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हल्का-फुल्का

सेविंग द अर्थ: वन ​​स्पीच​​ एट ए टाइम

पर्यावरण जैसे अहम मुद्दे पर काम करने वाली संस्थाओं की कथनी और करनी में अक्सर विरोधाभास नजर आता है।
6 जून 2025 को प्रकाशित
मीटिंग सेमिनार ग्राफिक_पर्यावरण दिवस
चित्र साभारः सलमान फहीम

​​‘हरित सेवा संस्थान’ का नाम शहर की जानी-मानी पर्यावरणीय संस्थाओं की फेहरिस्त में शामिल था। मॉल रोड पर उनका एक बड़ा ऑफिस था, दीवारों पर बांस की सजावट, कॉन्फ्रेंस रूम में हवा शुद्ध करने वाले पौधे और रिसेप्शन पर एक संकल्प — ​​हमने है ठाना, 2040 तक नेट जीरो है पाना!” ​​संस्था अपने काम को लेकर बहुत गंभीर थी। हाल ही में उन्होंने ‘पेपरलेस वर्क’ को बढ़ावा देने के लिए 124 पन्नों के एक्शन-प्लैन की बुकलेट जगह-जगह बांटी थी।​ 

​​संस्था को पिछले महीने एक नया प्रोजेक्ट मिला था — ‘हरियावन ग्राम पंचायत में पर्यावरण मंथन।’ पूरा स्टाफ लबालब उत्साहित था। एक सीनियर अधिकारी ने कहा, “हमें अपने गांवों को ‘इको-लिटरेट’ बनाना है। यही असली इम्पैक्ट है।” अगले ही हफ्ते साइट-विज़िट के लिए तीन एसी इनोवा बुक की गई। एक इंटर्न ने पूछा, “सर, हम लोकल ट्रेन से नहीं जा रहे?” जवाब मिला, “टाइम इज़ सुप्रीम! वो नहीं बचेगा, तो एनवायरमेंट क्या खाक बचाएंगे?” 

​​विज़िट से पहले बैनर, पोस्टर और फ्लेक्स बनवाये गए। चमकते हुए प्रिंट में “प्लास्टिक मुक्त हरियावन”, “प्रकृति बचाओ, जीवन सजाओ” जैसे स्लोगन ऑफिस के फर्श पर पसरे हुए थे। एक असिस्टेंट ने धीरे से पूछा, “ये बैनर किस पर छपवाए हैं?” सीनियर ने मुस्कराते हुए कहा, “प्लास्टिक शीट है यार। टिकाऊ होती है, इसलिए अगली बार भी यूज़ हो जाएगी — क्वाइट सस्टेनेबल यू सी।”​ 

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

​​गांव में पहला दिन सभा के नाम रहा। ‘पर्यावरण पखवाड़ा’ की शुरुआत के लिए स्कूल का बरामदा सजाया गया। प्लास्टिक की कुर्सियां, मिनरल वॉटर की छोटी-छोटी बोतलें और हर कुर्सी पर एक ‘ग्रीन लिविंग-क्लीन लिविंग’ हैंडबुक रखी गई, जो 64 रंगीन पन्नों में छपी थी। भाषण शुरू हुए। “हम आपसे सीखने आए हैं…वी डोंट वॉन्ट टू मोनोपलाइज़ दिस कन्वर्सेशन…क्लाइमेट क्राइसिस इज़ रियल…इससे हमारा सर्वनाश हो जाएगा…” चुपचाप बैठी जनता में सर्वनाश सुनकर थोड़ी सी हलचल हुई। फिर किसी ने पूछ लिया, “ओला गिरता है तो खड़ी फसल चपटी हो जाती है…क्या करें?” जवाब आया, “हम इसके लिए भी अलग से एक वर्कशॉप करेंगे।”​ 

​​दूसरे दिन वृक्षारोपण का कार्यक्रम था। स्कूल के शौचालय के पीछे कुछ सूखी क्यारियां थी, जहां दस “बायो-डाइवर्सिटी” वाले विदेशी पौधे लगाए जाने थे, जिन्हें गांव में किसी की सात पुश्तों ने पहले कभी नहीं देखा था। हर सदस्य को एक-एक गड्ढा दिया गया। गड्ढों में माली पहले ही मिट्टी भर चुका था, लेकिन फिर भी टीम ने पौधों पर हाथ रखकर ‘ऑन-ग्राउंड वर्क’ का भरपूर लुक दिया। फोटो सेशन के बाद संस्था के लीडर ने ‘कार्बन ऑफसेटिंग’ पर लंबा भाषण दिया। फिर पौधों को नियमित पानी देने की जिम्मेदारी स्कूल​​ के ​​पूर्व ​​चपरासी​​ को सौंप दी गई। वही चपरासी, जो रिटायर होने से पहले खराब मोटर अपनी जेब से ठीक करवाता था और रिटायर होने के बाद पेंशन फॉर्म के लिए तहसील दफ्तर में एड़ियां रगड़ रहा था।​ 

​​आखिरी दिन ‘सस्टेनेबिलिटी’ पर वर्कशॉप थी। गेहूं की कटाई का महीना था। गांव में बिजली नहीं थी। डीजल जनरेटर मंगावाया गया, जो बाहर धू-धू करता रहा और अंदर ‘नेट जीरो एमिशन’ पर स्लाइड्स चलती रही। ‘इंक्लूज़िविटी’ के सत्र में पूरे हॉल में कुल दो श्रोता मौजूद रहे: सरपंच, जो आते ही झपकी लेने लगे, और प्रधान का छोटा भाई, जो यह सोचकर आया था कि वहां एलईडी बल्ब बांटे जाएंगे। लंच में थर्माकोल की प्लेटों में पुलाव, पैक्ड दही और मिनरल वॉटर दिया गया। वर्कशॉप के बाद कुछ बच्चे वही प्लेटें हवा में उड़ा कर उनकी ‘फ्लाइंग सस्टेनेबिलिटी’ चेक करते पाए गए।

​​वर्कशॉप के आखिर में एक वरिष्ठ प्रतिनिधि बोले, “हमें गांव वालों की भागीदारी और ऊर्जा ने बहुत प्रेरित किया है।”

​​पीछे से किसी ने धीरे से फुसफुसाया — “पर गांव वाले तो थे ही नहीं!” ​

​​लेकिन​ ​तब​ ​तक​ ​संस्थान​ ​के​ ​इंस्टा​ ​हैंडल​ ​से​ ​एक​ ​पोस्ट​ ​ट्रेंड​ ​कर​ ​चुकी​ ​थी​ —“Building sustainable futures, one community at a time. 🌱✨ #GreenImpact #ClimateJustice #NetZeroMission #RuralLeadership 

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