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साल 2025 में हमने जो किताबें पढ़ीं, वे आपको भी क्यों पढ़नी चाहिए?

विकास सेक्टर के अलग-अलग हिस्सों से जुड़ी कुछ किताबें जिन्हें पढ़ना और जिनसे सीखना आपके काम को थोड़ा और बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकता है।
25 दिसंबर 2025 को प्रकाशित

विकास सेक्टर में काम करने वाली संस्थाएं और लोग अक्सर उन प्रयासों और तरीकों पर जोर देते दिखाई देते हैं जिनसे फटाफाट नतीजे हासिल करने, प्रभावों को मापने और आसानी से दिखाई देने वाले बदलावों तक पहुंचा जा सके। लेकिन इस भागदौड़ में कई बार इस बात की तरफ ध्यान कम ही जाता है कि हम जिन सवालों के जवाब खोज रहे हैं, उन्हें समझने-परखने के लिए हमारी अपनी सोच और समझ कितनी तैयार है। किताबें, शायद इसी ठहराव के लिए गुंजाइश बनाती हैं। इसीलिए हर साल हम कुछ ऐसी किताबों को चुनते, पढ़ते और आपके साथ साझा करते हैं जिनसे हमें उस साल कुछ सवालों के जवाब मिले; इस उम्मीद के साथ कि ये आपको भी कुछ जवाबों तक पहुंचने और उससे आगे बढ़कर कुछ सवालों को पूछने की दिशा में ले जाएंगी। 

आईडीआर हिंदी के इस सालाना लेख में किताबों को चुनते हुए हमारा उद्देश्य यह नहीं था कि हम एक ‘परफेक्ट रीडिंग लिस्ट’ बना सकें। बल्कि यह था कि इसमें कुछ ऐसे नजरियों तक पहुंच सकें जिन तक आमतौर पर हिंदी भाषी कार्यकर्ताओं का पहुंचना उतना सहज नहीं होता है। इस फेहरिश्त में अनुपम मिश्र की किताब ‘साफ़ माथे का समाज’ को रखा गया है जो हमारे अतीत से कुछ सुनहरे सिक्के लेकर वापस हमारी झोली में डाल देती है, वहीं दूसरी और ब्रिटिश लेखिका कैरोलाइन कैरोलाइन क्रियाडो पेरेज़ की अंग्रेजी किताब ‘इनविजिबल वुमन’ को भी शामिल किया गया है जो व्यवस्था में मौजूद लैंगिक भेदभाव के कारणों की आधुनिकतम पड़ताल हैं। अन्य तीन किताबें भी आदिवासी विषयों को लिखे जाने, शहरी विकास की चुनौतियों और शिक्षा के परंपरागत तरीकों पर सवाल उठाते हुए एक नई समझ की बुनियाद बना सकती हैं। 

इन किताबों को आईडीआर के हमारे साथियों ने पढ़ा है और उन पर अपनी टिप्पणियां लिखी हैं जो बताती हैं कि कैसे और क्यों यह किताब किसी विकास सेक्टर कार्यकर्ता के लिए उपयोगी हो सकती है। हम इसमें कितने सफल हुए हैं, आप पढ़कर बताइए:

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

साफ माथे का समाज, लेखक: अनुपम मिश्र

साफ माथे का समाज_किताब

साफ माथे का समाज, जाने-माने गांधीवादी पर्यावरणविद अनुपम मिश्र के 23 लेखों का संकलन है। इनमें सबसे पहली चीज जो ध्यान खींचती है, वह है – इन लेखों के शीर्षक। ऐसा लगता है जैसे इन्हें, आधुनिकता के तेज रफ्तार सफर में पारंपरिक ज्ञान और समझ को पीछे छोड़ देने की मंशा को देखते हुए ‘रियर व्यू मिरर’ की तरह लगाए गया हो। यानी आप आगे तो बढ़ते रहें लेकिन पीछे को भी जानते रहें। आजाद भारत के समय में जो भी विषय, पर्यावरण और समाज के संदर्भ में जरूरी लगते हैं, उन सभी पर स्थिरता से सोचने में यह किताब बहुत सहायता करती है।

पर्यावरण के लगातार बिगड़ते स्वरूप, विकास की संकल्पना, बड़े नतीजों के सतही वादे करने वाली परियोजनाएं और पारंपरिक ज्ञान की अनदेखी, इन सभी पर यह किताब बात करती है। यह ना केवल पर्यावरण पर काम करने वाले लोग, बल्कि सजग और सक्रिय नागरिक होने का विचार रखने वाले हर व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है। विकास क्षेत्र में पश्चिम से उधार ली गयी भाषा से शुरुआत करके ‘जन’ और ‘लोक’ जैसे शब्दों की गहराई न समझ पाने और अपने ही समाज को पिछड़ेपन की उलाहना देने की प्रवृति के विश्लेषण तक यह किताब जाती है। इन सभी के बीच उत्तर बिहार की बाढ़, नर्मदा पर बने बांध से हुई सामाजिक व पर्यावरणीय क्षति, विकास परियोजनाओं को लेकर दूरदर्शिता की कमी और पारंपरिक ज्ञान से मौजूदा मुद्दों का सफलता से हल खोज लेना सहज ही समा जाते हैं।

राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण सही-गलत का पाला सरकार में होने या ना होने पर निर्भर हो जाने और तथ्यों को हाशिये पर रखना आम हो जाने पर यह किताब जरूरी सवाल उठाती है। एक महत्वपूर्ण संदेश जो यह दे जाती है, वह यह कि क्या सारा विकास अभी ही कर लेना है या आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कुछ बचाकर रखना है। और, सबसे महत्वपूर्ण यह कि पारंपरिक ज्ञान को बीते जमाने के तौर-तरीकों के रूप में संग्रह करने वाली वस्तु की तरह नहीं, बल्कि समाधानों के लिए वैज्ञानिक सोच के साथ गूंथकर सहेजा जाना चाहिए। इस किताब को इस लिंक पर जाकर मुफ्त में पढ़ा जा सकता है।

आदिवासी रिपोर्टिंग, लेखक: अंकित अचौरी

आदिवासी रिपोर्टिंग_किताब

आदिवासी रिपोर्टिंग पढ़कर सबसे पहले यह समझ आता है कि आदिवासी समाज को ‘दूर के गांव’ या ‘विकास’ से ‘पीछे रह गया इलाका’ कहकर नहीं समझाया जा सकता है। किताब यह दिखाती है कि आदिवासी जीवन जमीन, जंगल, परिवार, सामुदायिक नियम और स्थानीय राजनीति इन सबके बीच से बनता है। और, यह दुनिया उस तरह काम नहीं करती जिस तरह आम रिपोर्ट, सरकारी योजना या मीडिया की भाषा उसे दिखाती है।

आदिवासी रिपोर्टिंग, किताब में कई कहानियां हैं जहां लोग खनन, सड़क, बांध या वन नियमों के कारण बदलती जिंदगियों के बारे में बताते हैं। एक कहानी में एक गांव बांध के लिए उजड़ रहा है। सरकारी नजर से यह ‘भूमि अधिग्रहण’ है, लेकिन गांव वालों के लिए यह अपने घर, अपने देवस्थल, और अपने समुदाय से जुड़ी यादों को खोना है। यह छोटा सा फर्क बताता है कि विकास का असली असर क्या होता है और वह कागज पर लिखे शब्दों से कितना अलग होता है। इसे पढ़ते हुए बार-बार यह सामने आता है कि बाहरी लोग अक्सर ऐसे समाधान ले आते हैं जो स्थानीय तौर-तरीकों, भाषा या जरूरतों से मेल नहीं खाते हैं। उदाहरण के लिए, किसी जगह स्वास्थ्य केंद्र बनाया गया पर लोग वहां जाने में हिचकते हैं क्योंकि स्टाफ उनकी भाषा नहीं समझता। यह दिखाता है कि योजनाएं सिर्फ इमारतें नहीं, रिश्ते और भरोसा भी मांगती हैं।

विकास सेक्टर में काम करने वालों के लिए यह किताब इसलिए जरूरी है क्योंकि यह याद दिलाती है कि किसी भी समुदाय के साथ काम शुरू करने से पहले उसकी अपनी व्यवस्था और इतिहास को समझना जरूरी है। किताब यह भी सिखाती है कि जिस भाषा में हम किसी समुदाय को वर्णित करते हैं, वही हमारी सोच बना देती है। अगर हम उसे ‘पिछड़ा’ या ‘दूर’ कहेंगे तो हमारी योजना भी वैसी ही बनेगी – ऊपरी और अधूरी। यह किताब बताती है कि आदिवासी इलाकों में काम करने के लिए जरूरी है कि हम पहले यह समझें कि उनका जीवन किन चीजों से चलता है, और उनकी दुनिया पर कौन-सी नीतियां सबसे ज्यादा असर डालती हैं। इसी वजह से यह किताब विकास क्षेत्र का हिस्सा बने किसी भी व्यक्ति के लिए उपयोगी है। 

एक शहर एक पहाड़ एक मोहल्ला, लेखक: अकुंर लेखक समूह

एक शहर एक पहाड़ एक मोहल्ला_किताब

हमने अक्सर पहाड़ों पर शहर बसने की कहानियां सुनी है। लेकिन ‘एक शहर एक पहाड़ एक मोहल्ला’ किताब हमें दिल्ली शहर में ऊंची-इमारतों के बीच एक पहाड़ उगने का किस्सा बताती है। अंकुर लेखक समूह द्वारा प्रकाशित यह किताब दिल्ली के सबसे प्रदूषित इलाके की तलहटी में बसे कई मोहल्लों की कहानी है। इसमें दिल्ली के गाजीपुर स्थित कूड़ा-पहाड़ (लैंडफिल) और अत्यन्त प्रदूषित खिचड़ीपुर में बसी जिंदगियों पर बात की गई है। पांचों खंडों की इस किताब में पर्यावरण प्रदूषण, जन-जीवन, प्राकृतिक ढांचों और अन्य मौलिक अधिकार तो दूर पीने का साफ पानी तक न मिलने की दास्तां को बयां किया गया है। किताब यह भी जिक्र करती है कि कैसे पूरी दिल्ली के लिए खराब कूड़ा यहां के लोगों की आजीविका है।

इस किताब की विषयवस्तु जितनी संजीदा है, भाषा भी उतनी ही रोचक है। खिचड़ीपुर के बच्चों के द्वारा लिखे गए उनके अनुभव आपको बांध देते है जहां आप एक के बाद एक पन्ने पलटने को मजबूर हो जाते हैं। यह किताब बड़े-बड़े मंचों से होने वाले कचरे और पर्यावरण से होने वाले संवादों को भी संदेह की नजर से देखती है। सबसे जरूरी बात, किताब सामने रखती है कि कचरे के ढेर के पास से नाक सिकोड़कर और सांस रोककर आगे बढ़ने वाली, बड़ी आबादी को क्या समझने की जरूरत है।

इस किताब को ‘अंकुर सोसायटी फॉर अल्टरनेटिव्ज इन एजुकेशन’ में लेखन का अभ्यास करने वाले युवा लेखकों ने मिलकर तैयार किया है। ये सभी लेखक खिचड़ीपुर और इसके आसपास के इलाकों में ही रहने वाले हैं। किताब हमारे शहरों के उस अनदेखे चेहरे को सामने लाती है जिसे देखकर सब चुप्पी साध लेते हैं। कचरे की समस्या को अच्छी तरह से उठाने वाली यह किताब इस मुद्दे को समझने का एक बेहतरीन स्रोत भी है। कचरा समस्या के समाधान और प्रबंधन प्रयास किस दिशा में होने चाहिए, इससे जाना जा सकता है। इन सबसे भी जरूरी यह बात कि बच्चों के लिए लिखी गई इस किताब में दिल्ली की ऐतिहासिकता और राजनीतिक परिदृश्य से अलग जमीनी हकीकत के उस पहलू पर बात की गई है जिसे आमतौर पर बच्चों की पहुंच से दूर रखा जाता है। यहां पूछा जा सकता है कि क्या ऐसा सिर्फ इसलिए किया जाता है ताकि सवाल और सजगता दोनों बच्चों से दूर रहें?

असफल स्कूल, लेखक: जॉन होल्ट

असफल स्कूल_किताब

जॉन होल्ट की यह किताब ‘असफल स्कूल’ 1960–70 के दशक की उस शिक्षा व्यवस्था पर आधारित है, जब स्कूलों में अनुशासन, परीक्षाओं और रटने पर जोर बढ़ रहा था, और बच्चों की जिज्ञासा व अनुभव आधारित सीखने की उपेक्षा हो रही थी। बच्चों, माता-पिता और शिक्षकों से बातचीत तथा अपने अनुभवों के आधार पर होल्ट बताते हैं कि स्कूल अक्सर बच्चों को सशक्त बनाने के बजाय अक्सर उन्हें डर, असफलता और निर्भरता की तरफ धकेल देते हैं। लेखक कहते हैं कि इस शिक्षा पद्धति में बच्चे सही जवाब देने को ही असली उद्देश्य समझने लगते हैं। उन्हें लगने लगता है कि शिक्षा का केंद्र समझ, अनुभव और जिज्ञासा नहीं, बल्कि प्रदर्शन जैसे ज्यादा अंक, सही जवाब, और ‘अच्छे बच्चे’ की छवि बनाना होता है। इससे बच्चों का ध्यान सीखने से हटकर इस बात पर टिक जाता है कि कैसे डांट, अपमान और असफलता से बचा जाए। किताब समझाती है कि स्कूलों में सीखने में सबसे बड़ी बाधा ‘डर’ यानी गलत जवाब देने का डर, मजाक उड़ाए जाने का डर और कमजोर साबित होने का डर है। यह डर बच्चे की स्वाभाविक जिज्ञासा को भीतर ही भीतर खत्म कर देता है। डर का माहौल बच्चे को सवाल पूछने, प्रयोग करने और नई चीजें आजमाने से रोकता है, जिससे वह सुरक्षित, रटने वाले रास्ते चुनने लगता है। धीरे-धीरे सीखना उसके लिए आनंद नहीं, दबाव बन जाता है।

होल्ट का एक केंद्रीय तर्क यह है कि परीक्षाएं और अंक सीखने को सतही बनाते हैं। जब सफलता का माप सिर्फ अंकों पर टिका हो तो प्रतियोगिता बढ़ती है और विषय की गहरी समझ कमजोर पड़ जाती है। बच्चे सीखने की बजाय नंबर लाने की योजनाएं बनाते हैं और शिक्षा तनाव का रूप ले लेती है।

विकास सेक्टर में शिक्षा से जुड़े काम करने वाले लोग इस किताब से यह समझ बना सकते हैं कि उनके प्रयास किस दिशा में होने चाहिए। क्यों बच्चों को सवाल पूछने, गलती करने, खोजने और अपनी रुचि के आधार पर सीखने की दिशा चुनने की आजादी मिलनी चाहिए। स्कूलों में कैसे बच्चों की जिज्ञासा, भरोसे, अनुभव और स्वायत्तता को केंद्र में रखना जाना चाहिए, जहां शिक्षक गाइड की भूमिका निभायें और सीखना जीवन से जुड़ा अनुभव बने। यह किताब मजबूती से समझाती है कि बच्चे जन्म से सीखने में सक्षम होते हैं; शिक्षा का काम उस क्षमता को दबाना नहीं, बल्कि उसे मजबूत करना है।

इनविजिबल वुमन, लेखिका: कैरोलाइन क्रियाडो पेरेज़

इनविजिबल वुमन_किताब

ब्रिटिश लेखिका, कैरोलाइन क्रियाडो पेरेज़ की 2019 में प्रकाशित ‘इनविजिबल वुमन’ आंकड़ों में भेदभाव की बात करती है। यह सवाल उठाती है कि आमतौर पर सामान्य और मानक माने जाने वाली बातों को तय करते हुए, महिलाओं को ध्यान में क्यों नहीं रखा जाता है। किताब बताती है कि हमारी दुनिया की छोटी-बड़ी तमाम व्यवस्थाएं ज्यादातर बार उन आंकड़ों पर आधारित होती हैं, जो पुरुषों पर हुए अध्ययनों से एकत्र किए गए होते हैं। इस तरह की व्यवस्था में आमतौर पर महिलाओं की जरूरतें या तो दर्ज ही नहीं होतीं हैं या उन्हें ‘अपवाद’ मान लिया जाता है। यह किताब दवाओं, शहरी योजनाओं, ट्रांसपोर्ट, तकनीक और कामकाजी नीतियों के उदाहरणों के जरिए बताती है कि जेंडर डेटा गैप के कारण किस तरह की कमियां रह जाती हैं। और, फिर इनकी वजह से महिलाएं रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे अधिक जोखिम, असुविधा और असमानता झेलती हैं। घरेलू और देखभाल के कामों को, जो अधिकतर महिलाएं करती हैं, न तो ठीक से गिना जाता है और न ही यह नीतियों में दिखाई देता है।

‘इनविजिबल वुमन’ को पढ़कर यह समझ बनती है कि असमानता हमेशा जानबूझकर नहीं होती – कई बार वह गलत या आधे-अधूरे आंकड़ों के चलते भी हो सकती है। यहां इस बात का भी जिक्र किया गया है कि जब नीति या सिस्टम ‘एवरेज यूजर’ की बात करता है तो वह अक्सर पुरुष होता है। इससे ऊपरी तौर पर जेंडर-न्यूट्रल दिखने वाले फैसले भी असल में महिलाओं के लिए उतने निष्पक्ष नहीं होते बल्कि कई बार तो नुकसानदेह ही साबित होते हैं। कुल मिलाकर, यह किताब आपको दुनियाभर के उदाहरणों से बताती हैं कि जो आंकड़ों में अनुपस्थित है, वह नीतियों में भी अदृश्य रह जाता है।

डेवलपमेंट सेक्टर में काम करने वालों को यह किताब इसलिए पढ़नी चाहिए क्योंकि यह बेहतर प्रोग्राम डिजाइन, फील्डवर्क और पॉलिसी एडवोकेसी के लिहाज से आपकी समझ बनाती है। यह समझ आपको जरूरी और अलग सवाल पूछने की दिशा में ले जाते हैं। किताब आपका ध्यान इस बात की तरफ भी खींचती है कि आंकड़े दर्ज करते हुए कौन छूट रहा है और क्यों छूट रहा है। यह याद दिलाती है कि केवल नेक इरादे रखना भर काफी नहीं होता है। जब तक आंकड़ों में महिलाओं की जिंदगी और उनके खर्च होने वाले वक्त को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक हस्तक्षेप और समाधान अधूरे ही रहेंगे।

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