सोशल सेक्टर कॉन्फ्रेंस: समान मंच की असमान सच्चाई
“मैं अपने गांव से दिल्ली तक सिर्फ इस कॉन्फ्रेंस के लिए आया हूं। हमारी संस्था बहुत छोटी है और फंडिंग भी सीमित है। उन्होंने जैसे-तैसे मुझे यहां भेजा है। सोचा था कि यहां शायद ऐसे लोग मिलेंगे, जो हमारे काम को समझेंगे और उसमें सहयोग दे सकेंगे। लेकिन सत्रों के बीच किसी से बात करने का समय ही नहीं मिलता। और जब थोड़ा समय मिलता है, तब तक सब लोग अपने-अपने झुंड में होते हैं। ऐसा लगता है जैसे यहां सब एक-दूसरे को पहले से जानते हों। ऐसे में मैं उनके पास जाकर बात शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। मुझे अंग्रेजी भी ठीक से नहीं आती, और यहां लगभग सारी बातचीत अंग्रेजी में ही हो रही है। मन में बार-बार यही सवाल उठता है कि क्या कोई मुझे समझ पाएगा? क्या कोई मेरी बात सुनने में दिलचस्पी भी लेगा? मैं बहुत परेशान हूं। जब लौटूंगा, तो अपने साथियों को क्या बताऊंगा?”
यह बातचीत अगस्त 2025 में दिल्ली में आयोजित एक नामी विकास सेक्टर कॉन्फ्रेंस के दौरान, उन्नयन और एक जमीनी स्तर की गैर-लाभकारी संस्था के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर के बीच हुई थी।
यह वाकया कोई अपवाद नहीं है। विकास सेक्टर में हर साल फिलन्थ्रॉपी, शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, जल और स्वच्छता, जलवायु परिवर्तन, कृषि, महिलाओं और बच्चों के अधिकार, विकलांगता और नागरिक सहभागिता जैसे विषयों पर अनगिनत सम्मेलन आयोजित होते हैं। इन कार्यक्रमों में लगभग हर उस मुद्दे पर चर्चा होती है, जिस पर सेक्टर में काम होता है। लेकिन फिर भी इन मंचों तक पहुंच और सार्थक भागीदारी सभी के लिए समान नहीं होती है।
सैद्धांतिक रूप से ऐसे कार्यक्रम सीखने और आत्ममंथन के लिए आयोजित किए जाते हैं, ताकि लोग आपस में जुड़ें और अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आने वाले अनेक पेशेवरों को सार्थक सहयोग मिल सके। आमतौर पर लोग ऐसे आयोजनों में हिस्सा लेने के लिए एक लंबी दूरी तय करते हैं। लेकिन व्यावहारिक रूप से ये मंच अपने ही घोषित उद्देश्यों पर खरे नहीं उतरते हैं।
पैनलों पर आम तौर पर फंडरों और बड़ी गैर-लाभकारी संस्थाओं का वर्चस्व होता है। सत्र सामूहिक सीख के बजाय संगठनों की उपलब्धियां गिनाने में ज्यादा मशगूल रहते हैं। नेटवर्किंग को दस-दस मिनट के छोटे ब्रेक में समेट दिया जाता है, और लगभग सारी बातचीत अंग्रेजी में ही होती है।
इसका नतीजा क्या होता है? एक गहरी खाई। इस खाई के एक ओर वे मूल्य नजर आते हैं, जिनकी बात करते सेक्टर थकता नहीं है। समावेशन, समानता और प्रतिनिधित्व। वहीं दूसरे ओर वह तस्वीर होती है, जो इन आयोजनों की सच्चाई को बयान करती है।
किसकी ओर से कौन बोलेगा, किसे सचमुच भागीदारी का अवसर मिलेगा, कौन सहज और सम्मानित महसूस करेगा, किसे विशेषज्ञ माना जाएगा, किसे कितनी जगह दी जाएगी—ये सब तय होता है व्यक्ति की भाषा से, उसके शहर और कस्बे से, उसके पद से जुड़ी ताकत से, और उन नेटवर्कों से जिनका वह पहले से हिस्सा है।
कागज पर भले ही सभी एक ही स्थल में उपस्थित हों, लेकिन वहां सबकी मौजूदगी एक जैसी नहीं होती।
समावेशन और बहिष्करण कोई सीधी-सपाट लकीर नहीं है। ये धीरे-धीरे, कई स्तरों पर काम करते हैं: कौन कितना दिखाई देता है, किसे भीतर तक पहुंच मिलती है, और किसकी बात को अधिकार के साथ सुना जाता है। सैद्धांतिक रूप से कॉन्फ्रेंस को ऐसी जगह माना जाता है जहां अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आए लोग साथ जुटते हैं, बराबर मंच साझा करते हैं, और ऐसे संवाद कर पाते हैं जो अन्यथा संभव नहीं होते।
लेकिन हकीकत इससे काफी अलग है। ये मंच आदर्श नहीं होते। सामाजिक व्यवस्था की ऊंच-नीच को चुनौती देने के बजाय, कॉन्फ्रेंस आयोजन अक्सर उन्हें उभारने का काम करते हैं। ऐसे कई आयोजनों में कुछ दृश्य आम होते हैं: कौन बोल रहा है, कौन चुपचाप सुन रहा है, कौन आराम से घुल-मिल रहा है, और कौन कोनों में सिमटा हुआ है। ये सभी दृश्य असमानता के स्पष्ट संकेत होते हैं। इस गैर-बराबर भागीदारी की जड़ें असमान सामाजिक पूंजी से पोषित होती हैं। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति कहां से आता है, उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि क्या है, उसका संगठन कितना जाना-पहचाना है, उसके पद से उसे कितना अधिकार मिलता है, और सबसे अहम, वह कौन-सी भाषा बोलता है।
कागज पर भले ही सभी एक ही स्थल में उपस्थित हों, लेकिन वहां सबकी मौजूदगी एक जैसी नहीं होती। कोई पूरे आत्मविश्वास और वैधता के साथ कमरे में दाखिल होता है, तो कोई यह सोचते हुए कि उसकी बात को शायद गंभीरता से लिया ही न जाए। ऐसे में ‘बराबरी का मंच’ कहलाए जाने वाले ज्यादातर आयोजन ऐसे मंच की शक्ल ले लेते हैं, जहां पूंजी, भाषा, पता, जाति और वर्ग से जुड़ी धारणाओं को तोड़ने या उन पर सवाल उठाने के बजाय उन्हें मजबूती मिलती है।
ये बहिष्करण आखिर किन-किन तरीकों से सामने आते हैं? इन्हें थोड़ा और करीब से समझते हैं:
1. बोलने का अधिकार किसके पास है?
मान लीजिए कि एक कॉन्फ्रेंस में पैनल है, जिसमें महिला किसानों को पहचान न मिलने के विषय पर बात की जा रही है। इस पैनल में अगर सभी वक्ता पुरुष हैं, तो यह मात्र खराब क्यूरेशन का मसला नहीं है। यह वहां मौजूद महिला किसानों को सक्रिय रूप से अलग-थलग करता है और एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है—क्या उन्हें अपनी बात खुद रखने के काबिल नहीं समझा गया? इसी तरह, एक पुरुष किसान को मंच पर भेजकर यह कहा जाता है कि वह किसी गैर-लाभकारी संस्था के तकनीकी हस्तक्षेप से अपनी फसल की पैदावार बढ़ने की कहानी सुनाए। ऐसी परिस्थिति में उसके दशकों के खेती के अनुभव को विशेषज्ञता न मानकर सिर्फ एक किस्से के तौर पर देखा जाता है, जिससे संगठन की छवि मजबूत होती है। ये काल्पनिक उदाहरण नहीं हैं। ये दो वास्तविक घटनाएं हैं, जिन्हें हमने दो अलग-अलग कॉन्फ्रेंस आयोजनों में देखा है।
जब कॉन्फ्रेंस बार-बार एक ही तरह के ‘विशेषज्ञों’ को केंद्र में रखती हैं (अंग्रेजी बोलने वाले, अभिजात पृष्ठभूमि से आने वाले, सवर्ण जातियों और उच्च-वर्गों से जुड़े लोग), जो ‘हाशिए पर रहने वाले समुदायों को सशक्त बनाने’ वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाते और उन्हें लागू करते हैं, तो यह एक स्पष्ट संकेत होता है कि किसका ज्ञान वैध माना जाता है और किसका नहीं।
ये फैसले संयोगवश नहीं होते हैं। संगठनों के भीतर, कॉन्फ्रेंस में भेजे जाने के लिए प्रायः वाक्पटु लोगों को चुना जाता है, जो चमक-दमक के माहौल में सहज महसूस करते हैं—जैसे मैनेजर या कोऑर्डिनेटर। इसके उलट, जमीनी स्तर पर काम करने वाले फ्रंटलाइन कर्मी और समुदाय के लोग ऐसे आयोजनों से लगभग हमेशा गायब रहते हैं। फील्ड में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा भी अक्सर ऐसे वक्ताओं के नेतृत्व में होती है, जिनका रोजमर्रा के काम से सीमित जुड़ाव होता है। यह अंतर तब और भी खुलकर सामने आता है, जब किसी पैनल पर सरकारी अधिकारियों को तो तुरंत मंच दे दिया जाता है, लेकिन अन्य वक्ताओं को पीछे कर दिया जाता है।
इस तरह का भेदभाव प्रतिभागियों को दो खांचों में बांट देता है—एक वे, जो सिखाने आए हैं, और दूसरे वे, जिनसे सिर्फ सीखने की अपेक्षा की जाती है। जब समुदाय के सदस्यों को मंच पर बुलाकर उनसे उन्हीं की बोली-भाषा में बस इतना कहलवाया जाता है कि किसी हस्तक्षेप से उनकी जिंदगी कैसे बदली, और उसके बाद चर्चा फिर अंग्रेजी में आगे बढ़ जाती है, तो उनकी भूमिका की सीमा साफ हो जाती हैं। उन्हें ज्ञान के सह-निर्माता के रूप में नहीं, बल्कि ‘इम्पैक्ट’ के ‘एविडेंस’ के रूप में पेश किया जाता है। सहभागी बनने के बजाय वे अध्ययन के विषय बनकर रह जाते हैं। इसलिए कहना गलत नहीं होगा कि उनकी मौजूदगी का इस्तेमाल कार्यक्रम को वैध ठहराने के लिए होता है, न कि उसे नए सिरे से गढ़ने के लिए।
2. किसे किस तरह की भागीदारी मिलती है?
कई बार लोगों को औपचारिक रूप से कॉन्फ्रेंस में शामिल तो कर लिया जाता है, लेकिन उसके ढांचे से यह तय होता है कि कौन उसमें सार्थक रूप से भाग ले पाएगा और कौन सिर्फ मौजूद रहेगा।
भाषा: अंग्रेजी का वर्चस्व केवल संवाद में रुकावट नहीं बनता, बल्कि प्रतिष्ठा और अधिकार का प्रतीक भी बन जाता है। हाल के वर्षों में भले ही कॉन्फ्रेंस आयोजनों में सामुदायिक संगठनों के प्रतिनिधियों को बुलाया जाने लगा हो, लेकिन कई प्रतिभागियों ने हमें बताया कि ऐसे मंचों पर वे घबराहट और दबाव महसूस करते हैं। उन्हें डर रहता है कि वे चर्चाओं को पूरी तरह समझ नहीं पाएंगे, या अंग्रेजी में धाराप्रवाह जवाब नहीं दे पाएंगे। इसका असर यह होता है कि उनमें ग्लानि, झिझक और असुरक्षा की भावना पैदा होती है। वे अपने ही ज्ञान की वैधता पर सवाल करने लगते हैं, जबकि जमीनी यथार्थ के सबसे करीब वही होते हैं।
जगह और लागत: अधिकांश कॉन्फ्रेंस महानगरों में आयोजित होती हैं, जिससे जमीनी स्तर के कई संगठनों के लिए उनमें शामिल होना आर्थिक रूप से संभव नहीं हो पाता। खासकर तब, जब वे समुदाय के लोगों को अपने साथ लाना चाहें। उनके आने-जाने और ठहरने का खर्च भले ही कभी-कभार वहन कर लिया जाए, लेकिन कई ‘छुपी’ लागतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है—जैसे देखभाल की जिम्मेदारियां, भाषा से जुड़ा सहयोग, और अपरिचित शहरी परिवेश को समझने की शारीरिक और मानसिक कीमत।
समय: कॉन्फ्रेंस में समय का बंटवारा भी यह तय करता है कि किसकी आवाज और बात सुनी जाएगी। जाने-पहचाने वक्ताओं को अक्सर अपने काम का लंबा-चौड़ा बखान करने के लिए तय समय से ज्यादा बोलने दिया जाता है। वहीं एक ‘प्रतीकात्मक’ जमीनी लीडर या समुदाय के सदस्य से अपेक्षा की जाती है कि वह एक तयशुदा, सीमित भूमिका निभाए, जिससे आयोजकों के समावेशी इरादों और संवेदनशीलता का प्रदर्शन हो सके।
इसी तरह दर्शकों से जल्दी-जल्दी सवाल पूछने को कहा जाता है, और उन्हें अपने अनुभव या काम साझा करने से हतोत्साहित किया जाता है। इससे कॉन्फ्रेंस एक ऐसा संवादात्मक माहौल बनाने से चूक जाती हैं, जिसकी उनमें क्षमता होती है। एक आयोजन में, जमीनी स्तर पर किसी कार्यक्रम को लागू कर रहे राज्य-स्तरीय समूहों को आखिरी दिन बोलने का मौका दिया गया। उन्होंने तब बताया कि पिछले दो दिनों में जिन योजनाओं पर चर्चा हुई थी, वे फंडर के तय दायरे में व्यावहारिक नहीं थीं। लेकिन तब तक एजेंडा तय किया जा चुका था।
सहमति (कंसेंट): जैसे-जैसे कॉन्फ्रेंस कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग की जाने लगी है और उन्हें ऑनलाइन साझा किया जाने लगा है, प्रतिभागियों से सहमति लेना जैसे लगभग नदारद हो गया है। गौरतलब है कि हर कोई अपनी पहचान सार्वजनिक होने का जोखिम नहीं उठा सकता। खासकर वे लोग, जिनकी पहचान किसी कारणवश संवेदनशील या विवादित हो सकती है। इसके अलावा, जब रिकॉर्डिंग साझा भी की जाती है, तो सब-टाइटल्स और ऑडियो डिस्क्रिप्शन जैसी बुनियादी सुविधाओं को अनिवार्य मानने के बजाय अक्सर वैकल्पिक ही माना जाता है।
भोजन: यह रोचक है कि एक कॉन्फ्रेंस स्थल पर खाना भी सामाजिक व्यवस्था की असमानताओं को बल दे सकता है। हमने कई आयोजनों में देखा है कि फंडरों और कॉन्फ्रेंस पार्टनर के लिए अलग, विशेष कमरे होते हैं, जबकि बाकी प्रतिभागियों को दूसरी जगह कतार में लगना पड़ता है। एक कार्यक्रम में आदिवासी प्रतिभागियों को बाकायदा अलग लाइन में भेजा गया। एक अन्य आयोजन में ‘आदिवासी भोजन’ को सांस्कृतिक प्रदर्शनी की तरह पत्तलों पर परोसा जा रहा था। जिन समुदायों के भोजन और संस्कृति को ऐसे आयोजनों में प्रदर्शनी की तरह दिखाया जाता है, उन्हीं लोगों को वहां भेदभाव और अलग व्यवहार से जूझना पड़ता है।
3. ‘एक्सेसिबिलिटी’, यानी ‘पहुंच’ किसे मिलती है?
अक्सर एक्सेसिबिलिटी को बहुत सीमित अर्थों में समझा जाता है—रैम्प हैं या नहीं, लिफ्ट है या नहीं, कार्यक्रम स्थल कितना दूर है आदि। ये तमाम चिंताएं भी अक्सर केवल विकलांगता से जुड़े आयोजनों में ही उभरकर सामने आती हैं। बाकी के अधिकांश आयोजनों में यह सारे सवाल काफूर हो जाते हैं। रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतें—जैसे सुलभ शौचालय, बैठने की व्यवस्था, कार्यक्रम स्थल तक पहुंचना, और स्पष्ट संकेत—जो यह तय करती हैं कि कोई व्यक्ति कार्यक्रम में सचमुच भाग ले पाएगा या नहीं, अक्सर पूरी तरह नजरअंदाज कर दी जाती हैं।
हमारी टीम ने एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया था, जहां ट्रांसजेंडर प्रतिभागियों को पहले से यह जानकारी ही नहीं दी गई थी कि उनके लिए कौन-सी सुविधाएं उपलब्ध हैं। आयोजन स्थल पर केवल सिस-जेंडर लोगों के लिए शौचालय थे। ऐसे में एक प्रतिभागी को उस शौचालय का इस्तेमाल करने पर सवालों का सामना करना पड़ा।
एक्सेसिबिलिटी सिर्फ भौतिक ढांचे से तय नहीं होती है। इसमें समय और वातावरण की बनावट भी उतनी ही अहम होती है। आठ से दस घंटे तक चलने वाले सम्मेलन, जिनमें एक के बाद एक सत्र भर दिए जाते हैं, बहुत जल्दी बोझिल हो सकते हैं। खासकर न्यूरोडाइवर्जेंट लोगों और उन प्रतिभागियों के लिए, जिनकी विकलांगता स्पष्ट तौर पर नजर नहीं आती है। जब पर्याप्त ब्रेक, शांत जगहें और सहज भागीदारी के विकल्प उपलब्ध नहीं होते, तो कॉन्फ्रेंस यह संदेश देती है कि एक्सेसिबिलिटी एक व्यक्तिगत बोझ है, साझा जिम्मेदारी नहीं।
कॉन्फ्रेंस आयोजन बेहतर बन सकते हैं
कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य सीखने, संवाद और आपसी समझ के लिए समावेशी व जीवंत परिवेश बनाना है। और यह सब मुमकिन है। यह सच है कि दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में होने वाले भव्य, वार्षिक और प्रतिष्ठित आयोजनों में खामियां बहुत साफ दिखाई देती हैं। लेकिन इसके साथ-साथ ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं, जहां आयोजकों ने सोच-समझकर कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की हैं। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि बहिष्करण से बचा जा सकता है और अगर इरादा हो, तो तमाम कमियों को दूर भी किया जा सकता है।
जीवन के अनुभव कोई साधारण किस्से नहीं होते, जिन्हें सिर्फ उदाहरण या प्रदर्शनी के लिए सुनाया जाए।
हैदराबाद में हुए एक कार्यक्रम में नेटवर्किंग और भोजन को एक-दूसरे से अलग नहीं रखा गया था। आयोजन स्थल एक बड़ा हॉल था, जहां जमीन पर बैठने की व्यवस्था थी। जब सभी लोग साथ बैठकर खाते और बातचीत करते थे, तो अनायास ही लोग एक-दूसरे से जुड़ जाते थे। यह उदाहरण बताता है कि आयोजनों में साझा भौतिक परिवेश झिझक और असुरक्षा की दीवारें को तोड़ सकता है।
इसी तरह, एक अन्य आयोजन में पैनल थे ही नहीं। लोगों ने अपने काम को नाटक, चित्रकला और अन्य रचनात्मक तरीकों से प्रस्तुत किया। प्रतिभागी सिर्फ काम के बारे में सुन नहीं रहे थे—वे उसे देख सकते थे, महसूस कर सकते थे, और उससे संवाद कर सकते थे। एक और सम्मेलन में ऐसे संगठनों के लिए अलग स्थान बनाए गए थे, जो समान चुनौतियों से जूझ रहे थे, ताकि वे आपस में बात कर सकें, अपने अनुभव साझा कर सकें और सामूहिक रूप से सीख सकें।
पारंपरिक पैनल प्रारूपों के भीतर भी कुछ आयोजकों ने ‘देखभाल’ (केयर) के लिए जगह तैयार की है। एक आयोजन में ऐसी जगह डिजाइन की गई थी कि अगर किसी प्रतिभागी को अत्यधिक बोझिल महसूस हो और उन्हें थोड़ी देर के लिए बाहर जाना पड़े, तो वह कमरे में बिना किसी व्यवधान के ऐसा कर सके। यह बताता है कि सार्थक भागीदारी के लिए लगातार और प्रदर्शनात्मक रूप से मौजूद रहना जरूरी नहीं है।
अगर कॉन्फ्रेंस सीखने, संवाद और सामूहिक कल्पना की जगह है, न कि केवल फंडिंग एजेंडों को आगे बढ़ाने का मंच—तो समावेशन को मूल सिद्धांत की तरह देखा जाना चाहिए। समावेशन का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि हाशिए पर मौजूद आवाजों को कमरे में बुला लिया जाए। इसका अर्थ है कमरे को इतना सहज बनाना कि उसमें मौजूद हर व्यक्ति अपनी बात बोल सके, सुन सके, असहमति जता सके, आराम कर सके और उसे अपनेपन का अनुभव हो। जीवन के अनुभव कोई साधारण किस्से नहीं होते, जिन्हें सिर्फ उदाहरण या प्रदर्शनी के लिए सुनाया जाए। वे ज्ञान का एक महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं, जिन्हें यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे नीतियों की कल्पना, उनके क्रियान्वयन और उनके मूल्यांकन की दिशा तय करें—ठीक उन्हीं लोगों के वास्तविक जीवन संदर्भों में, जिन पर ये नीतियां असर डालती हैं।
इस लेख में आईडीआर टीम के सदस्यों ने योगदान दिया है।
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।
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लेखक के बारे में
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कुमार उन्नयन आईडीआर में सीनियर एडिटोरियल एसोसिएट के रूप में कार्यरत हैं। वे नियमित रूप से भाषा और समुदाय से जुड़े विषयों पर काम करते रहे हैं। इस दौरान उन्होंने मौखिक इतिहास शोध, फील्ड पत्रकारिता, लेखन और अनुवाद जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई है। आईडीआर से पहले वह सेंटर फॉर कम्युनिटी नॉलेज, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एशियन स्टडीज़, नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी, कथा और द कारवां जैसे संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उन्होंने साहित्य में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है और मौखिक इतिहास में प्रशिक्षित हैं।
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सृष्टि गुप्ता आईडीआर में एडिटोरियल एसोसिएट हैं और लेखन, सम्पादन और अनुवाद से जुड़े काम करती हैं। इससे पहले सृष्टि ने स्प्रिंगर नेचर के साथ संपादकीय काम किया है। उन्होंने राजनीति विज्ञान में एम ए किया है और लिंग, सामाजिक न्याय, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर अध्य्यन करने में रुचि रखती हैं।
