समाजसेवी संस्था
बिना बड़े बजट के, बड़े संवाद की शुरुआत कैसे करें?
बड़े बजट और तय एजेंडे के बिना भी ऐसा संवाद संभव है, जिसमें हर आवाज़ को बराबर जगह मिले। जानिए, ज़मीनी संगठन कैसे अनकॉन्फ़्रेंस के ज़रिए ऐसा मंच बना सकते हैं।इस 15 अगस्त सोशल सेक्टर मांगे… आज़ादी
आज़ादी सिर्फ सत्ता से नहीं, कभी-कभी अपनी बनाई व्यवस्थाओं से भी चाहिए होती है। सोशल सेक्टर में भी कुछ ऐसे तौर-तरीके हैं, जो धीरे-धीरे टूल से तख्त बन बैठे हैं।क्या छात्रों के अनुभव छात्रवृत्ति की नीतियां बदल सकते हैं?
देश का स्कॉलरशिप सिस्टम वंचित छात्रों की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है। ऐसे में समुदाय-आधारित मॉडल उनके लिए सहयोग की एक नई राह दिखा सकते हैं।ज़ुल्मतों के दौर में सोशल सेक्टर की चुप्पी
सिविल सोसाइटी की पहचान सिर्फ़ उसके काम से नहीं, बल्कि इस बात से बनती है कि वह मुश्किल समय में किसके साथ खड़ी होती है।ज़मीनी संस्थाएं फंडर से कैपेसिटी बिल्डिंग और संस्थागत विकास पर बातचीत कैसे करें?
क्षमता निर्माण और संगठनात्मक विकास को अक्सर परियोजनाओं से अलग ज़रूरत माना जाता है, जबकि यही किसी संस्था के दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव की बुनियाद हैं। दानदाताओं के साथ संवाद और नेगोशिएशन की रणनीति इस सोच को बदलने में अहम भूमिका निभा सकती है।झूम खेती के संकट से निकलने का रास्ता कैसे खोज रहे हैं मणिपुर के किसान?
बढ़ती आबादी, भूमि पर बढ़ते दबाव और बदलते पर्यावरण के बीच मणिपुर के किसानों के लिए झूम खेती अब पहले जितनी प्रभावी नहीं रही है। ऐसे में मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ-साथ किसानों की आजीविका बेहतर बनाने के लिए खेती के नए तौर-तरीके अपनाए जा रहे हैं।प्रकृति को बचाने वालों का ख़याल कौन रखेगा?
संरक्षण के काम में जुटे लोग किस कीमत पर इसे अंजाम दे रहे हैं? सीमित संसाधनों के संकट से जूझते संरक्षणकर्मियों का मानसिक स्वास्थ्य भी अब संकट में है।विकलांगता पर काम करने वाली संस्थाओं को फंडिंग क्यों नहीं मिलती?
भारत में सीएसआर फंडिंग का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा विकलांगता क्षेत्र तक पहुंचता है। एक नयी रिपोर्ट बता रही कि है कि इस स्थिति को कैसे बदला जा सकता है।क्या सोशल सेक्टर सवाल पूछने से कतराने लगा है?
जैसे-जैसे गैर-लाभकारी संस्थाओं का प्रभाव बढ़ रहा है, क्या उनकी स्वतंत्र और सवाल उठाने वाली आवाज़ कमज़ोर पड़ती जा रही है?लीक: हमारी सबसे सफल सूचना व्यवस्था
फंडिंग से लेकर सैलरी और एमओयू की शर्तों तक, कुछ सूचनाएं ऐसी होती हैं जो आधिकारिक घोषणा से पहले ही सार्वजनिक संपत्ति बन जाती हैं।