बहेड़ा, कालमेघ और कांगड़ा के एक गांव में भरोसे की शुरुआत

यह बात वर्ष 2000 के शुरुआती दिनों की है, जब हमने कांगड़ा जिले के रेत ब्लॉक में जागोरी का हिमाचल कार्यालय शुरू किया था। वह बिल्कुल अलग दौर था। तब पूरे इलाके में बहुत कम संगठन थे और स्थानीय लोगों के बीच गैर-सरकारी संस्थाओं और फील्ड में काम करने वालों को लेकर काफी शंका रहती थी।
हम 18 से 22 साल की कुछ युवा लड़कियों का एक समूह थे। हमें गांवों में सर्वे करने और समुदाय के साथ रिश्ते बनाने का जिम्मा सौंपा गया था। लेकिन हमने जैसा सोचा था, यह काम उतना आसान नहीं था। हम खुद गांव से थे, लेकिन फिर भी ग्रामीणों के बीच अपनी बात रखने और उन्हें कुछ समझाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी।
ग्रामीणों का सरकारी कर्मचारियों के साथ बहुत अच्छा अनुभव नहीं था। वे लोगों से जानकारी तो इकट्ठा कर लेते थे, लेकिन बाद में न लौटकर आते थे और न ही किसी समस्या का समाधान होता था। इस वजह से लोग हमसे भी बात करने से कतराते थे। साथ ही हम सब महिला होने के साथ-साथ युवा भी थी, इसलिए हमें गंभीरता से नहीं लिया जाता था।
ऐसे में हमने सोचा कि शायद बुजुर्गों से बात करना थोड़ा आसान होगा। हम गांव के बड़े-बूढ़ों के पास बैठकर उनकी बातें और जिंदगी के किस्से सुनने लगे।
बुजुर्ग अक्सर कई तरह की शिकायतें करते थे, लेकिन एक बात बार-बार सामने आती थी कि आजकल हर छोटी-बड़ी बीमारी के लिए लोग सीधे अस्पताल भागने लगे हैं। वे बताते थे कि उनके जमाने में सर्दी, पेट दर्द, बुखार जैसी आम बीमारियों के लिए घर में ही नुस्खे हुआ करते थे। स्थानीय पौधों, जड़ी-बूटियों और फूलों से इलाज किया जाता था। लेकिन समय के साथ ये घरेलू नुस्खे हिमाचल के कई घरों से गायब हो गए।
यहीं से हमारे मन में एक विचार आया। हमने तय किया कि क्यों न गांव के बुजुर्गों से ये पारंपरिक नुस्खे इकट्ठा किए जाएं? हम घर-घर गए, बुजुर्गों से बात की और उनके नुस्खों को लिखना शुरू किया। फिर हमने उन्हें एक छोटी सी किताब के रूप में संकलित किया।
उदाहरण के लिए, कई बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि बहेड़ा एक भूरे रंग का फल होता है, जिसे आमतौर पर लोग उसके रंग की वजह से खास पसंद नहीं करते। लेकिन इस फल का स्वाद मीठा होता है और इसका छिलका चूसने से खांसी में सुधार होता है। बहेड़ा की गुठली के अंदर का हिस्सा चूर्ण बनाकर उपयोग किया जा सकता है, जो पथरी में फायदा पहुंचाता है। ऐसे ही कालमेघ का पौधा, जो स्वाद में कड़वा होता है पर इसमें खून साफ करने के गुण होते है। इसका काढ़ा लीवर संबंधित बीमारी में आराम पहुंचाता है। ऐसी कई स्थानीय मान्यताएं हमने दर्ज की।
जब हमने यह पारंपरिक नुस्खों की किताब गांव के लोगों में बांटनी शुरू की, तो हमारे प्रति उनका रवैया बदलने लगा। उन्हेंसमझ आया कि हम सिर्फ जानकारी लेने नहीं आए हैं, बल्कि उनके ज्ञान और अनुभव को महत्व देते हैं और उनके साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।
धीरे-धीरे लोग हमसे खुलकर बात करने लगे और बैठकों में भी शामिल होने लगे। हमें यह भी समझ में आया कि महिलाओं से शाम के समय बात करना ज्यादा आसान होता है। तब तक वे दिनभर के काम से निपट चुकी होती हैं। हम उनसे बात करते हुए घर के सदस्यों की तरह घुल-मिल जाते थे। कभी उनके बालों में तेल लगा देते थे, तो कभी सब्जियां काटने में उनका हाथ बंटा देते थे। इस तरह बातचीत अपने आप सहज हो जाती थी।
समय के साथ गांव में हमारी पहचान बनती गयी और लोग हम पर भरोसा करने लगे।
आज कांगड़ा और आसपास के इलाकों में कई नए गैर-सरकारी संगठन काम कर रहे हैं। लेकिन समुदाय के साथ भरोसा बनाना आज भी पहला और सबसे जरूरी कदम है। हमारे अनुभव ने हमें सिखाया कि आप जब भी किसी नए ब्लॉक में काम शुरू करते हैं, तो ऐसे ही छोटे लेकिन सार्थक प्रयास सबसे ज्यादा कारगर साबित होते हैं।
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लेखक के बारे में
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आशा 25 वर्षों से जागोरी संस्था के साथ हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में काम कर रही हैं। वह स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर लिंग आधारित जागरूकता कार्यक्रम (जेंडर अवेयरनेस प्रोग्राम), रोजगार, किशोर-किशोरी स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों के संचालन में प्रमुख भूमिका निभाती हैं।