सामाजिक न्याय
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आईडीआर इंटरव्यूज | राजिम केतवास
पिछले चार दशकों से श्रमिक एवं महिला अधिकारों के मुद्दों पर सक्रिय रही राजिम केतवास मध्य प्रदेश के श्रमिक आंदोलन में भागीदारी से लेकर अपने संगठन दलित आदिवासी मंच की स्थापना तक की यात्रा और अनुभवों को साझा कर रही हैं। -
संघर्ष से परे: कश्मीर के दर्द और जीवटता की कहानी
कश्मीर में दशकों से अशांति और हिंसा ने एक गहरी मानसिक वेदना को जन्म दिया है। कश्मीरी आवाम इससे कैसे जूझती है और इस दिशा में कौन से कदम उठाये जाने चाहिए? -
गिग कामगारों को बुनियादी अधिकार देने वाले कानूनों की राह इतनी कठिन क्यों है
लंबे समय तक एडवोकेसी और संघर्ष के बाद बने कानूनों से कई राज्यों में गिग और प्लेटफार्म कामगारों को सामाजिक सुरक्षा का आश्वासन तो मिला है लेकिन इतना भर होना काफी नहीं है। -
पोषण और स्वास्थ्य की सरकारी नीतियों से बहुत दूर है जमीनी हकीकत
पोषण से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए ऐसा दृष्टिकोण चाहिए जो समुदाय की पोषण संबंधी जरूरतों और स्वास्थ्य सेवा आपूर्ति तंत्र की दक्षता के बीच संतुलन कायम कर सके। -
जुगनू: रेड लाइट एरिया में पली पीढ़ी की निराली मैगजीन
मुजफ्फरपुर, बिहार में चार पन्नों से शुरू हुआ 'जुगनू' अखबार आज 36 पेज की एक मैगजीन बन गया है और अब यहां के युवाओं को एक नई पहचान दे रहा है। -
बराबरी की राह देखता बधिर समुदाय
यह अधिकारों के लिए सक्रिय युवा कार्यकर्ता परमीत के जीवन, उनके काम और उनसे जुड़ी चुनौतियों की झलक प्रस्तुत करता है। -
सरल कोशः पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली)
सरल-कोश के जरिए विकास सेक्टर से जुड़े नागरिक संगठनों के लिए कठिन अंग्रेजी शब्दों की सरल व्याख्या - पीडीएस। -
ई-केवायसी: भोजन के अधिकार की राह में खड़ी नई दीवार
राशन कार्ड के लिए ई-केवायसी प्रक्रिया में अस्पष्टता और इसकी असफलता, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत लोगों की भोजन तक पहुंच को खतरे में डाल रही है। -
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में वंचित समुदायों की उपेक्षा
बिहार में कारावास की हकीकत आज भी जातीय भेदभाव और ढांचागत पक्षपात से प्रभावित है, जिसे समावेशी और न्यायपूर्ण बनाने के लिए बुनियादी बदलाव की जरूरत है। -
घरेलू हिंसा अधिनियम: न्याय के लिए बेहतर अमल की जरूरत
घरेलू हिंसा कानून ने कई महिलाओं को न्याय दिलाने में सहायता की है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता आज भी चुनौतियों से घिरी हुई है। -
जन से, जन के लिए: फिलन्थ्रॉपी और सामाजिक न्याय का अटूट संबंध
फिलन्थ्रॉपी भय के माहौल में फल-फूल नहीं सकती, खासतौर से तब जब उसका उद्देश्य ही लोगों को भयमुक्त और सशक्त बनाना हो। -
ज्ञान की राजनीति: संविधान और एनटी-डीएनटी समुदाय
एकपक्षीय प्रसार के कारण संवैधानिक ज्ञान अभी भी एनटी-डीएनटी समुदायों की पहुंच से बाहर है।