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अनानास से बनी साड़ियांः क्या बनारसी बुनकरों के अस्तित्व को बचा पाएंगी?

कपड़े बुनने की मशीन पर काम करता एक श्रमिक_बनारसी साड़ी
9 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित

वाराणसी की बनारसी साड़ियों की ख्याति उनकी बारीक बुनाई और भव्य डिजाइनों के लिए दुनियाभर में है। इस क्षेत्र में लगभग 12 लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हथकरघा रेशम उद्योग से जुड़े हुए हैं। बुनकर समुदाय के लिए यह उनकी आय का मुख्य साधन है। समय के साथ बनारसी साड़ी उद्योग और बुनकर समुदाय के लिए कई तरह की चुनौतियां उभरी है।

मिर्जापुर जिले के छोटा मिर्जापुर गांव में रहने वाले 40 वर्षीय बुनकर मनोज बताते हैं, “70 के दशक में रेशम-जरी महंगे हुए, 90 के दशक में पावरलूम मशीनें आईं। साल 2000 तक नकली साड़ियों की बिक्री बढ़ने लगी और 2010 के बाद डिजिटल मार्केट आ गया। हमें इस नए तरह के बाजार का अनुभव नहीं था। इसके अलावा, हमारी जो थाती (पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा) थी, उसे भी साल 2020 में कोविड ने लगभग खत्म कर दिया।” मनोज उम्मीद जताते हैं कि “अगर हमारी कला को बचाना है तो हमें सीधे बाजार से जोड़ना होगा। कच्चा माल सस्ता करना होगा। आसान कर्ज देना होगा और जीआई टैग की रक्षा करनी होगी।” मनोज जैसे कई बुनकर मानते हैं कि बदलते समय के साथ तालमेल बैठाना अब मुश्किल होता जा रहा है।

बनारसी साड़ी उद्योग पर गहराते संकट और रोजगार की अनिश्चिताओं के चलते अनेक बुनकर सूरत, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। लेकिन अब इस उद्योग को फिर से जीवित करने के लिए प्रयास किए जाने लगे हैं। इससे जुड़ी चुनौतियों को खत्म करने के लिए नई तकनीक और तरीकों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। ऐसा ही एक प्रयास पाइनएपल यानी अनानास के पत्तों से बना सूत (यार्न) है। यानी, रेशम की बजाय अब अनानास के सूत से बनारसी साड़ियां बुनी जा रही हैं। ये साड़ियां न केवल सस्ती और टिकाऊ होती हैं बल्कि पहनने में भी आरामदायक होती है।

अनानास के पत्तों से धागा बनाने की खोज करने वाली डॉ अंगिका कुशवाहा का कहना है, “2019 में रिसर्च के दौरान मुझे पता चला कि उत्तर प्रदेश, असम और पूर्वोत्तर में अनानास खूब उगता है, लेकिन फल के बाद उसकी पत्तियां खेत में सड़ने के लिए छोड़ दी जाती हैं। फिलीपींस और थाईलैंड में इन्हीं पत्तों से फाइबर बनाकर कपड़े और वीगन लेदर तैयार होते हैं। भारत में यह क्षेत्र लगभग खाली था। इसलिए रिसर्च कर हमने अनानास यार्न से धागा बनाने की तकनीक विकसित की।”

अंगिका आगे जोड़ती हैं, “इस प्रक्रिया में कई चुनौतियां थीं- जैसे भारत में फाइबर निकालने के लिए मशीनें नहीं थीं। पत्तों को साफ करना, सुखाना और यार्न में बदलना एक मेहनतभरा और धैर्यपूर्ण काम था। कभी धागा टूट जाता था तो कभी खुरदुरा हो जाता था।” 

इस तरह महीनों की मेहनत के बाद ऐसा धागा तैयार किया जो मजबूत, टिकाऊ और रेशम जैसी प्राकृतिक चमक वाला हो। इस धागे में ऐसे गुण भी हैं जो इसे बैक्टीरिया से बचाते हैं और धूप में टिकाऊ बनाते हैं। यह धागा कॉटन से तीन गुना ज्यादा मजबूत है और पसीना भी जल्दी सोखता है।

अनानास से बने धागे को लेकर रामनगर के बुनकर 55 वर्षीय समीउल्लाह अंसारी का कहना है, “पहले लोग कहते थे-ये तो बनारसी साड़ी के कारीगर हैं। अब कहते हैं कि बस कपड़ा बुनने वाला है। पहले जब पावरलूम नहीं थे तो हैंडलूम पर साड़ियां बुनने वालों की बहुत कद्र हुआ करती थी। कमाई भी अच्छी होती थी। लूम ने बुनकरों की सारी लोकप्रियता खत्म कर दी है। बनारस में सिर्फ सात-आठ हजार ही करघे बचे हैं जिन पर बनारसी साड़ियां बुनी जाती हैं।”

अनुभवी बुनकर समीउल्लाह अंसारी आगे जोड़ते हैं, “अनानास के धागों ने नई उम्मीद जगाई है। अनानास यार्न की कीमत सिर्फ 800 रुपये प्रति किलो है जबकि रेशम का भाव सात से आठ हजार रुपये किलो है। अनानास का धागा हल्का भी है, मजबूत भी और विदेशी खरीदारों को वापस बनारस की ओर खींच सकता है। जब ग्राहकों को पता चलता है कि साड़ी अनानास के पत्तों से बनी है तो उनकी आंखों में हैरानी और चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।”

बुनकरों के बीच अनानास के यार्न से तैयार साड़ियों को उम्मीद की नजर से देखा जा रहा है। बनारस में बुनकरी के केंद्र लोहता के अशफ़ाक अहमद और इरफान मियां का कहना है कि अनानास के यार्न से बना धागा बनारसी बुनकरी को वैश्विक फैशन से जोड़ने का काम कर सकता है। लेकिन इसके लिए कई स्तर पर सुधार और बुनकरों के हितों में नीतियां बनाने की जरूरत है। वहीं बुनकर आमल अंसारी का कहना है कि अगर सरकार पाइनएपल फाइबर के धागों की सप्लाई आसान कर दे तो ये फाइबर हमारे काम को नई जान दे सकता है।

अनानास यार्न, रेशम के टिकाऊ और किफायती विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। पहले बुनकर केवल मंहगे रेशम धागे पर निर्भर थे। अब इस फाइबर से कम लागत में नए डिजाइन तैयार हो रहे हैं। बुनकर चाहते हैं कि अनानास यार्न से बनी साड़ियों का प्रचार देश-विदेश में किया जाए, ताकि बाजार बढ़े और बनारस के हथकरघा उद्योग की चमक दोबारा लौट सके।

आराधना पांडेय एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और वाराणसी में रहती हैं। वे जेंडर, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। 

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