सुनने की संरचना: समावेशन और हाशिये की आवाज
साल 2019 में जब हमने लेडबाय की शुरुआत की थी, तब हमारे पास कोई तय मार्गदर्शिका नहीं थी। हम में से कोई शिक्षण में प्रशिक्षित नहीं था और न ही हम शिक्षण विधियों के विशेषज्ञ थे। हमारे पास बस एक गहरी जिज्ञासा थी, आपनी समझ थी और यह दृढ़ विश्वास था कि भारतीय मुस्लिम महिलाओं को ऐसे परिवेश मिलने चाहिए, जहां उनकी मुश्किलों से इतर उनकी महत्वाकांक्षाओं पर ध्यान दिया जा सके।
लेडबाय भारतीय मुस्लिम महिलाओं के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए नेतृत्व, करियर और उद्यमिता प्रोग्राम संचालित करता है। ये ऐसे कार्यक्रम हैं, जो वर्षों तक उनकी जरूरतें सुनते और समझते हुए, उनके साथ मिलकर विकसित किए गए हैं।
हमारी सीख
योजना से नहीं, सुनने से शुरुआत करें। डिजाइन करने से पहले प्रश्न पूछें। एक बार नहीं, लगातार। और सुनने की प्रक्रिया को कभी रुकने न दें। सुनने से प्रासंगिकता बनती है, और प्रासंगिकता से विश्वास।
काम के पहले साल में इस बात का मतलब था लंबी-लंबी टेलीफोन बातचीत, अनगिनत व्हाट्सएप संदेश, ईमेल संवाद और विस्तृत फीडबैक फॉर्म। समय बीतने के साथ यही प्रक्रिया एक संगठित, मुक्त–स्रोत स्वयंसेवी कार्यक्रम में बदल गयी, जिसमें कोई भी व्यक्ति देशभर में कहीं भी मुस्लिम महिलाओं के साथ पांच संरचित साक्षात्कार करने के लिए साइन अप कर सकता था। आज यही स्वयंसेवी-आधारित फीडबैक प्रणाली हमारे सुनने की प्रक्रिया को संस्थागत बनाने के प्रमुख तरीकों में से एक है। यही हमें बताती है कि किस पहलू को बनाए रखना है, किसे संशोधित करना है, और किसे पूरी तरह छोड़ देना है।
लेकिन सुनने का अर्थ केवल बाहरी समुदाय तक सीमित नहीं है। लेडबाय में हम हर कार्यक्रम यह मानकर विकसित करते हैं कि प्रतिभागी हमारे साथ मिलकर उसका सह-निर्माण करेंगे। न केवल अपनी सीख के लिए, बल्कि उन प्रतिभागियों के लिए भी जो आने वाले वर्षों में इन कार्यक्रमों का हिस्सा बनेंगे। हमारे कोहॉर्ट में सिर्फ शिक्षार्थी नहीं, संरक्षक भी हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे सफलता से ज्यादा असफलता पर विचार करें, ताकि आने वाले कल को मजबूत किया जा सके।

सिर्फ प्रमाणपत्रों के लिए नहीं, भरोसे के लिए डिजाइन करना
अक्सर हाशिए पर धकेले गए समुदायों के लिए बनाए गए कार्यक्रम सत्ता के उन्ही ढांचों को दोहराते हैं, जिन्हें वे तोड़ना चाहते हैं। इस कड़ी में वे आकर्षक रिज्यूमे, ‘सही’ डिग्री, ‘सही’ जवाब या संभ्रांत भाषा तलाशते नजर हैं।
हमने सीखा है कि कार्यक्रमों को केवल प्रमाण-पत्रों के आधार पर नहीं, बल्कि भरोसे को केंद्र में रखकर डिजाइन किया जाना चाहिए। समय के साथ हमें एहसास हुआ कि किसी व्यक्ति के भाषा-ज्ञान या प्रेजेंटेशन कौशल की तुलना में उसकी लगन और दृढ़ता को पहचानना कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। हमने अब तक हजारों आवेदकों का साक्षात्कार किया है। इस प्रक्रिया में हमने अपने सवालों को इस तरह विकसित किया है कि हम समझ सकें उनका नजरिया क्या है, वे क्या करना चाहते हैं और आगे बढ़ने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कितनी गहरी है।
कई प्रतिभाशाली लोग कौशल की कमी से नहीं, बल्कि आत्म-संदेह, सामाजिक रूढ़ियों या अकेलेपन के कारण पीछे रह जाते हैं। इसी वजह से चयन प्रक्रिया में बाहरी चमक-दमक नहीं, बल्कि इच्छा-शक्ति और उद्देश्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हमें दृढ़ता और स्पष्ट मंशा की तलाश करनी चाहिए। यह हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन जब यह सही तरह किया जाता है, तो उसका असर साफ दिखता है। उदाहरण के लिए, बहुत से ऐसे प्रतिभागी जो शुरुआत में हिचकते हैं, आगे चलकर हमारे सबसे मजबूत साथी बनकर उभरते हैं।
हमारे कई उत्कृष्ट एल्यूमनाई ऐसे हैं, जिनका आत्मविश्वास पहले भले कमजोर था, लेकिन सीखने और आगे बढ़ने की उनकी इच्छा बेहद प्रबल थी। वे भले ही मुखर सार्वजनिक वक्ता न हों, पर अपने परिवारों में आवाज उठाने में पीछे नहीं रहते थे। उदाहरण के तौर पर, भोपाल की 24 वर्षीय आफरीन फेलोशिप के शुरुआती दो सत्रों में लगभग चुप रही। लेकिन अंत तक वह ग्रुप प्रेजेंटेशन लीड करने के साथ-साथ सामुदायिक कार्यक्रमों की मेजबानी भी कर रही थी। आज वह नए प्रतिभागियों के मेंटर की भूमिका निभाती हैं। सना, जिन्होंने लेडबाय से जुड़ने से पहले कभी रिज्यूमे तक नहीं लिखा था, एक वैश्विक टेक कंपनी में नौकरी पाने में सफल हुई और अब स्वयं एक फैसिलिटेटर के रूप में हमारे साथ जुड़ी हुई हैं।
हमारा उद्देश्य इन प्रतिभागियों के जीवन को ‘साकार’ करना नहीं था। हमारा काम था उस बुनियादी ढांचे का निर्माण करना, जिस पर वे मजबूती से चल सकें। उदाहरण के लिए, हर सत्र की शुरुआत में होने वाली 20-मिनट की पल्स चेक। यानी खुले संवाद-स्थल, जहां प्रतिभागी ईमानदारी से साझा कर सकते हैं कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं, और क्या उन्हें परेशान कर रहा है। विश्वास की नींव पड़ने में अमूमन लंबा समय लगता है। लेकिन जब वह भरोसा स्थापित हो जाए, तो यही उनके अनुभव का सबसे खास हिस्सा बन जाता है। तकरीबन हर सर्वे में उन्होंने हमें यह बात बताई है।
प्रोग्राम की दिशा पाठ्यक्रम से नहीं, समुदाय से तय होती है
सबसे अहम नतीजे अक्सर सामग्री से नहीं, बल्कि साथियों के समूह, एल्यूमनी नेटवर्क और अपनत्व की भावना से उपजते हैं।
हमारे पास लगातार आने वाला एक महत्त्वपूर्ण फीडबैक यह है कि लेडबाय का समुदाय ही इसकी धड़कन है। हम इसे ‘ट्राइब फॉर लाइफ’ कहते हैं, और यह सिर्फ एक कहावत नहीं है। हमारे पुराने साथी अक्सर मेंटर, सलाहकार, वक्ता और फैसिलिटेटर के रूप में लौटकर आते हैं। वे सत्र आयोजित करते हैं, एक-दूसरे के लिए फंडरेज करते हैं, नौकरी के अवसर साझा करते हैं, और एक-दूसरे के लिए रिकमेंडेशन लिखते हैं। कुल मिलाकर, वे हमेशा एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं।
उनका यह अपनापन संयोग नहीं, बल्कि सोच-समझकर की जाने वाली एक कोशिश है। हमने सीखा है कि समावेशन का असली अर्थ कार्यक्रमों का विस्तार नहीं, बल्कि रिश्तों को गहराई देना है। यही कारण है कि हम अपने हर प्रोग्राम में छोटे, स्थिर समूह (पॉड्स) बनाते हैं, जो एक-दूसरे की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ एक-दूसरे को समर्थन भी देते हैं। हम सुनिश्चित करते हैं कि हर ज़ूम सत्र में कोई न कोई परिचित चेहरा मौजूद हो। और इसी वजह से हम निजी कहानी और व्यक्तिगत अनुभवों को नेतृत्व कौशल का अभिन्न अंग मानते हैं। जब हम अपनी कहानी सुनाते हैं, तो हम खुद को अपनाने की दिशा में पहला कदम भी आगे बढ़ाते हैं।
अक्सर हाशिए पर धकेले गए समुदायों के लिए बनाए गए कार्यक्रम सत्ता के उन्ही ढांचों को दोहराते हैं, जिन्हें वे तोड़ना चाहते हैं।
बीते कुछ वर्षों में हमें भारतीय मुस्लिम महिलाओं की आंतरिक विविधता को भी ध्यान से समझना पड़ा है। तमिलनाडु की एक महिला की चुनौतियां उत्तर प्रदेश की एक महिला की चुनौतियों से बिल्कुल अलग हो सकती हैं। सिर्फ भाषा में नहीं, बल्कि पूर्वाग्रहों, नेटवर्क तक पहुंच और पारिवारिक ढांचों तक में भी। भविष्य के लिए डिजाइन करने का अर्थ है इन विविधताओं को पहचानना और उन्हें एक जैसा मानकर नजरअंदाज न करना।
हमने यह भी देखा है कि सुगमता (एक्सेस) आकांक्षा को कैसे आकार देती है। कुछ महिलाओं के पास अपने लक्ष्यों के बारे में पहले से स्पष्टता होती है। वहीं उनमें से कुछ यह भाषा खोज रही होती हैं कि वे क्या चाहती हैं और क्यों। लेकिन जैसे ही वे एक सहयोगी, खुद से मेल खाते समूह से मिलती हैं, तो उनमें तेजी से बदलाव आता है। जैसे एक प्रतिभागी ने हमे बताया, “जब तक मैं यहां नहीं आई थी, तब तक मुझे नहीं पता था कि मुझे (जीवन में) और अधिक चाहने की भी अनुमति है।”
समावेशन एक क्रिया है
कार्यक्रमों के लिए परफेक्ट होना नहीं, बल्कि उत्तरदायी होना जरूरी है। फीडबैक लूप, पल्स चेक, और वास्तविक समय में किए गए सुधार किसी भी आकर्षक डेक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। असली प्रभाव तब दिखता है जब प्रतिभागी स्वयं आगे बढ़कर मेंटर, फैसिलिटेटर या एडवोकेट बन पाते हैं।
हम अपने 1200+ पूर्व छात्रों के साथ हर वर्ष पल्स चेक करते हैं, ताकि समझ सकें कि उनकी जरूरतें क्या हैं। हम उन्हें ओरिएंटेशन और ग्रेजुएशन सत्रों में आमंत्रित करते हैं और पैनलिस्ट या फैसिलिटेटर के रूप में वापस जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। हम उनसे यह भी उम्मीद करते हैं कि वे अपने साथियों का मार्गदर्शन करें, अपने अनुभव साझा करें और उनकी आवाजों को आगे ले जाने के लिए एक मंच तैयार करें।
हम जानते हैं कि सभी लोग हर समय सक्रिय रूप से उपलब्ध नहीं हो सकते हैं। लेकिन जब उनमें से किसी एक को भी मदद की जरूरत होती है (जैसे रिज्यूमे पर सुझाव, कार्यस्थल पर कोई कठिन बातचीत या बस धैर्यपूर्वक किसी की बात सुन लेना), तो हम हमेशा मौजूद होते हैं। और उससे भी बढ़कर, हमारे प्रतिभागी एक-दूसरे के लिए मौजूद होते हैं।
यह एक तरह से समावेशन का अभ्यास है। न कोई औपचारिक चेकलिस्ट, न सप्ताह भर चलने वाला अभियान। सिर्फ रोजाना की वह प्रतिबद्धता, जिसमें उन आवाजों को केंद्र में रखा जाता है जो अक्सर हाशिए पर रह जाती हैं।
निश्चित तौर पर हमसे गलतियां भी हुई हैं। हम अब भी सीख रहे हैं कि बड़े स्तर पर एलुमनाई एंगेजमेंट को कैसे प्रबंधित किया जा सकता है। हमारे पास कोई परफेक्ट मॉडल नहीं है और शायद कभी होगा भी नहीं। लेकिन हमारे पास एक दृढ़ संकल्प है। हमारे पास प्रतिभागियों को सुनने का, यथास्थिति बदलने का और लगातार जमीन पर बने रहने का इरादा है। जिन महिलाओं को जीवन भर सामाजिक प्रणालियों से बाहर रखा गया हो, उनके लिए निरंतरता मायने रखती है। इसलिए उनके पास बार-बार लौटकर आना, चाहे हमारे पास सभी जवाब न हों, एक ऐसे भरोसे की नींव डालता है जिससे बदलाव उत्पन्न हो सकता है।
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।
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लेखक के बारे में
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दीपांजलि लाहिड़ी एक प्रोजेक्ट और पीपल स्ट्रेटेजिस्ट हैं, जिनके पास आईटी, हॉस्पिटैलिटी, रिटेल और विकास सेक्टर में 19 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने बड़े पैमाने पर बिजनेस ट्रांसफार्मेशन का नेतृत्व किया है और वंचित समुदायों के लिए समानता, आत्मविश्वास और अवसर सुनिश्चित करने वाली प्रणालियां विकसित की हैं। दीपांजलि ऐसे सुरक्षित और सम्मानजनक परिवेश के निर्माण को लेकर प्रतिबद्ध हैं, जिनके माध्यम से मुख्यधारा से बाहर रहे लोग गरिमा के साथ आगे बढ़ सकें।
