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सिग्नल की तलाश में धड़गांव के गांव

गांव के लोग मोबाइल नेटवर्क की तलाश में ऊंचाई पर एक पेड़ के पास खड़े होकर सिग्नल पकड़ने की कोशिश करते हुए_डिजिटल
15 दिसंबर 2025 को प्रकाशित

महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले के धड़गांव ब्लॉक के दूर-दराज के गांवों में ई-केवाईसी सत्यापन के कारण सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन करना कठिन होता जा रहा है। उदाहरण के लिए, मुख्यमंत्री माझी लड़की बहन ऐसी ही एक योजना है, जिसके तहत 21 से 65 वर्ष की आयु की पात्र महिलाओं को प्रति माह 1500 रुपये की सहायता मिलती है।

यहां के स्थानीय निवासियों को ई-केवाईसी सत्यापन के लिए जरूरी वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) प्राप्त करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्हें स्थिर मोबाइल नेटवर्क पाने के लिए, तंग रास्तों और खड़ी पहाड़ियों वाले ऊबड़-खाबड़ इलाकों को पार करते हुए दो से तीन घंटे तक चलना पड़ता है। यहां तक कि कुछ लोग सिग्नल ढूंढने के लिए पेड़ों या छोटी पहाड़ियों तक पर चढ़ने को मजबूर हैं। कई महिलाएं मोबाइल पर ओटीपी आने की उम्मीद लगाए, अपने बच्चों को गोद में लेकर खाने-पीने के थैले समेत कई घंटों इंतजार करती हैं।

अक्सर, गांव में कोई छोटी पहाड़ी या पेड़ मोबाइल नेटवर्क पाने का स्थल बन जाता है। महिलाएं वहां इकट्ठा होती हैं और तेज धूप में अपने मोबाइल फोन को ऊपर उठाए ओटीपी आने का इंतजार करती हैं। किसी-किसी दिन ओटीपी आता ही नहीं है और उन्हें अगले दिन फिर से यही प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। इसके कारण धड़गांव के कई परिवारों को रोजगार और कमाई का एक दिन गंवाना पड़ता है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता इन महिलाओं को ऑफलाइन फॉर्म भरने में मदद जरूर करती हैं, लेकिन ओटीपी सत्यापन न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि उनके पिता या पतियों के लिए भी अनिवार्य है।

कुछ महिलाएं आस-पास के कस्बों और गांवों में भी जाने की कोशिश करती हैं, जहां कनेक्टिविटी बेहतर होती है। लेकिन वहां पहुंचने के लिए उन्हें आवाजाही पर खर्च करना पड़ता है, जो लगभग 300 रुपये तक हो सकता है। पहले से ही रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे परिवारों के लिए यह एक बड़ी रकम है।

कल्पेश पवार आदिवासी जनजागृति में एक जमीनी स्तर के जनसंगठक हैं। नितेश भारद्वाज आदिवासी जनजागृति का नेतृत्व करते हैं।

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