समाजसेवी संस्था
सामाजिक संस्थाओं में कम्युनिकेशन को ‘जुगाड़’ नहीं, व्यवस्था की ज़रूरत है
गैर-लाभकारी संस्थाएं अक्सर कम्युनिकेशन से जुड़ी चुनौतियों का समाधान अधिक लोगों की नियुक्ति करने या एकबारगी कार्यशालाओं में निवेश करने में तलाशती हैं।एक बीमा, एक हेल्थ चेक-अप: क्या ऐसे होती है एनजीओ कर्मचारियों की देखभाल?
जब तक विकास सेक्टर कॉर्पोरेट एचआर नीतियों से हटकर ज़मीनी समुदायों के तौर-तरीके और सामाजिक न्याय के मूल्य नहीं अपनाता, तब तक सामूहिक देखभाल का विचार सिर्फ कागज़ों पर नज़र आएगा।क्योंकि पेड़ बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है पेड़ लगाने की फोटो!
पेड़ लगाने के अभियान अक्सर सुर्खियां बटोरते हैं, लेकिन पेड़ों और जंगलों को बचाने की ज़िम्मेदारी नज़रअंदाज़ कर दी जाती है।गंभीर बीमारी में किसी की देखभाल करने के क्या मायने हैं?
मुंबई में एक काउंसलर और नर्स के जीवन का एक दिन-जहां वे घर-आधारित पैलिएटिव केयर के ज़रिए मरीज़ों और उनके परिवारों को बीमारी, क्षति और अनिश्चितता का सामना गरिमा के साथ करने में सहारा देती हैं।पुरुष-प्रधान पेशे में अपनी राह बनाती महिला ऑटो चालक
चेन्नई की दो महिला ऑटो चालक इस पेशे में महिलाओं के सामने आने वाली बाधाओं, और उन चुनौतियों से लड़ने के लिए शुरू की गई अपनी यूनियन की कहानी साझा कर रही हैं।प्रारंभिक शिक्षा की नींव पर पुनर्विचार
2025 के टीचिंग लर्निंग प्रैक्टिसेज़ सर्वे के अनुसार भागीदारी, लेखन और कक्षा में संवाद का अभाव मूलभूत लर्निंग परिणामों को प्रभावित कर रहा है।सिस्टम में बदलाव: हकीकत से ज़्यादा भ्रम
‘सिस्टम्स चेंज’ के प्रति बढ़ता आकर्षण संस्थाओं की प्राथमिकताओं को असंतुलित और ज़मीनी स्तर पर सार्थक प्रयासों को कमज़ोर बना सकता है।एक लड़की, जिसने हर हाल में शिक्षा को चुना
कर्नाटक के रायचूर की एक युवा फील्ड कोऑर्डिनेटर के जीवन का एक दिन। उसकी उस यात्रा के साथ, जहां वह कभी स्कूल छोड़ने की कगार पर थी, लेकिन आज अपने साथ-साथ अपने परिवार और समुदाय का सहारा बन चुकी है।आया मौसम, अप्रेज़ल का!
तेरा करूं…तेरा करूं दिन-गिन-गिन के इंतजार…महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा रोकने की स्थायी राह कैसे खुलेगी?
लैंगिक असमानताएं सामाजिक और संस्थागत ढांचों में गहराई से जड़ें जमाए हैं। अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाली महिलाएं और लड़कियां हर रोज इसका सामना करती हैं।ग्रामीण भारत में प्लास्टिक कचरे का हिसाब करना क्यों जरूरी है?
ग्रामीण भारत में हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसका आकलन नहीं होता। ऐसे में ग्रामीण स्तर के आंकड़ों को जोड़कर एक सर्कुलर इकॉनमी की नींव रखी जा सकती है।