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किब्बर गांव का अनोखा पंचायत चुनाव

हिमाचल प्रदेश

अगर महामारी नहीं आती तो लोबज़ांग टंडुप चंडीगढ़ में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे होते। लेकिन 17 जनवरी 2021 को उनके कंधे पर अचानक से एक ज़िम्मेदारी आ गई। किब्बर में पंचायत चुनाव होने वाले थे और अगले पांच वर्षों तक किब्बर के पंचायत चुनाव की क़िस्मत का फ़ैसला करने में लोबजांग को मुख्य भूमिका निभानी थी। किब्बर गांव समुद्र तल से 4,200 मीटर की उंचाई पर स्थित है और दुनिया की सबसे उंचाई पर बसे मानव बस्तियों में से एक है। किब्बर पंचायत हिमाचल प्रदेश के लाहौल–स्पीती जिले के एक उपखंड स्पीति में 13 पंचायतों में से एक है। यहां रहने वाले ज़्यादातर लोग खेती और पशुपालन का काम करने वाले समुदायों से आते हैं और इस इलाक़े की जनसंख्या घनी नहीं है। इसके अलावा यह साल में लगभग छः माह बर्फ़ से ढंका रहता है।

अपने मनोरम दृश्यों के लिए प्रसिद्ध इस सुदूर गाँव की चुनाव प्रणाली बहुत ही अनोखी है। इसमें पंचायत नेताओं का फैसला ‘टॉस’ नामक लकी ड्रा के आधार पर किया जाता है। यह स्थानीय समस्या के समाधान के रुप में उभर कर आया था। किब्बर गांव के सबसे बुजुर्ग लोगों में से एक फुंटसोग नामगैल का कहना है कि “कई सालों तक लोग अपने रिश्तेदारों को ही अपना मत देते थे। अगर आपके पास अपने विस्तृत परिवार का साथ हो तो आप चुनाव जीत सकते थे। प्रत्येक चुनाव में लोग कई दलों में बंट जाते थे। लेकिन यह हमारे जैसे छोटे समुदाय के अनुकूल नहीं है।”

मैं इस गांव के लोगों के एक समूह का हिस्सा था जो इस साल इस प्रक्रिया में मदद करने के लिए इकट्ठा हुए थे। मंदिर में देवता से अनुमति लेने के बाद चुनाव की कार्यवाही शुरू की गई। उसके बाद, चुनाव पर काम कर रहे समुदाय के सदस्यों को गांव के प्रत्येक घर से एक सदस्य के साथ नामों की सूची बनाने के लिए बगल के कमरे में भेज दिया गया। नामों वाली पर्चियां बनाई गईं। हर पर्ची पर एक नाम लिखा हुआ था और फिर उन पर्चियों को जौ के आटे से बनी लोइयों में छुपाकर गोलियां बना ली गई। इन गोलियों को एक प्लेट में रख दिया गया।

तय समय पर गांव के लोग मुख्य रूप से पुरुष उस मंदिर के बाहर जमा हो गए। जैसे ही लोबजांग को प्लेट से लकी चिट निकालने के लिए बुलाया गया वैसे ही वहां जमा सभी लोग एक साथ खड़े हो गए। लोबजांग ने एक लोई उठाई और उसमें से पर्ची निकालने लगे। लोग कंधो से उचक-उचक कर लोबजांग को देखने की कोशिश में लगे हुए थे। उस पर्ची में “टंडुप छेरिंग, गस्सा” लिखा हुआ था। टंडुप छेरिंग (जिन्हें गस्सा के नाम से भी जाना जाता है) को किब्बर पंचायत के उप-प्रधान के पद पर निर्विरोध रूप से चुन लिया गया। और उनके चारों ओर एक खटक (औपचारिक दुपट्टा) लपेटा गया।लोबजांग चुनाव की इस प्रक्रिया को लेकर क्या सोचते हैं? उनका कहना है कि “मैं अंतिम बार साल 2005 के चुनाव में उपस्थित था। उस समय मैं कक्षा 5 में पढ़ता था। मुझे आज भी याद है कि कैसे परिस्थिति असहज हो गई थी। पहले मुझे लगता था कि पर्ची वाला यह तरीक़ा बहुत अच्छा समाधान है। अब मुझे लगता है कि इसमें सभी को हिस्सा न लेकर सिर्फ़ उन लोगों को भाग लेना चाहिए जो पंचायत के लिए काम करना चाहते हैं। अगर हम किसी ऐसे आदमी को चुन ले जिसे इसमें किसी तरह की रुचि नहीं तो फिर क्या होगा? जब तक उन्हें अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास होगा तब तक उनका कार्यकाल समाप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगा।”

अजय बिजूर लद्दाख में नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (एनसीएफ़) के हाई-एल्टीट्यूड प्रोग्राम में असिस्टेंट प्रोग्राम हेड के रूप में काम करते हैं। कलजांग गुरमेट हिमाचल प्रदेश में एनसीएफ़ इंडिया के साथ प्रोजेक्ट असिस्टेंट के रूप में काम करते हैं।

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अधिक करें: अजय बिजूर और कलजांग गुरमेट के काम को विस्तार से जानने और सहयोग करने के लिए उनसे क्रमश: ajay@ncf-india.org और kalzang@ncf-india.org पर सम्पर्क कर सकते हैं।

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