अधिकार
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ई-केवायसी: भोजन के अधिकार की राह में खड़ी नई दीवार
राशन कार्ड के लिए ई-केवायसी प्रक्रिया में अस्पष्टता और इसकी असफलता, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत लोगों की भोजन तक पहुंच को खतरे में डाल रही है। -
सुंदरबन में समुदाय द्वारा शिक्षा के लिए की गई एक सुंदर पहल
सुंदरबन के एक गांव में शुरू हुआ एक निशुल्क शिक्षा और देखभाल केंद्र जिसे समुदाय ने श्रमिक वर्ग के बच्चों के लिए शुरू किया है। -
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में वंचित समुदायों की उपेक्षा
बिहार में कारावास की हकीकत आज भी जातीय भेदभाव और ढांचागत पक्षपात से प्रभावित है, जिसे समावेशी और न्यायपूर्ण बनाने के लिए बुनियादी बदलाव की जरूरत है। -
आईडीआर इंटरव्यूज | देविका सिंह
मोबाइल क्रेचेज की सह-संस्थापक देविका सिंह, प्रवासी मजदूरों के बच्चों के साथ अपने लंबे काम के अनुभव, एक चलती-फिरती देखभाल प्रणाली (मोबाइल केयर सिस्टम) बनाने और बच्चों की देखभाल से जुड़ी नीतियों में बदलाव लाने की कहानी साझा कर रही हैं। -
घरेलू हिंसा अधिनियम: न्याय के लिए बेहतर अमल की जरूरत
घरेलू हिंसा कानून ने कई महिलाओं को न्याय दिलाने में सहायता की है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता आज भी चुनौतियों से घिरी हुई है। -
संवाद से संरक्षण तक: एक महिला वन रक्षक का सहभागी अनुभव
उदयपुर, राजस्थान की एक महिला फॉरेस्ट गार्ड वन संरक्षण और ग्रामीण महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम कर रही हैं, उनके संघर्ष और अनुभवों के बारे में यहां पढ़िए। -
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ लामबंद होती घरेलू कामगार महिलायें
एनसीआर में घरेलू कामगार महिलायें सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल सुनिश्चित करने के लिए सरकार और नियोक्ताओं पर ठोस कदम उठाने का दबाव बना रही हैं। -
ज्ञान की राजनीति: संविधान और एनटी-डीएनटी समुदाय
एकपक्षीय प्रसार के कारण संवैधानिक ज्ञान अभी भी एनटी-डीएनटी समुदायों की पहुंच से बाहर है। -
कचरा बीनने वाले श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा का महत्व
बेंगलुरु में कचरा बीनने वाले श्रमिकों के साथ कार्यरत संगठनों के एक साझा समूह का मानना है कि सरकारी योजनाओं की सुलभता उनके जीवन में निर्णायक भूमिका निभाती है। -
बुंदेलखंड की चप्पल प्रथा: स्वाभिमान की कीमत पर सम्मान
बुंदेलखंड इलाके के ललितपुर जिले में आज भी चप्पल प्रथा कायम है जो दलित समुदाय खासकर, महिलाओं के लिए अपमान और असुविधा का कारण बन रहा है। -
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आदिवासी समूहों की एकजुट पहल: जल और जमीन पर अधिकार की मांग
आदिवासी जनजातियां भू-अधिकारों और मत्स्य पालन को लेकर संगठित हो रही हैं, ताकि अपनी पारंपरिक आजीविका को सुरक्षित रख सकें।