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हिंसा के साये में शिक्षा: कक्षाओं से दूर मणिपुर के कुकी छात्र

हिंसा के साये में शिक्षा: कक्षाओं से दूर मणिपुर के कुकी छात्र
11 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित

​​मैं मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक कुकी छात्र संगठन से जुड़ी हुई हूं। बीते एक वर्ष में इस क्षेत्र में कुकी समुदाय के लोगों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। मई 2023 में राज्य में जातीय हिंसा शुरू होने के बाद से लगभग 40,000 से 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं। इनमें से अधिकांश आज भी राहत शिविरों में रह रहे हैं।

मैं तुइबुओंग ब्लॉक में काम करती हूं, जहां स्कूल और कॉलेज के तकरीबन 15,000 छात्रों की शिक्षा बुरी तरह प्रभावित हुई है। शुरुआत में जब हिंसा-प्रभावित इलाकों से लोग इस कस्बाई क्षेत्र की ओर आने लगे, तो स्कूलों को ही राहत शिविरों के रूप में इस्तेमाल किया गया। अब स्थिति यह है कि यहां बच्चों की कुल संख्या कस्बे के स्कूलों की नामांकन क्षमता से कहीं अधिक हो चुकी है। इस क्षेत्र के दो सरकारी स्कूलों (गांधी मेमोरियल और तुइबुओंग) की संयुक्त क्षमता लगभग 600 छात्रों की है, लेकिन वर्तमान में प्रत्येक स्कूल में करीब 2,000 छात्रों को दाखिला दिया जा रहा है। संसाधनों की भारी कमी के कारण ये स्कूल अत्यधिक दबाव में काम कर रहे हैं और अलग-अलग बैचों के लिए शिफ्ट में कक्षाएं चला रहे हैं। राहत शिविरों में रहने वाले अधिकांश छात्र प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते हैं।

मैं जिस छात्र संगठन के साथ काम करती हूं, उसने इस क्षेत्र में सामुदायिक स्कूलों की शुरुआत की है। इसका उद्देश्य प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर को कम करना है। इन स्कूलों को संचालित करने के लिए हमें स्थानीय समुदाय, निजी दानदाताओं, गैर-लाभकारी संगठनों और चर्च से सहयोग मिलता है। यहां शिक्षक स्वेच्छा से पढ़ाते हैं। हाल ही में हम उन्हें 5,000–6,000 रुपये का मानदेय देने की स्थिति में आ पाए हैं।

तमाम प्रयासों के बावजूद हम विस्थापित छात्रों में से केवल लगभग 50 प्रतिशत तक ही पहुंच पा रहे हैं। कई माता-पिता बुनियादी संसाधन न होने के कारण या तो अपने बच्चों को स्कूल भेजना नहीं चाहते या फिर चाह कर भी भेज नहीं पाते। कुछ बच्चे अपने परिवार की आजीविका में हाथ बंटाने के लिए बांस की कोपलें (बंबू शूट) बेचने जैसे छोटे-मोटे काम भी करते हैं। जिन बच्चों से स्कूल में हमारा संपर्क होता है, उनमें स्पष्ट तौर पर सदमे (ट्रॉमा) के संकेत नजर आते हैं। कुछ बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया है। वे अक्सर एके-47, भीड़ द्वारा पीछा किए जाने, शत्रुता और दुश्मनों की बातें करते हैं। ऐसे बच्चों के साथ हम काउंसलिंग भी करते हैं, ताकि वे एक सुरक्षित, स्वस्थ और अहिंसक माहौल में धीरे-धीरे उबर सकें।

ग्रेसी लामखोलहिंग मणिपुर विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल एक्सक्लूजन एंड इन्क्लूसिव पॉलिसी में पीएचडी शोधार्थी हैं।

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