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स्वास्थ्य और पोषण

तमिलनाडु के उदाहरण से समझिए मातृ मानसिक स्वास्थ्य पर संवाद की जरूरत क्यों है? 

तमिलनाडु में बढ़ती गर्मी और प्रदूषण का नई माताओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है, लेकिन इससे जुड़े नीतिगत हस्तक्षेपों के प्रयास अभी नजर नहीं आते हैं।
19 नवंबर 2025 को प्रकाशित

पार्वती* एकडेढ़ साल के बच्चे की मां हैं। वह कहती हैं कि “मेरा घर किसी ऐसी भट्टी जैसा लगता है जिसे मैं बुझा नहीं सकती।” वह चेन्नई के औद्योगिक इलाके में रहती हैं। टिन की चादर वाली छत के नीचे उनके घर में आधी रात के बाद भी दिन भर की गर्मी बनी रहती है। आमतौर पर जिन घरों में हवा का प्रवाह कम हो, प्रदूषण अधिक हो या ठंडक न हो, वहां रहने वाली माताओं में अवसाद, तनाव और चिंता जैसी समस्याओं के बढ़ने की संभावना अधिक होती है। इसका सीधा असर उनके शिशुओं की देखभाल पर पड़ता है।

अत्यधिक गर्म माहौल में रहने से गर्भवती महिलाओं में जटिलताओं का जोखिम बढ़ जाता है: जैसे बच्चे के मृत पैदा होने का खतरा लगभग 1.13 गुना अधिक, जन्मजात विकृतियां 1.48 गुना अधिक और हीटवेव के दौरान गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं 1.25 गुना तक बढ़ सकती हैं। वहीं मानसिक स्वास्थ्य पर भी गर्मी का असर साफ दिखता है: देश भर में किए गए कई अध्ययनों में पाया गया है कि तापमान बढ़ने के साथ बुजुर्गों में अवसाद और मानसिक तनाव के मामले बढ़े हैं। ताइवान में, तापमान में सिर्फ 1°C की वृद्धि से अवसाद के गंभीर मामलों में सात फीसदी तक बढ़त देखी गई है। 

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में समय से पहले जन्मे शिशुओं की मृत्यु से जुड़े 91 प्रतिशत मामले प्रदूषण से संबंधित होते हैं। वहीं उन परिवारों में, खासकर जो हवादार घरों में नहीं रहते हैं, अक्सर त्वचा संबंधी समस्याओं (हीटरैश) और श्वास संबंधी रोगों की शिकायत आम होती है। 

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

ये रुझान राष्ट्रीय स्तर पर हुए उन अध्ययनों से मेल खाते हैं, जिनमें पाया गया है कि निरंतर वायु प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक कुप्रभाव छोड़ता है। भारत में हर पांच में से एक महिला प्रसव के बाद होने वाले अवसाद यानी पोस्टपार्टम डिप्रेशन (22%) से गुजरती है। तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में यह आंकड़ा बढ़कर हर चार में से एक (26%) महिला में पाया जाता है। इसके बावजूद, ज्यादातर महिलाओं को जरूरी देखभाल या कोई औपचारिक सहायता नहीं मिल पाती है। जिन माताओं के बच्चे विकलांग होते हैं, उनके लिए स्थिति और मुश्किल होती है। सेवाओं की कमी, सामाजिक रूढ़ियां और भावनात्मक अकेलापन जैसे कई पहलू देखभाल से होने वाली शारीरिक थकान को और बढ़ा देते हैं। 

साल 2024-25 में, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में किए गए अपने एक शोध के तहत, मैंने तमिलनाडु के सभी 38 जिलों में 391 माताओं के साथ एक सर्वे किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि जलवायु संकट उनके मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है। इसके अलावा, मैंने इनमें से छह माताओं के साथ लंबे और गहन साक्षात्कार भी किए। इनका उद्देश्य बढ़ती हीटवेव और वायु प्रदूषण के बीच बच्चों की देखरेख से जुड़ी उनकी जिम्मेदारियों, आर्थिक दबाव और मानसिक बोझ के अनुभवों को बेहतर तरीके से समझना था। 

तमिलनाडु में बढ़ता जलवायु संकट 

तमिलनाडु देश के सबसे तेजी से गर्म होते राज्यों में शामिल है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन दशकों में यहां का सालाना अधिकतम तापमान हर साल 0.02-0.04°C तक बढ़ा है। हालिया सालों में, कई जिलों में गर्मियों में तापमान 42°C के पार भी गया है। चेन्नई में, अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव के कारण शहर का तापमान हरियाली वाले इलाकों की तुलना में +3-4°C अधिक रहता है। इससे मौजूदा तनाव बढ़ता है, भीतरी इलाकों में सूखा लंबे समय तक बना रहता है और तटीय इलाकों में उमस बढ़ जाती है। 

भीड़ में महिलाये अपने बच्चों के साथ_मातृ मानसिक स्वास्थ्य
महिलाएं ठंडक के लिए जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करने के पारंपरिक तरीकों को दोबारा अपना रही हैं। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

लता* चेन्नई के बाहरी इलाके में एक ईंट भट्ठे के पास रहती हैं और एक साल के बच्चे की मां हैं। वे कहती हैं कि “यह हवा किसी धीमे जहर जैसी है। इसमें बच्चे के लिए सांस लेना तक भारी हो जाता है। जब वह सोता है तो मैं उसकी नाक ढक देती हूं। लेकिन मैं हवा को कब तक ढंक सकती हूं? उसे इस हवा में सांस लेने से कैसे रोकूं?” 

प्रदूषण और बढ़ती गर्मी का असर केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, माताओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर हुए शोध लगातार बताते हैं कि अत्यधिक गर्मी का प्रभाव माताओं के खराब मानसिक स्वास्थ्य के रूप में भी देखने को मिलता है, जिसमें पोस्टपार्टम डिप्रेशन भी शामिल है। हमारे अध्ययन में न्यूरोटिपिकल बच्चों की माताओं के साथ-साथ विकलांग बच्चों की माताओं को भी शामिल किया गया था। इनमें से 65 प्रतिशत माताओं में हल्के से मध्यम स्तर के अवसाद के लक्षण दिखाई दिए। वहीं, विकलांग बच्चों की माताओं में इसकी दर और गंभीरता दोनों अधिक थीं। सामाजिक रूढ़ियां, बढ़ी हुई देखभाल की जरूरतें और सीमित सामाजिक समर्थन उनके मानसिक बोझ को और बढ़ा देते हैं। 

इन अधिकांश मामलों में पिता की भूमिका समान जिम्मेदारी संभालने से ज्यादा केवल आर्थिक सहारा देने तक ही सीमित रहती है। लेकिन आमतौर पर उनकी आय के बावजूद, परिवार लगातार आर्थिक दबाव का सामना करते हैं। जैसा कि एक मां ने बताया, “मेरे पति की फैक्ट्री वाली नौकरी से मुश्किल से ही हमारा गुजारा चल पाता है।” 

जलवायु संकट और सीमित संसाधनों के चलते माताएं अक्सर घर में ही समाधान खोजने का प्रयास करती हैं। जब अनौपचारिक बस्तियों में बिजली जाती है तो वे व्हाट्सएप के जरिए संपर्क बनाए रखती हैं। इसके माध्यम से वे सरकारी योजनाओं की जानकारी, पानी के टैंकर की उपलब्धता और ठंडक के उपाय जैसी जानकारियां भी आपस में साझा करती हैं। ग्रामीण मदुरै में महिलाएं ठंडक के लिए जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करने के पारंपरिक तरीकों को दोबारा अपना रही हैं। इसका एक उदाहरण सूती कपड़े को नीम और हल्दी के पानी में भिगोकर लगाना है, ताकि गर्मी से होने वाले बुखार जैसी परेशानियों को कम किया जा सके। इस तरह के उपाय किफायती और स्थानीय संस्कृति में स्वाभाविक रूप से रचे-बसे होने के साथ-साथ न्यूनतम संसाधनों के सहारे आसानी से बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकते हैं।। 

लेकिन इतना काफी नहीं है। 

तमिलनाडु के पास नीतिगत ढांचा मौजूद है, लेकिन घरेलू स्तर पर नवजात बच्चों की माताओं की देखभाल से संबंधित प्रयासों की कमी है। ऐसी परिस्थिति से जुड़े कुछ उपाय हैं: 

1. उच्च जोखिम वाले घरों को ठंडा रखने की तकनीकों पर सब्सिडी 

तमिलनाडु तात्कालिक कदम के तौर पर माताओं की देखभाल को केंद्र में रखते हुए कूलिंग सब्सिडी दे सकता है। ठंडक बच्चों को सोने में मदद करती है, स्तनपान को आसान बनाती है और गर्मी से जुड़ी मानसिक तकलीफ को कम करती है। 

तमिलनाडु की हीट मिटिगेशन स्ट्रेटेजी (2024) पहले ही वंचित समुदायों के लोगों को रिफ्लेक्टिव छतों और ठंडी सतहों के निर्माण के लिए सहयोग देती है। इस रणनीति में नई माताओं की देखभाल के उद्देश्य को शामिल करना और उनके घरों तक पहुंचाने के लिए इसे बढ़ाना, स्वास्थ्य के लिहाज से तेजी से बेहतर परिणाम दे सकता है। 

रिफ्लेक्टिव छतों वाली चादरें (जिन पर सफेद या हल्के रंग की कोटिंग होती है) जैसे उपाय घर के भीतर का तापमान 2–5°C तक कम कर सकते हैं। इनके प्रयोग से गर्मी के कारण बच्चों की नींद में आने वाली बाधा लगभग 30 प्रतिशत तक घट सकती है। इसके अलावा, माताएं मिट्टी के बने कूलर और मिट्टी के ही बर्तनों से बनाए गए ठंडक समाधानों (ज़ीर पॉट फ्रिज) का इस्तेमाल करती हैं जो ग्रामीण बाजारों में आसानी से उपलब्ध हैं। ये बिजली के बगैर, पानी और खाने-पीने की चीजों का तापमान कम रखते हैं और बिजली कटने पर स्टोर किए गए मां के दूध को सुरक्षित भी रखते हैं। लेकिन इन सरल उपायों को राज्य स्तर पर समर्थन देने वाली कोई व्यवस्था मौजूद नहीं हैं। कम संसाधन वाले क्षेत्रों में नई माताओं को इस तरह की चीजें उपलब्ध करवाना उनके लिए गर्मी से निपटने में मददगार हो सकता है। 

2. आशा कार्यकर्ताओं को जलवायु संबंधी देखभाल और मातृ मानसिक स्वास्थ्य पर प्रशिक्षण देना

आशा कार्यकर्ता ग्रामीण इलाकों और शहरी अनौपचारिक बस्तियों में माताओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं से संपर्क का पहला बिंदु होती हैं। लेकिन उनके प्रशिक्षण माॉड्यूल में जलवायु से जुड़े देखभाल जोखिम की जानकारी शामिल नहीं होती है।

आशा कार्यकर्ताओं को पोस्टपार्टम डिप्रेशन और गर्मी से जुड़े तनाव के लक्षण पहचानने का भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

जलवायु से होने वाली चुनौतियां रोजमर्रा की हकीकत बनती जा रही हैं चूंकि आशा कार्यकर्ता पहले से कामकाज का भारी बोझ झेल रही हैं, इसलिए इसे उनके लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं बनाना चाहिए। इसके बजाय, जैसे-जैसे जलवायु से होने वाली चुनौतियां रोजमर्रा की हकीकत बनती जा रही हैं, वैसे-वैसे उनके प्रशिक्षण में गर्मी से होने वाली बीमारियों की पहचान, सुरक्षित हाइड्रेशन के तरीके, घरों के भीतर हवा की गुणवत्ता सुधारने के प्रयास (जैसे गीले कपड़े से धूल को रोकना) और गर्मियों में आपातकालीन स्तनपान जैसी जानकारियां शामिल की जानी चाहिए। आशा कार्यकर्ताओं को पोस्टपार्टम डिप्रेशन और गर्मी से जुड़े तनाव के लक्षण पहचानने का भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इसके लिए एडिनबरा पोस्टनेटल डिप्रेशन स्केल (ईपीडीएस) जैसे छोटे और मान्य उपकरण को तमिल में उपलब्ध करवाया जा सकता हैं। 

3. माताओं के साथ मिलकर स्थानीय हीट अलर्ट और अनुकूलन प्रणाली तैयार करें 

देश भर में, राज्य सरकारें गर्मियों में बढ़ते तापमान से निपटने के लिए अपने हीट एक्शन प्लान पर काम कर रही हैं। अहमदाबाद में इसकी शुरूआत हुई और अब इसे ओडिशा और तेलंगाना में भी अपनाया जा चुका है। इन योजनाओं में पूर्व चेतावनी सिस्टम, स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण और हाइड्रेशन व गर्मी से बचाव पर सार्वजनिक सुझाव दिया जाना शामिल है। तमिलनाडु का राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण पहले ही हीट अलर्ट जारी करता है। इस व्यवस्था को आगे बढ़ाकर संदेशों को साधारण और लागू किए जा सकने योग्य निर्देशों में बदलकर उन घरों तक पहुंचाया जा सकता है, जो अधिक जोखिम का सामना कर रहे हैं। 

चूंकि माताएं पहले से ही व्हाट्सएप का इस्तेमाल करती हैं, इसलिए जिला स्तर पर आशा कार्यकर्ताओं द्वारा संचालित व्हाट्सएप समूह मददगार हो सकते हैं। इन पर माताओं को समय पर आसानी से समझ आने वाले अपडेट दिए जाने चाहिए। जैसे, “सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक धूप से बचें”, “पानी के बर्तन छाया में रखें” या “छतों को गीले जूट के बोरे से ढकें।” कलंजियम समुगा वनोली जैसे सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के जरिए हीटवेव से जुड़ी देखभाल के टिप्स, हाइड्रेशन के संदेश और माताओं के मानसिक स्वास्थ्य के स्व-निरीक्षण जैसी जानकारियों को स्थानीय बोली-भाषा में प्रसारित किया जा सकता है। यह चैनल पहले से ही, खासकर ग्रामीण और तटीय इलाकों में, आपदा तैयारी और जलवायु चुनौतियों से निपटने की क्षमता पर जोर देता है। 

जैसे-जैसे तमिलनाडु में राष्ट्रीय औसत से अधिक गर्मी पड़ने लगी है और इसके शहरी व औद्योगिक क्षेत्र, गर्म और प्रदूषित होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे महिलाओं (खासकर कम आयवर्ग से आने वाली माताओं) पर देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता जा रहा है। 

*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदल दिए गए हैं। 

यह अध्ययन हार्वर्ड सेंटर फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट और मित्तल इंस्टीट्यूट के सहयोग से, हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर किया गया है। इसमें किसी प्रकार का हित का संघर्ष नहीं है। 

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें। 

अधिक जानें

  • जानिए कि कैसे आशा कार्यकर्ता मातृ मानसिक स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को पहचान सकती हैं।
  • जानिए, क्यों अगली पीढ़ी के लिए कठिन वर्तमान और अनिश्चित भविष्य की वजह बनता जलवायु संकट।
  • जानिए, क्यों जलवायु परिवर्तन से महिलाओं पर बढ़ रहा दबाव।

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