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विकलांगता के अनुकूल कार्यस्थल का निर्माण: समावेशिता क्यों मायने रखती है
एक समावेशी नेतृत्वकर्ता ‘हम लोग बनाम वे लोग’ के कथन को केंद्र में रखकर काम नहीं करता है। उन्हें कार्यस्थल में अपने और उन लोगों के बीच मौजूद समानताओं पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए जिनसे उनका संवाद स्थापित होता है। -
लोगों का हम पर से भरोसा उठ गया है
दक्षिणी राजस्थान में लोग स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं से दवाइयाँ लेने के लिए तैयार रहते हैं लेकिन आशा कार्यकर्ताओं से नहीं। -
भारत के वित्तीय सेवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाना इतना मुश्किल क्यों है
बैंकिंग क्षेत्र की डिजिटल शिकायत निवारण प्रणाली का लैंगिक बाधाओं और प्रौद्योगिकी तक सीमित पहुंच की समस्या को हल करना जरूरी है। -
समावेशी समुदायों को बनाना नागरिक समाज का कर्तव्य है
जब तक विभिन्न समुदाय लिंग, जाति, वर्ग और धर्मों के आधार पर लोगों को बाहर रखना बंद नहीं करेंगे तब तक एसडीजी को हासिल करने की तमाम कोशिशें कम पड़ती रहेंगी। -
“हमारे पास सबमें फिट होने वाली एक ही आकार की संचार रणनीति नहीं हो सकती है”
कोविड-19 के इस संकट भरे दौर में साक्ष्य-आधारित और समुदाय-केन्द्रित संवाद अफवाहों और फेक न्यूज के प्रसार को रोक सकता है। -
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कार्यस्थल पर अदृश्य विकलांगता से जूझ रहे कर्मचारियों को सहयोग देना
ऑटिज्म, एडीएचडी और डिप्रेशन जैसी अदृश्य अक्षमताओं से ग्रस्त लोगों के लिए संगठन पांच तरीकों से समावेशी नीतियां बना सकते हैं। -
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भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं को संचालित करने वाले क़ानून
भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं के कामकाज से जुड़ी दस ऐसी बातें जिनका संबंध वर्तमान क़ानूनी ढाँचे से है। -
अपने स्वयंसेवी संस्था को मुश्किलों से दूर रखें
सीएसआर और एफ़सीआरए के नियमों का पालन करते समय स्वयंसेवी संस्थाओं को नौ बातों का ध्यान रखना चाहिए।