स्वास्थ्य और पोषण
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एक सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना, जो सबके लिए हो
केंद्र और राज्य सरकारें चाहें तो अपने सीमित आर्थिक बजट के भीतर ही गंभीर और खर्चीली बीमारियों के लिए यह नई तरह की स्वास्थ्य बीमा योजना ला सकती है और हर सामाजिक-आर्थिक वर्ग के लोग इसका फायदा उठा सकते हैं। -
आशा कार्यकर्ता: जब अनिवार्य हैं तो औपचारिक क्यों नहीं?
आशा कार्यकर्ता सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके बावजूद, वे लंबे घंटों, कम वेतन और सामाजिक सुरक्षा की कमी के रूप में अनिश्चित कार्य स्थितियों का अनुभव करते हैं। -
घुमंतू और विमुक्त जनजातियों के मानसिक न्याय के लिए मानसिक स्वास्थ्य ज़रूरी है
घुमंतू और विमुक्त जनजातियां भेदभाव, अन्याय और विकास योजनाओं के अभाव का सामना करती हैं। इन समुदायों के मानसिक स्वास्थ्य को इनके संघर्ष से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। -
सामाजिक व्यवहार परिवर्तन में रीति-रिवाज एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं
पारंपरिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों को अक्सर आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान और बायोमेडिकल सुझावों से उलट अंधविश्वास की तरह देखा जाता है, लेकिन ऐसा करना सही नहीं। -
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क्या बिहार का बिमहास मानसिक अस्पतालों को लेकर आम नज़रिए को बदल सकता है?
बिहार सरकार द्वारा स्थापित बिमहास, उत्तर भारत में सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य का केंद्र बन सकता है। इसके लिए मनोसामाजिक विकलांगता को लेकर जागरुकता अभियान और सहयोग की भी जरूरत होगी। -
सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को समझना
सरकारी योजनाएं और समाजसेवी स्वास्थ्य हस्तक्षेप काफ़ी हद तक फ़्रंटलाइन कार्यकर्ताओं पर निर्भर हैं। यह लेख उन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने वाले कारकों, उनके सामने आने वाली चुनौतियों और उन्हें दूर करने के तरीक़ों के बारे में बता रहा है। -
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आत्महत्या की घटनाओं के रोकथाम में मीडिया रिपोर्टिंग की ताक़त
इस तथ्य के बावजूद कि मीडिया आत्महत्या के मामलों की संख्या पर उल्लेखनीय असर डाल सकता है, भारत में इससे जुड़ी रिपोर्टिंग की गुणवत्ता बहुत निचले स्तर की है। ऐसे में स्थिति को बेहतर बनाने के लिए क्या बदले जाने की ज़रूरत है? -
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बाल कुपोषण: मेलघाट से मिली सीख
एक आईएएस अधिकारी ने कुपोषण से लड़ने के लिए स्थानीय डेटा, अंत:क्षेत्रीय समाधानों और समुदायों, सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका के महत्व को दर्शाया है। -
ग्रामीण भारत में मधुमेह का संकट क्यों गहराता जा रहा है?
ग्रामीण आंध्र प्रदेश में हुआ एक अध्ययन इशारा करता है कि इसका जवाब खान-पान की आदतों में बदलाव और किसानों का कम श्रम प्रधान फसलों की ओर झुकाव हो सकता है।