1. फील्ड वर्कर
धैर्य बनाए रखना और किसी को बताये बिना समस्या सुलझाना।


2. कम्युनिटी मोबिलाइजर
हर हफ्ते नई ट्रेनिंग…पहले ‘सशक्तिकरण’, फिर ‘री-सशक्तिकरण’, फिर ‘ट्रांस-फॉर्मेटिव सशक्तिकरण’। कभी-कभी लगता है, कम्युनिटी से ज्यादा हम ही सशक्त हो रहे हैं।


3. प्रोग्राम मैनेजर
स्टेकहोल्डर एंगेजमेंट, मल्टी-लेवल एप्रोच, ट्रांसफॉर्मेशनल अप्रोच…और इसके बाद एक और पीपीटी जिससे डोनर खुश है, भले ही टीम कन्फ्यूज हो।


4. अकाउंटस ऑफिसर
फील्ड से रसीदें जमा करना, मैनेजमेंट को संतुष्ट करना और फिर भी बजट बचा हो तो एक और ट्रेनिंग का सुझाव देना। कुल मिलाकर आप रसीद और पर्चियों में ही फंसे रहते हो।


5. फाउंडर/डायरेक्टर
हमारी कैपेसिटी मीटिंग में बनती है, फील्ड में नहीं।


6. फंडर
जब फील्ड में कोई मुद्दा हो, डाटा कम मिले, आउटपुट घटे या टीम सवाल पूछे तो केवल एक ही समाधान – कैपेसिटी बिल्डिंग करवा दो।


लेखक के बारे में
- सिद्धार्थ आईडीआर में एडिटोरियल एसोसिएट हैं। इससे पहले वे यूथ की आवाज़ हिन्दी और युवानिया जैसे डिजिटल प्लैटफॉर्म्स के साथ संपादकीय भूमिका में काम कर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने जनसंगठनों के साथ काम करने वाली संस्था श्रुति के साथ लंबे समय तक काम किया है।
- पूजा राठी आईडीआर हिंदी में संपादकीय विश्लेषक (एडिटोरियल एनालिस्ट) हैं। इससे पहले, उन्होंने फेमिनिज़्म इन इंडिया में सह-संपादक के रूप में काम किया है, जहां उन्होंने जेंडर, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को कवर किया। पूजा को यूएन लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया है और वह 2024 की लाडली मीडिया फैलो भी रह चुकी हैं। इसके अलावा, वह खबर लहरिया की रूरल मीडिया फेलोशिप और एटलस फॉर बिहेवियर चेंज इन डेवलपमेंट की बिहेवियरल जर्नलिज़्म फेलोशिप की पूर्व फेलो रह चुकी हैं। पूजा ने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है।



