Staging Environment
अधिकार

संवेदनशील विषयों पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को किस तरह के सहयोग की दरकार है?

संवेदनशील विषयों पर काम करने वाली संस्थाओं से जुड़े जमीनी कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत, पेशेवर और मानसिक स्तरों पर सहयोग और प्रशिक्षण की जरूरत होती है, इनकी पहचान और समाधान से जुड़े कुछ सुझाव।
18 दिसंबर 2025 को प्रकाशित

भारत में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा पर काम करने वाली संस्थाएं हर दिन उस कमी को भरने की कोशिश करती हैं जिसे व्यवस्था और सरकारें आमतौर पर देख ही नहीं पाती हैं। यह काम केवल सर्वाइवर्स को सहारा देने का नहीं होता बल्कि यह एक ऐसी प्रक्रिया में सहयोग देने का भी है जिसमें पुलिस, अस्पताल और अदालत के बीच तालमेल बनाए रखना पड़ता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में काम करने वाले जमीनी कार्यकर्ता, बहुत जल्दी भावनात्मक और मानसिक थकान का सामना करने लगते हैं। कई साथी बर्नआउट महसूस करते हैं, कुछ बहुत बार खुद को अकेला भी पाते हैं। इन कार्यकर्ताओं का काम बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उस कड़ी की तरह हैं जो न्याय देने वालों और न्याय मांगने वालों को आपस में जोड़ती है।

कानून और प्रक्रियाएं कागज पर तो साफ दिखती हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में इनका पालन सहज नहीं होता है। ऐसे में फील्ड वर्कर सिर्फ एक ‘नेविगेटर’ नहीं रहते बल्कि वे ऐसा साधन बन जाते हैं जो सिस्टम की जटिलताओं के बीच भी सर्वाइवर के लिए जगह बनाता है। वे सिर्फ आहत लोगों के टूटे हुए विश्वास को नहीं संभालते हैं बल्कि पुलिस, अस्पताल और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर प्रक्रिया को बेहतर बनाने की दिशा में भी काम करते हैं। यहीं पर उनका काम आवश्यक भी बन जाता है और चुनौतीपूर्ण भी।

दिशा फॉर विक्टिम संस्था के 15 से अधिक वर्षों के अनुभव में हमने देखा है कि टियर-2 और टियर-3 शहरों में संवेदनशील मामलों पर काम करना महानगरों में काम करने की तुलना में ज्यादा मुश्किल होता है। यहां संस्थाओं को तुलनात्मक रूप से ज्यादा सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही कई शहरों में प्रशिक्षित या डिग्रीधारी जमीनी कार्यकर्ता नहीं मिलते हैं। संस्थाओं के साथ काम करने वाले अधिकांश कार्यकर्ता अनुभवों से ही सीखते हैं। सीखने और सिखाने की इस पूरी प्रक्रिया में संस्थाओं को अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ कुछ खास पहलुओं पर काम करने की जरूरत होती है।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

विश्वास जुटाना सबसे मुश्किल काम

यौन हिंसा के मामलों में पहली विजिट हमेशा सबसे कठिन होती है। घर में मौजूद तनाव, पुलिस का दबाव, अस्पताल की प्रक्रियाएं और सामाजिक डर – ये सभी मिलकर स्थिति को उलझा देते है। ऐसे माहौल में जमीनी कार्यकर्ता केवल सहायता देने नहीं आते बल्कि इस भूमिका में आते हैं जिसमें उन्हें मानव सहज विश्वास की नींव दोबारा रखनी है।

हमने अपने काम के दौरान यह सीखा है कि यौन हिंसा के मामलों पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं में सही समय पर, सही संवाद, सही तरह से किए जाने की् समझ होना बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे – पहली मुलाकात में हम कभी घटना के बारे में नहीं पूछते हैं। कई बार परिवार खुद भी नहीं चाहता कि उन्हें पीड़ित कहा या समझा जाए। इस समय हमारी प्राथमिकता सिर्फ यह होती है कि सामने वाला महसूस कर सके कि हम उनके साथ हैं।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2021 के मुताबिक भारत में 77% महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज ही नहीं कराती हैं क्योंकि उन्हें यह भरोसा नहीं होता कि कोई उनकी बात सुनेगा या उन पर यकीन करेगा। इस अविश्वास को बदलना, कई बार केस का एकदम शुरूआती और सबसे लंबा काम बन जाता है। एक मामले में, 14 साल की एक बच्ची दो हफ्तों तक किसी से भी बात नहीं कर पाई। उस समय पुलिस मेडिकल जांच के लिए दबाव डाल रही थी और परिवार चाहता था कि जमीनी कार्यकर्ता उसी दिन बयान दिलवा दे। लेकिन कार्यकर्ता समझ रहे थे कि यह चुप्पी किसी इनकार की नहीं बल्कि गहरे सदमे (ट्रॉमा) की निशानी है। चौथी विजिट पर बच्ची ने सिर्फ एक वाक्य कहा – “मुझे डर लगता है।”  व्यवस्था के लिहाज से देखें तो यह सिर्फ एक वाक्य था लेकिन फील्ड वर्कर के लिए एक शुरुआत थी। इसी एक अंतर से समझा जा सकता है कि कुछ जगहों पर न्याय और संवेदना की गति हमेशा एक जैसी नहीं हो सकती है।

न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं को समझना

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में होने वाले यौन अपराधों के 90% से अधिक मामलों में आरोपी वही होता है जिसे सर्वाइवर पहले से जान रही होती है। इसका मतलब है कि केस सिर्फ अपराध का नहीं होता है बल्कि यह परिवार, जाति, समुदाय, पड़ोस और रिश्तों का भी मामला बन जाता है। ऐसे में पुलिस का रुख कई बार संवेदनशीलता की बजाय इससे तय होता है कि केस को जल्दी निपटाने के लिए कितना दबाव उस पर आ रहा है। हमारे सामने लगभग हर मामले में यह चुनौती आती है कि हम तुरंत सर्वाइवर से बयान दिलवा दें। लेकिन सदमे में जा चुके किसी इंसान से तुरंत बात करने की अपेक्षा करना या इसके लिए दबाव बनाना, उसे दूसरा झटका देने जैसा होगा। हमें पुलिस को भी कुछ समय इंतजार करने के लिए मनाना पड़ता है लेकिन इतना भी नहीं कि उनका काम रुक जाए।”

जमीनी कार्यकर्ता के लिए यह स्थिति इसलिए भी मुश्किल होती है क्योंकि उनके पास मानसिक आघात (ट्रॉमा) की पहचान या इलाज के लिए कोई आधिकारिक डिग्री नहीं होती है। इसके अलावा वे न तो पुलिस अधिकारी होते हैं, न वकील, न काउंसलर लेकिन उन्हें हर किसी के साथ तालमेल बैठाना पड़ता है। कई बार उन्हें पुलिस को कानून की याद भी दिलानी पड़ती है। उदाहरण के लिए, पॉक्सो एक्ट की धारा-19 के तहत शिकायत किसी भी व्यक्ति द्वारा दर्ज की जा सकती है, सिर्फ माता-पिता द्वारा नहीं।

एक सभागार एवं मंच में वर्दीधारी लोग_जमीनी कार्यकर्ता
संवेदनशील मामलों में “जमीनी समझ” और “कानूनी ज्ञान” के बीच संतुलन बनाना पड़ता है और यह संतुलन साधना ही फील्ड वर्कर के काम को और जटिल बना देता है। | चित्र साभार: दिशा फॉर विक्टम

इसी तरह, मेडिकल सिस्टम की अपनी चुनौतियां हैं। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में टू-फिंगर टेस्ट को प्रतिबंधित कर दिया था लेकिन जमीनी स्तर पर यह प्रथा आज भी कई अस्पतालों में देखी जाती है। ऐसे मामलों में जमीनी कार्यकर्ता डॉक्टरों से टकराव नहीं करते बल्कि उन्हें यह समझाते हैं कि यह प्रक्रिया सर्वाइवर को और अधिक आहत कर सकती है।

ऐसी जगहों पर “जमीनी समझ” और “कानूनी ज्ञान” के बीच संतुलन बनाना पड़ता है और यह संतुलन साधना ही फील्ड वर्कर के काम को और जटिल बना देता है। इसके लिए जरूरी है कि संस्थाएं सप्ताह या माह में एक बार कानूनी विषयों पर चर्चा का आयोजन करें। जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए कानून की समझ विकसित करना बहुत जरूरी है। तय कानूनों में भी संशोधन होते रहते हैं, कई बार सरकार की ओर से नई जानकारी या योजनाएं भी लागू की जाती हैं। इनकी सही जानकारी होना, प्रक्रिया पता होना और ​अधिकारों के बारे में समझ, जमीनी कार्यकर्ताओं का कानूनी प्रक्रिया में सहयोग काम को आसान बनाती हैं।

समाज का असहयोगात्मक व्यवहार झेलना

कई केस ऐसे होते हैं जहां अपराध और पीड़िता का ट्रॉमा तो एक पहलू होता ही है, लेकिन उससे भी बड़ा पहलू होता है उसकी जाति, धर्म या विकलांगता से जुड़ी पहचान। कई परिवार अपनी जाति या समुदाय की वजह से बात ही नहीं करते है। कई कहते हैं कि ‘हमारे समाज में यह बात बाहर नहीं जाती है।’ विकलांग बच्चों के मामलों में भाषा ही सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। कई बार कौन से संकेत दर्द हैं और कौन से डर, यह समझने में ही कई हफ्ते लग जाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा 2019 में जारी की गई एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में दिव्यांग महिलाओं के लिए यौन हिंसा का जोखिम दोगुना होता है। यह जोखिम सिर्फ अपराध का नहीं, बल्कि ‘न सुने जाने’ का भी है। इन मामलों में फील्ड वर्कर की भूमिका कई गुना बढ़ जाती है। कई मामलों में सर्वाइवर मूक-बधिर होते हैं तो कइयों में वे देख नहीं सकते हैं। अब चुनौती यह है कि उनसे सांकेतिक भाषा में बात कैसे की जाए। ऐसे में बहुत जरूरी हो जाता है कि संस्था के पास ऐसा कोई विशेषज्ञ जरूर हो जो विकलांग सर्वाइवर से सांकेतिक भाषा में बात कर पाए।

अनुभव से प्रशिक्षण तक का सफर

टियर-2 और टियर-3 शहरों में फॉरेंसिक इंटरव्यूअर, ट्रॉमा काउंसलर या विशेष कानूनी विशेषज्ञ लगभग न के बराबर हैं। ऐसे में जमीनी कार्यकर्ता धीरे-धीरे ‘एक्सपर्ट बाय एक्सपीरियंस’ बन जाते हैं। वे सीख जाते हैं कि बच्चे का मौन कब ट्रॉमा का संकेत है, कौन सा पुलिस अधिकारी मामले को हल्के में ले रहा है, किस अस्पताल में कौन सी प्रक्रिया सर्वाइवर को नुकसान पहुंचा सकती है और किस कोर्ट रूम में किन सवालों से बचना जरूरी है। लेकिन यह सीखने की एक धीमी और लंबी प्रक्रिया होती है।

पुलिस केस की फाइल फोटो_जमीनी कार्यकर्ता
कानून और प्रक्रियाएं कागज पर तो साफ दिखती हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में इनका पालन सहज नहीं होता है। | चित्र साभार: अनस्प्लैश

हमने देखा है कि कार्यकर्ता जोश के साथ काम करने आते हैं लेकिन संवेदनशील मामलों पर काम करने के लिए जरूरी धैर्य और सीखने की लंबी प्रक्रिया देखकर वे जल्दी ही लौट भी जाते हैं। जमीनी स्तर पर संस्थाओं को इस दिक्कत का सामना करना ही पड़ता है। ऐसे कार्यकर्ताओं का प्रतिशत बहुत कम होता है जो लंबे समय तक संस्था के साथ बने रहे और सीखें।

इस चुनौती को कम करने के लिए संस्था को अपने स्तर पर कुछ प्रयास करते रहने की जरूरत होती है: 

  •  साल दर साल हिंसा की कहानियां सुनना आसान नहीं होता है। इसलिए दिशा में हम साल में कम से कम दो बार मेंटल हेल्थ सेशन करवाते हैं। हमारे जैसी संस्थाओं को चाहिए कि वे अपने जमीनी कार्यकर्ता के मानसिक स्वास्थ्य का खास ख्याल रखें। कई अध्ययन बताते हैं कि ट्रॉमा-फोकस्ड वर्कर्स में बर्नआउट और अवसाद का खतरा 40% तक बढ़ जाता है। लेकिन भारत में अभी तक इस दिशा में चर्चा भी शुरू नहीं हुई है।
  • सुपरविजन, केस-डिब्रीफ, काउंसिलिंग और छुट्टियां ये सब हमारे कार्यक्षेत्र में अभी भी ‘कमजोरी’ माने जाते हैं जबकि ये इस काम की सबसे बुनियादी जरूरतें हैं। संस्थाओं को अपने यहां ऐसे सिस्टम बनाए रखने की जरूरत है, जहां जमीनी कार्यकर्ता खुलकर अपनी बात रख सकें और खुद पर काम करने के लिए बेझिझक समय मांग सकें।
  • संवेदनशील मामलों में धैर्य के साथ कानूनी समझ बनाए रखना भी जरूरी है। इसलिए साल में एक या दो बार किसी विषय विशेषज्ञ को बुलाकर कानून संबंधी कार्यशालाओं का आयोजन किया जा सकता है।
  • हमारा अनुभव रहा है कि पुलिस और वकीलों के साथ सहयोगात्मक रिश्ते बनाने बहुत जरूरी है। इसलिए अगर मासिक या त्रैमासिक स्तर पर उनके साथ बैठकों का आयोजन किया जा सके तो इससे जमीनी कार्यकर्ताओं की कैपेसिटी बिल्डिंग में बहुत मदद मिलेगी। साथ ही, कानूनी प्रक्रिया को समझने और अधिकारियों के साथ काम करने में सहूलियत होगी।
  • इन सबके बीच जमीनी कार्यकर्ताओं की आपस में सहयोगात्मक कार्यप्रणाली भी काम की प्रक्रिया को आसान बनाने में मददगार होती है। एक मामले पर एक से ज्यादा कार्यकर्ताओं का काम करना, मामले की टीम के बीच में सामूहिक रूप से चर्चा होना कार्यकर्ताओं को पक्षपाती होने से बचाती है। जो कि इस काम में सबसे जरूरी पहलू है। बाल हिंसा के कई मामलों में पीड़ित और आरोपी दोनों ही नाबालिग होते हैं, ऐसे में दोनों के प्रति संवेदनशील नजरिए की जरूरत होती है लेकिन कई बार हालात ऐसा करने से रोकते भी हैं। ऐसे मामलों में चर्चा करना और साथ काम करना काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

अधिक जानें

  • पढ़ें, घरेलू हिंसा के खिलाफ लड़ रही एक आदिवासी महिला के जीवन का दिन।
  • जानिए, महिला सशक्तिकरण की सबसे बड़ी बाधा बनने वाला पितृसत्तात्मक समझौता क्या है?
  • जानिए, लड़कों के खिलाफ यौन हिंसा पर क्यों नहीं होती खुलकर बात।

लेखक के बारे में