल जाती थीं या आखिरी समय पर रद्द हो जाती थीं। इसके बावजूद, टीम ने धैर्य बनाए रखा और संवाद को आगे बढ़ाती रही। इसी दौरान, जिला पंचायत सदस्य बीर सिंह चौहान जिनसे पहले भी हमारी बातचीत रही थी, एक महत्वपूर्ण सहयोगी बने। उन्होंने अन्य वार्ड सदस्यों और हिचकिचा रहे प्रधानों को हमारे काम के बारे में बताया और उन्हें हमसे जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
एक गांव की बैठक में जब लोगों को यह पता चला कि हम एक पीडब्लूएमयू (प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट) बनाने की योजना बना रहे हैं तो उन्होंने चिंता जताई कि कहीं यह ‘कचरा घर’ न बन जाए। इस भ्रम को दूर करने के लिए हमने गांव के प्रतिनिधियों को हर्रावाला स्थित अपने मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) का दौरा कराया जहां पीडब्लूएमयू भी मौजूद है। अपनी आंखों से पूरी प्रक्रिया देखकर स्थानीय नेताओं को हमारे काम की बेहतर समझ मिली। यह यात्रा एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, यहीं से बातचीत का रुख बदलने लगा और चीजें आगे बढ़ने लगीं।
स्थानीय नेतृत्व के इस समर्थन से हमें तुरंत कचरे पर चर्चा शुरू किए बगैर गांवों की बैठकों में शामिल होने, समय बिताने और अपनी उपस्थिति मजबूत करने का मौका मिला। शहरों में कचरा संग्रहण और छंटाई नगरपालिकाओं की जिम्मेदारी होती है। लेकिन शहरी सीमा से बाहर स्थित सहस्त्रधारा की छह पंचायतों में ऐसा कोई औपचारिक सिस्टम नहीं था। यहां लोग कचरा या तो नालों और झरनों में फेंक देते थे या खुले में जलाते थे। हमारे मॉडल ने इसी कमी को दूर किया और धीरे-धीरे स्थानीय शासन की ओर से और अधिक समर्थन मिलने लगा।

2. महिलाओं को ‘पर्यावरण सखी’ के रूप में जोड़ना
हमें शुरूआत में ही समझ आ गया था कि महिलाएं कचरा प्रबंधन से जुड़े बदलावों को अपनाने में सबसे अधिक मददगार हो सकती हैं। उनका रोजमर्रा का जीवन जमीन, पानी, ईंधन और खेती से जुड़ा होता है इसलिए कचरे से उनका सामना सबसे पहले और सीधे तौर पर होता है। महिलाओं को सूखे कचरे के नुकसान और इसके निपटान में उनकी भूमिका को समझने में थोड़ा समय तो लगा लेकिन अब वे मजबूती से आगे बढ़ रही हैं।
हमारे सामने आई सबसे बड़ी चुनौती घर और समाज की सोच थी। कई परिवारों को यह काम पसंद नहीं था। कुछ लोगों ने साफ कहा कि “हमारी बहुएं यह काम नहीं करेंगी।” यह सोच इसलिए भी थी क्योंकि कचरे को संभालने का काम कई जगहों पर कम सम्मान वाला माना जाता है, खासकर उन महिलाओं के लिए जिनके परिवारों की सामाजिक स्थिति ऊंची मानी जाती है।कई महिलाएं यह काम इसलिए करना चाहती थीं क्योंकि वे अपने आसपास के माहौल को साफ रखना चाहती थीं, घर की जिम्मेदारियों के अलावा भी कुछ करना चाहती थीं, और थोड़ी-बहुत आय कमाना चाहती थीं। लेकिन वे यह भी सोचती थीं कि घर या आस-पड़ोस के लोग क्या कहेंगे?
इस सोच को बदलने के लिए हमने उन महिलाओं की कहानियां सुनाई जिन्होंने अपने साहस और नेतृत्व से समाज में बदलाव लाया। हमने झांसी की रानी और झलकारी बाई की वीरता का जिक्र करने से लेकर चेतना सिन्हा जैसी महिलाओं तक की बात की जो महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर काम कर रही हैं। हमने परबती गिरी जैसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और चमोली की गौरा देवी के उदाहरण भी दिए जिन्होंने पेड़ों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। जब इस काम को महिलाओं द्वारा पर्यावरण की रक्षा के बड़े प्रयास का हिस्सा बताया गया तो यह काम महिलाओं को सम्मानजनक और सार्थक लगने लगा। उन्हें लगा कि वे अपनी पहचान से बड़ा कुछ कर रही हैं।
हमने कचरे की समस्या को समझाने के लिए अलग-अलग तरीकों का भी इस्तेमाल किया। उदाहरण के लिए, शेरा गांव पंचायत में एक सामुदायिक पैदल यात्रा रखी गई, जहां रास्ते में पड़े कचरे को देखकर लोगों ने खुद चर्चा शुरू की कि हमारे आस-पास की जगह क्यों और कैसे साफ रहनी चाहिए। जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, महिलाओं ने यह समझना शुरू किया कि यह काम सिर्फ कचरा इकट्ठा करने का नहीं, बल्कि धरती, पानी और हवा की रक्षा करने का भी है। जब उन्होंने देखा कि जिम्मेदारी से कचरा इकट्ठा और प्रोसेस करने से उसे न तो खुले में फेंकना पड़ेगा और न ही जलाना पड़ेगा तो उन्हें एहसास हुआ कि वे अपनी ही जमीन और वातावरण की देखभाल कर रही हैं।
यह समझ आने के बाद महिलाएं अपने लिए खुद बात रखने लगीं। जैसे जब मुक्ता पंवार इस काम से जुड़ना चाहती थीं तो उनके घर में विरोध हुआ। उन्होंने बताया कि “लोग मेरी सास से कहते थे कि क्या तुम्हारी बहू को यही काम मिला है? लेकिन मेरे पति ने साथ दिया। मैंने सासू मां को समझाया कि यह काम पर्यावरण को संभालने का है।” समय के साथ सखियों और उनके काम की पहचान भी बढ़ी। जब उन्हें स्वच्छ भारत मिशन या पंचायती राज मंत्रालय की तरफ से सराहना मिली तो गांव के लोगों को एहसास हुआ कि यह काम सिर्फ सम्मानजनक ही नहीं बल्कि सरकारी स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

3. कचरे को आय का जरिया बनाना
इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि कचरे के काम से महिलाओं को कुछ कमाई हो। जब किसी काम के साथ आय जुड़ती है तो उसे और सम्मान मिलता है। लेकिन कचरे को आजीविका में बदलना आसान नहीं होता, खासकर तब जब लोग उम्मीद करते हैं कि यह काम मुफ्त में किया जाए।
सहस्त्रधारा में, हमारा अभियान शुरू होने से पहले, लोग अपना कचरा या तो नजदीकी नालों में फेंक देते थे या फिर जला देते थे। जब हमने यूजर फीस यानी घर-घर कचरा उठाने की सेवा के बदले एक छोटा-सा मासिक शुल्क शुरू किया तो पहली प्रतिक्रिया थी कि “हम कचरा भी दें और पैसा भी दें?”
हम कई बार घरों और दुकानों पर जाकर समझाते थे कि यह केवल कचरा उठाने का काम नहीं है बल्कि यह अपने इलाके की जमीन, पानी और हवा को साफ रखने की जिम्मेदारी है। हमने लोगों को बताया यह पैसा उन महिलाओं के सम्मान और मेहनत का भी मूल्य है जो उन्हीं के समुदाय से आती हैं।
धीरे-धीरे लोगों का नजरिया बदलने लगा। कुछ लोग तो हमारे सुविधा केंद्र (पीडब्लूएमयू) को भी देखने आए कि कचरा कैसे छांटा और प्रोसेस किया जाता है। जब सखियां नियमित रूप से घर-घर पहुंचने लगीं तो कुछ घरों ने शुल्क देना शुरू किया। हालांकि अभी भी लगभग 47 प्रतिशत घर ही शुल्क देते हैं, लेकिन अप्रैल 2024 से जुलाई 2025 के बीच हम 1,73,710 रुपए जमा कर सके हैं। सहस्त्रधारा में किराना दुकानों, ढाबों और कैफे की लंबी लाइनें हैं जो पर्यटकों को सेवा देती हैं। इनसे काफी प्लास्टिक कचरा निकलता है। सखियों और टीम ने उनसे बात की कि अगर वे ज्यादा कचरा उत्पन्न करते हैं तो उन्हें ज्यादा योगदान देना चाहिए। अप्रैल 2024 से जुलाई 2025 के बीच हम 93,150 रुपए केवल व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से जमा कर सके।
हमारी आय का एक और स्रोत है – रीसाइक्लेबल कचरा। छंटाई के बाद इसे प्रमाणित रीसाइक्लर्स को भेजा जाता है। सखियों की कमाई उनके काम के घंटे के अनुसार तय होती है। औसतन एक सखी चार सौ चालीस रुपए प्रतिदिन (न्यूनतम मजदूरी) कमाती है। यह बहुत बड़ी रकम नहीं है लेकिन इससे महिलाओं का अपने प्रति नजरिया बदलने लगा है।
समय के साथ हमने देखा कि महिलाएं अपनी खुद अपना कचरा प्रबंधन समूह बनाने लगीं जिसमें एक ही परिवार या गांव की और महिलाएं भी जुड़ती गईं। आज सखियों ने अपना स्वयं-सहयोग का नेटवर्क बना लिया है। अगर किसी सखी पर आर्थिक संकट आता है तो बाकी महिलाएं मिलकर उसका साथ देती हैं। इसी एकजुटता और भरोसे ने इस पहल को टिकाऊ बनाया है।
ज्ञानदीप अग्निहोत्री, असलम खान, आरती जावड़ी, सीमा देवी, साशी लखेड़ा, सरिता रावत, बीना रावत, सुदा पंवार, मुक्ता पंवार ने भी इस लेख में योगदान दिया है।
यह लेख अंग्रेजी में पढ़ें।
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लेखक के बारे में
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नैना बाजपेयी वेस्ट वॉरियर्स सोसाइटी में कम्युनिकेशन कंसल्टेंट हैं। वेस्ट वॉरियर्स सोसाइटी, देश के हिमालयी क्षेत्र में ठोस कचरा प्रबंधन में प्रणालीगत बदलाव लाने के लिए काम करने वाला एक गैर-लाभकारी संगठन है। इसमें नैना कचरा प्रबंधन और सतत विकास से जुड़ी जागरूकता बढ़ाने के लिए स्टोरीटेलिंग और सूचना, शिक्षा एवं संचार (आईईसी) संबंधी जिम्मेदारियां देखती हैं। नैना ने मुंबई के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से मास मीडिया में स्नातक की डिग्री हासिल की है।
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राजेश गोस्वामी एक विकास सेक्टर पेशेवर हैं, जिन्हें शिक्षा, सामुदायिक विकास और सस्टेनेबिलिटी के क्षेत्र में छह वर्षों का अनुभव है। उनका काम मुख्य रूप से रिसर्च, कचरा प्रबंधन प्रणाली के डिजाइन, ऑर्गेनिक वेस्ट प्रोसेसिंग, और समुदाय-आधारित सतत प्रयासों को मजबूत करने पर केंद्रित है।
