Staging Environment

मेरे कॉलेज तक पहुंचने की कीमत सौ रुपये है

मेरे कॉलेज तक पहुंचने की कीमत सौ रुपये है
3 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित

मैं लखनऊ जिले के मवैया इलाके की सिंगर नगर कॉलोनी में रहती हूं, जो एक अनौपचारिक बस्ती है। मेरा कॉलेज भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय, घर से लगभग सात किलोमीटर दूर है। यह दूरी सुनने में कम लगती है, लेकिन मेरे लिए यह हर दिन पैसों का हिसाब लगाने और सुरक्षित लौटने की चिंता से जुड़ी होती है।

करीब 11 बजे मैं घर से निकलती हूं। पहले एक किलोमीटर पैदल चलकर मोहैया पहुंचती हूं। वहां से चार किलोमीटर के लिए चारबाग जाने वाला साझा ऑटो पकड़ती हूं। ऑटो इतना भरा होता है कि कई बार ठीक से खड़ा होना भी मुश्किल होता है, फिर भी मैं वही लेती हूं क्योंकि ई-रिक्शा का किराया महंगा पड़ता है। चारबाग से मुझे दूसरा ऑटो लेना पड़ता है, जो आखिरी तीन किलोमीटर तय कराकर मुझे कॉलेज पहुंचा देता है। पूरे सफर में लगभग एक घंटा लग जाता है और एक तरफ का खर्च करीब सौ रुपये होता है। अगर कभी निजी ऑटो लेना पड़े तो यही सफर दो सौ से ढाई सौ रुपये में पड़ जाता है। इस रास्ते पर बस नहीं चलती, जबकि बस होती तो केवल बाईस रुपये में सफर हो सकता था।

मेरे लिए रोज इतना खर्च करना संभव नहीं है। इसलिए मैं हफ्ते में सिर्फ दो या तीन दिन ही कॉलेज जा पाती हूं। इसका असर मेरी पढ़ाई पर साफ दिखाई देता है। कई बार परीक्षा पास करने के लिए मुझे विषय रटकर याद करना पड़ता है, जबकि संगीत जैसे विषय में समझ और अभ्यास ज्यादा जरूरी होते हैं। हर सेमेस्टर कॉलेज से कम हाजिरी को लेकर घर पर नोटिस आ जाता है। लेकिन परीक्षा के समय कोई विकल्प नहीं होता और तब मुझे लगभग रोज कॉलेज जाना पड़ता है।

पैसों के साथ-साथ सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता है। मेरी कक्षाएं अक्सर शाम चार बजे तक चलती हैं। मेरी बस्ती में सड़क पर रोशनी की ठीक व्यवस्था नहीं है, इसलिए अंधेरा होने से पहले घर पहुंचना जरूरी हो जाता है। अगर कभी देर हो जाए तो घर में सब परेशान हो जाते हैं। कई बार मेरी मां मुझे ढूंढने बाहर भी निकल जाती हैं।

दोस्तों के साथ थोड़ा समय बिताना भी मुश्किल हो जाता है। कॉलेज के बाद रुक पाना मेरे लिए आसान नहीं है और इसका असर मेरी सामाजिक जिंदगी पर भी पड़ा है।

इलाके में कुछ महिला ऑटो चालक हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। मेरे घर से लगभग दो किलोमीटर दूर एक मेट्रो स्टेशन भी है, लेकिन वहां से कॉलेज तक सीधा रास्ता नहीं है। इसके अलावा स्टेशन अक्सर खाली रहते हैं, इसलिए वहां जाना सुरक्षित महसूस नहीं होता। इन परेशानियों से जूझने वाली मैं अकेली नहीं हूं। मेरे कॉलेज के कई छात्र अलग-अलग इलाकों से आते हैं और उन्हें भी ऐसी ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कॉलेज की तरफ से कोई परिवहन सुविधा नहीं दी जाती।

इन सारी मुश्किलों के बावजूद मैं पढ़ाई जारी रखना चाहती हूं और आगे चलकर संगीत की शिक्षिका बनना चाहती हूं। यह मेरा अंतिम वर्ष है और आगे मैं इसी कॉलेज में तबला सीखने की योजना भी बना रही हूं। मैंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटा सा संगीत समूह बनाया है। हम मिलकर रैप गीत भी तैयार करते हैं। उनमें से एक गीत इसी आने-जाने की परेशानी पर आधारित है। लेकिन हर सपने के साथ वही सवाल जुड़ा रहता है कि सफर में कितना समय लगेगा, कितना पैसा खर्च होगा, रास्ता कितना सुरक्षित होगा और क्या मैं अंधेरा होने से पहले घर पहुंच पाऊंगी।

ज्योति ठाकुर लखनऊ में संगीत की अंतिम वर्ष की छात्रा हैं और द क्लाइमेट एजेंडा के साथ एक स्वयंसेवक के रूप में जुड़ी हुई हैं।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें

अधिक जानें: उत्तराखंड के गांवों में लोग बेहतर सड़कें और परिवहन सुविधाएं चाहते हैं।

लेखक के बारे में