लैंगिक विषय

आईडीआर इंटरव्यूज़ | ए रेवती

ट्रांस महिला के रूप में अपनी पहचान अपनाने से लेकर जमातों तक—ए. रेवती बता रही हैं कि उन्होंने समुदाय को एकजुट करना और थिएटर व लेखन के ज़रिए अपने दिल की बात कहना कैसे सीखा।
अन्य भाषाओं में पढ़ें:
हिंदी
IDR Hindi Instagram

ए रेवती तमिलनाडु की रहने वाली लेखिका, अभिनेत्री और ट्रांस अधिकार कार्यकर्ता हैं। उन्होंने 1990 के दशक के आखिर से सेक्शुअल और जेंडर अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाले सिविल सोसाइटी संगठनों (सीएसओ) के साथ काम किया है। वह आवर लाइव्स, आवर वर्ड्स (2006), द ट्रुथ अबाउट मी (2010) और अ लाइफ इन ट्रांस एक्टिविज़्म (2016) जैसी किताबों की लेखिका हैं, जिसमें उनकी जीवन-कथा दर्ज की गई है। उन्होंने अपने जीवन पर आधारित एकल नाटक वेल्लै मोज़ी लिखा और उसमें अभिनय किया है, जिसका वह भारत और विदेश के कई हिस्सों में मंचन कर चुकी हैं। फिलहाल वह नुगम कलैक्कूडम नाम का एक थिएटर ग्रुप चलाती हैं, जो ग्रामीण लोक कलाओं को बढ़ावा देता है और नए कलाकारों को प्रशिक्षण देता है।

आईडीआर के साथ इस इंटरव्यू में रेवती अपनी पहचान को स्वीकार करने, जमातों (सामुदायिक समूहों) में दूसरे ट्रांस लोगों के साथ अपनेपन को समझने और समुदाय के हित के लिए विकास सेक्टर के भीतर और बाहर काम करने के अपने अनुभव साझा कर रही हैं। वह क्वीयर लोगों को एक साझा मंच के तहत संगठित करने की ज़रूरत पर बात करती हैं। साथ ही, वह आत्म-अभिव्यक्ति के लिए कला की अहमियत पर विस्तार से चर्चा करती हैं और बताती हैं कि वह जिस तरह बोलती हैं, उसी तरह लिखना क्यों पसंद करती हैं।

क्या आप हमें एक्टिविस्ट बनने से पहले की अपनी ज़िंदगी के बारे में बता सकती हैं?

मेरा जन्म तमिलनाडु के नामक्कल जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। चूंकि समाज और कानून, दोनों ही ट्रांसजेंडर लोगों को असामान्य मानते थे, इसलिए युवावस्था में मुझे अपनी महिला पहचान को अपनाना गलत लगता था और इसके लिए अपराधबोध महसूस होता था। अपनी बात और भावनाओं को व्यक्त करने का मेरे पास कला के अलावा कोई और ज़रिया नहीं था। मैं महिलाओं की वेशभूषा में नाटकों और मरिअम्मन उत्सव जैसे धार्मिक आयोजनों में परफॉर्म करती थी। हालांकि, मुझे अपने ही घर और गांव में स्वीकार किए जाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा।

जब मैं 14–15 साल की थी, तो किसी ने मुझे बताया कि मेरे जैसे और भी ट्रांस लोग हैं, जिनके अनुभव भी मेरे जैसे ही हैं और वे नामक्कल किले में मिलते हैं। जब मैं वहां गई और उनसे मिली, तो यह देखकर हैरान रह गई कि वहां ऐसे लोगों का पूरा समुदाय था, जिनकी पहचान एक जैसी थी और जो नारीवादी आत्मीयता की एक साझा भाषा समझते थे। उन्होंने मुझे बताया कि अगर मैं दिल्ली जाऊं, तो वहां एक पूरी जमात है, जहां मैं स्वतंत्र रूप से रह सकती हूं।

मैं अपना घर छोड़कर निकल गई। मेरे पास उस समय स्कूल की यूनिफॉर्म और किताबें थी। मुझे लगता था कि शायद मैं अपनी पढ़ाई पूरी करूंगी। लेकिन इसके बजाय मैंने घर-घर जाकर पैसे मांगना सीखा। जमात के गुरुओं ने मुझे सिखाया कि इसे भीख मांगना नहीं, बल्कि बराबरी का सौदा समझना चाहिए, जहां मैं हर पैसे के बदले आशीर्वाद देती थी। अपने आसपास के कई दूसरे लोगों की तरह मैं भी जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी करवाना चाहती थी और इसकी तलाश मुझे मुंबई ले गई। उस शहर की सड़कों पर भीख मांगकर मैंने अपनी सर्जरी के लिए पैसे जुटाए। इसी दौरान मुझे कई सदमों से गुज़रना पड़ा। मुझे एहसास हुआ कि ट्रांस लोगों के पास अक्सर इन अनुभवों को साझा करने वाला कोई नहीं होता। उनके पास न कोई ऐसा होता है जो अपनापन और देखभाल तलाशने के एक मुश्किल सफर में उनका मार्गदर्शन करे, न ही कोई ऐसा जो उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में मदद करे। तब तक मेरी मुलाकात कुछ एक्टिविस्टों और कम उम्र के ट्रांस लोगों से हो चुकी थी, जो सिविल सोसाइटी के क्षेत्र में हमारे मुद्दों पर काम करने वाले लोगों को जानते थे। मैं उनके साथ जुड़ना चाहती थी।

वर्ष 2000 में मैंने संगमा में काम शुरू किया। यह एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो जेंडर और सेक्शुअल अल्पसंख्यकों के साथ काम करती है। मैंने वहां 2500 रुपये महीने की तनख्वाह पर डॉक्यूमेंटेशन असिस्टेंट के तौर पर काम शुरू किया।

संगमा में मेरा अक्सर दलित और आदिवासी समुदायों के लोगों से संवाद होता था। उनके आंदोलनों के बारे में जानने से मेरा अपनी ज़िंदगी को समझने का नज़रिया बदल गया। मैंने देखा कि सरकार और समाज लगातार उनके अधिकार छीनते रहे, फिर भी ये समुदाय अपने हक की लड़ाई से पीछे नहीं हटे। मैंने सोचा कि अगर वे अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं, तो ट्रांस समुदाय को भी अपनी लड़ाई लड़नी चाहिए। हमें अपनी शिक्षा, रोज़गार और स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार के लिए आवाज़ उठानी चाहिए।

अपने अधिकारों के लिए लड़ना मैंने खुद से बड़े और छोटे, दोनों उम्र के लोगों से सीखा है और आज भी सीख रही हूं। मैं खुद को फेमिनिस्ट नहीं कहती, लेकिन फेमिनिस्टों से मैंने सीखा कि जेंडर या भाषा चाहे जो भी हो, हर किसी को समान अधिकार मिलने चाहिए। लेखिका और एक्टिविस्ट गौरी लंकेश और दु सरस्वती, सोशल वर्कर शकुन मोहिनी और मधु भूषण—इन सभी ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया। संगमा के संस्थापक मनोहर एलवर्थी ने मुझे नेतृत्व करना सिखाया। उन्होंने यह भी सिखाया कि सोशल वर्क में कोई शॉर्टकट नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि एक गैर-लाभकारी संस्था चलाने के लिए किसी कॉरपोरेट कंपनी में काम करने से कहीं ज़्यादा समर्पण की ज़रूरत होती है। मैंने जमात की उस आत्मीयता से भी बहुत सीखा, जिसने मुझे एकजुटता का मतलब समझाया और मुझे एक छत दी।

जेंडर या भाषा चाहे जो भी हो, हर किसी को समान अधिकार मिलने चाहिए।

जमात प्रथा क्या है और समय के साथ इसमें किस तरह बदलाव आया है?

ट्रांस लोगों के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा कभी दर्ज ही नहीं किया गया और वह सिर्फ मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा है। इसलिए मैं वही बता रही हूं, जो मैंने ख़ुद सुना है। तमिलनाडु में शुरुआती दौर में देवराडियार हुआ करती थी, जो देवताओं के लिए नृत्य करती थी और खुद को उनसे विवाहित मानती थी। इसलिए वह शादी नहीं कर सकती थी। ट्रांस महिलाएं उनके साथ काम करती थी, उनके साथ नृत्य करती थी या नृत्य की ताल बोलती थी। फिर वर्ष 1947 में मद्रास सरकार ने देवदासी प्रथा पर रोक लगाने वाला कानून बनाया। इसके बाद इस व्यवस्था पर निर्भर ट्रांस लोगों से रातोंरात उनका सहारा छिन गया। उस समय एक देवदासी मां आगे आई और जमात प्रथा की नींव रखी। इस ढांचे में अगर कोई आपके पास मदद के लिए आता है, तो आप उसका सहारा बनते हैं और एक परिवार की तरह साथ रहते हैं। जमात की इस मूल सोच के कारण ही आज मेरी अपनी बेटियां, नातिनें और परनातिनें हैं।

जमात के भीतर गुरु अपने चेले/शिष्य को जीवन जीने का तरीका सिखाते हैं—कौन-सा काम करना है, साड़ी कैसे पहननी है और किस तरह बात करनी है। अगर किसी गुरु के साथ कोई समस्या हो जाए, तो चेला जमात के भीतर किसी दूसरे घराने में जा सकता है। अगर किसी का अपने गुरु से विवाद हो जाए और वह पूरी तरह जमात छोड़ने का फैसला करे, तो जाने से पहले उसे मुआवजा देना पड़ता है।

जब से मैंने जमात में कदम रखा है, तब से इसमें बहुत बदलाव आया है। इसे जोड़े रखने वाला प्यार आज भी मौजूद है, लेकिन उसके साथ एक तरह का शोषण भी देखने को मिलता है। कुछ लोग अब इसे एक कारोबार की तरह चलाते हैं। हालांकि, बहुत कुछ बेहतर भी हुआ है। अब कई लोगों को न तो भीख मांगनी पड़ती है, न सेक्स वर्क करना पड़ता है। वे अपनी आजीविका के लिए इडली की दुकान जैसे छोटे कारोबार चला सकते हैं। लेकिन यह बदलाव धीरे-धीरे आ रहा है।

जमात के भीतर अक्सर एक डर की भावना भी बनी रहती है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि वे खुद एक हाशिए की व्यवस्था के भीतर काम करते हैं। एक्टिविज़्म के शुरुआती दिनों में मुझे अक्सर जमात के साथ कई मुश्किल विषयों पर बातचीत करनी पड़ती थी। खासकर तब, जब हमारे लोगों के साथ पुलिस की बदसलूकी को लेकर मेरा पुलिस से टकराव होता था। गुरु और दूसरे लोग मुझसे कहते थे, “तुम तो बोलकर और अखबारों में अपनी बात छपवाकर चलती बनोगी। लेकिन हमारे बच्चों को तो यहीं रहना है।” ऐसे में मुझे उन्हें समझाना पड़ता था कि अपनी आवाज़ उठाकर ही हम अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकते हैं।

1947 में मद्रास सरकार ने देवदासी प्रथा पर रोक लगाने वाला कानून बनाया। इसके बाद इस व्यवस्था पर निर्भर ट्रांस लोगों से रातोंरात उनका सहारा छिन गया।

क्या आप हमें सोशल सेक्टर में अपने सफर के बारे में बता सकती हैं?

मेरे मन में हमेशा से ऑफिस में काम करने की इच्छा थी। मैं कभी सेक्स वर्क नहीं करना चाहती थी और न ही सड़कों पर भीख मांगना चाहती थी।

हम अपनी व्यक्तिगत हैसियत में जो क्राइसिस इंटरवेंशन का काम करते थे, उससे मुझे पहले ही कुछ हुनर हासिल हो गए थे। हमारी ज़िंदगी हर दिन संघर्ष से भरी थी और कानून और समाज, दोनों हमारे खिलाफ थे। हमारे साथ कोई वकील भी हो, तब भी पुलिस थाने में हमारे खिलाफ झूठे मामले दर्ज किए जा सकते थे। हमने एकजुट होकर इन मुश्किलों का सामना किया और अपनी असहमति की आवाज़ उठाते रहे। इस तरह, संगमा से जुड़ने से पहले भी मैं हमेशा ज़मीनी स्तर पर सक्रिय थी।

हालांकि मैंने डॉक्यूमेंटेशन एसोसिएट के तौर पर काम शुरू किया था, लेकिन मैं लगातार ज़मीनी स्तर पर काम करने के मौके तलाशती रहती थी। वर्ष 2002 में मैं केरल गई। उस समय वहां ट्रांसजेंडर लोगों को सार्वजनिक जगहों पर साड़ी पहनने के लिए मज़ाक और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। हम साड़ी पहनकर रैलियां निकालते थे और लोग हमें ऐसे देखते थे, जैसे हम किसी दूसरे ग्रह से आए हों। हमेशा डर बना रहता था कि कहीं हमारे साथ मारपीट न हो जाए। मैंने कई साल पुलिस थानों में सेंसेटाइज़ेशन (संवेदनशील व्यवहार) का काम किया और लोगों को समझाया कि ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार होना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने काम की वजह से मैं संगमा में स्मॉल-टाउन कोऑर्डिनेटर बनी और बाद में डायरेक्टर के पद तक पहुंची। वर्ष 2010 में मैंने संस्था छोड़ दी।

इतने विविध और अलग-अलग पहचानों वाले ट्रांस समुदाय को साझा मुद्दों पर एकजुट करना कितना आसान या मुश्किल है?

समुदाय के भीतर कई अलग-अलग पहचानें हैं और हर पहचान के साथ संघर्ष का अपना अलग बोझ जुड़ा है। सवर्ण और अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को अपेक्षाकृत कम बाधाओं का सामना करना पड़ता है। वहीं, ट्रांस पुरुष और ट्रांस महिलाएं, खासकर वे जो अंग्रेज़ी नहीं बोलते, सबसे ज्यादा हिंसा का शिकार बनते हैं। शुरुआत में भारत का महिला आंदोलन भी हमें अपने दायरे से बाहर रखता था। ऐसे में हमें साझा ज़मीन तलाशने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी। हाशिए पर मौजूद अलग-अलग पहचानों के लिए एक-दूसरे के साथ संवाद करना ज़रूरी है, ताकि जागरूकता बढ़े और आपसी एकजुटता मज़बूत हो।

शुरुआत में ज़्यादातर ट्रांस महिलाएं ही खुलकर सामने आई और अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरी। ट्रांस पुरुषों को इसमें ज़्यादा समय लगा, क्योंकि उन्हें समाज की अलग तरह की पाबंदियों और दबावों का सामना करना पड़ता है। एक पितृसत्तात्मक समाज में उन्हें बहुत कम उम्र से ही महिलाओं की भूमिका निभाने के लिए मजबूर किया जाता है। कई लोगों की कम उम्र में ही शादी भी कर दी जाती है। ट्रांस महिलाओं ने देशभर में जमात का एक नेटवर्क खड़ा किया था, जिसने हमें सहारा दिया। ट्रांस पुरुषों के पास ऐसा कोई नेटवर्क नहीं था और इस सहारा देने वाली व्यवस्था के अभाव में कई लोग अपना घर तक नहीं छोड़ पाते थे।

संगमा में हम खास तौर पर ट्रांस पुरुषों के लिए क्राइसिस इंटरवेंशन चलाते थे। हम उनके लिए तीन महीने के लिए रहने की जगह का इंतज़ाम करते थे। इस दौरान वे स्थानीय भाषा सीखते और काम तलाशते थे। इनमें से कई लोग केरल से आते थे, अक्सर अपने पार्टनर के साथ, और हम उन्हें साथ ही समुदाय से जोड़ते थे। उन्होंने अपना स्वतंत्र काम भी शुरू किया। कुछ लोगों ने बेकरी खोली। मैंने भी अपनी तरफ से जितनी मदद कर सकती थी, की—घर का सामान खरीदने से लेकर किराया देने तक।

ट्रांस पुरुषों को पूरी तरह स्वीकार किए जाने में भी हमें काफी मेहनत करनी पड़ी और आज भी इस आंदोलन के भीतर इस बात को लेकर मतभेद हैं कि नॉन-बाइनरी लोगों को भी उसी तरह स्वीकार किया जाना चाहिए या नहीं। लेकिन सच्चाई यह है कि हममें से कोई भी एक-दूसरे से अलग नहीं है। हम सभी एक ही साझा दायरे का हिस्सा हैं।

ट्रांस समुदाय को बेहतर सहयोग देने के लिए सिविल सोसाइटी क्या कर सकती है?

सिविल सोसाइटी संगठन (सीएसओ) ट्रांस समुदाय की आवाज़ और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी के अधिकार का सम्मान करके उन्हें बेहतर सहयोग दे सकते हैं। ट्रांस लोगों को सिर्फ लाभार्थी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। कार्यक्रमों को तैयार करने और उन्हें लागू करने में भी उन्हें शामिल किया जाना चाहिए और नेतृत्व के अवसर दिए जाने चाहिए।

ये संगठन स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम चला सकते हैं, ताकि छात्र और शिक्षक अलग-अलग जेंडर पहचानों और ट्रांस लोगों के जीवन के वास्तविक अनुभवों को समझ सकें। स्कूलों को सुरक्षित और समावेशी जगहों में बदला जाना चाहिए, जहां ट्रांस छात्रों को बुलिंग, अपमान और भेदभाव से बचाया जाए। ऐसे अनुभवों की वजह से कई छात्र पढ़ाई तक छोड़ देते हैं।

सीएसओ सरकारी अधिकारियों के लिए ट्रांस लोगों के अधिकारों पर सेंसेटाइज़ेशन और ट्रेनिंग कार्यक्रम चला सकते हैं, ताकि अधिकारी समुदाय को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंचने में मदद कर सकें। जब ट्रांस लोग पहचान दस्तावेज़, प्रमाणपत्र, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ या दूसरी सरकारी सेवाओं के लिए आवेदन करें, तो उनके साथ सम्मान और गरिमा से पेश आना चाहिए।

इसके अलावा, वे डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को ट्रांस लोगों की खास स्वास्थ्य ज़रूरतों के बारे में भी संवेदनशील और प्रशिक्षित बना सकते हैं। स्वास्थ्य सेवाएं सम्मानजनक, बिना किसी पूर्वाग्रह के, गोपनीय और भेदभाव से मुक्त होनी चाहिए।

सबसे अहम बात यह है कि सीएसओ को सरकारी संस्थाओं, निजी कंपनियों और गैर-लाभकारी संगठनों में ट्रांस लोगों के लिए समान और निष्पक्ष रोज़गार के अवसरों की पैरवी करनी चाहिए। ट्रांस लोगों को स्थिर, सुरक्षित और सम्मानजनक रोज़गार के अवसर मिलने चाहिए, जिसमें जहां संभव हो, स्थायी पद भी शामिल हों। उन्हें कार्यस्थल पर भेदभाव और उत्पीड़न से सुरक्षा की भी गारंटी मिलनी चाहिए। समुदाय के जीवन के वास्तविक अनुभवों और ज्ञान का सम्मान किया जाना चाहिए। उन संगठनों तथा कार्यक्रमों में नेतृत्व की सार्थक भूमिकाएं निभाने के अवसर दिए जाने चाहिए, जो सीधे उनके जीवन को प्रभावित करते हैं।

आप कला के साथ अपने रिश्ते को किस तरह बयान करेंगी?

जब समाज ने भी मुझे एक महिला के रूप में स्वीकार नहीं किया था, तब परफॉर्मेंस आर्ट ही मेरे लिए अपनी पहचान और भावनाओं को व्यक्त करने का एकमात्र ज़रिया था। एक्टिविस्ट बनने के बाद मैं कुछ समय के लिए थिएटर से दूर हो गई थी, लेकिन 2000 के दशक के आखिर में फिर उसकी ओर लौट आई। भारत के थिएटर जगत में ट्रांस लोगों को जगह दिलाने की प्रक्रिया काफी लंबी और संघर्षपूर्ण रही है। हालांकि मेरा मानना है कि जेंडर को लेकर समाज में संवाद शुरू करने में थिएटर की अहम भूमिका हो सकती है।

दशकों से हम स्कूलों में जेंडर और सेक्शुअलिटी से जुड़े पाठ पढ़ाए जाने की मांग करते रहे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि बच्चों के पास अपनी पहचान से जुड़ी भावनाओं को समझने और उन्हें तलाशने के लिए न तो कोई पाठ्यक्रम है, न ही प्रशिक्षित शिक्षक। हाल के वर्षों में ही हालात बदलने शुरू हुए हैं। वर्ष 2023 से मैं सरकारी स्कूलों में कक्षा 8 से 12 तक के छात्रों के लिए अपना नाटक वेल्लै मोज़ी परफॉर्म कर रही हूं और इसके साथ वर्कशॉप भी आयोजित करती हूं। यह देखकर खुशी होती है कि ट्रांस समुदाय के भीतर अब ज़्यादा लोग लेखक और थिएटर आर्टिस्ट के तौर पर सामने आ रहे हैं।

यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि हमारे समुदाय के साथ काम करने वाले डायरेक्टर बहुत कम हैं और आज भी हमें थिएटर में जगह और मंच तलाशने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड या कलैमामणि अवॉर्ड जैसे सम्मान, जो सिस-जेंडर समुदाय तक आसानी से पहुंच जाते हैं, हम तक बमुश्किल पहुंचते हैं।

जहां तक लेखन की बात है, मैं उसी तरह लिखती हूं जैसे बोलती हूं—बिना व्याकरण के हठधर्मी नियमों की चिंता किए। इसे लोग वेल्लंधिया (बेबाक भाषा) कहते हैं। आवर लाइव्स, आवर वर्ड्स लिखने के लिए मैंने सामान्य इंटरव्यू नहीं किए थे। मैं किसी व्यक्ति के साथ पांच-छह दिन रहती, उनके साथ परिवार की तरह खाना बनाती और बातचीत करती, अपनी ज़िंदगी उनके साथ साझा करती और उनकी ज़िंदगी के बारे में पूछती। फिर उनकी बातों को शब्द-दर-शब्द उतारने के बजाय, अपने शब्दों में लिखती। पेरुमल मुरुगन और दूसरे लोगों ने मेरी लेखन शैली को बेहतर बनाने में मेरी खासी मदद की। उन्होंने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि मैंने जो लिखा है उसे नरम करूं या उसे ज्यादा स्वीकार्य बनाने के लिए उसकी धार कम कर दूं।

शिक्षा ही हमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार और आत्मविश्वास देती है।

अब पीठ के दर्द की वजह से मैं ज़्यादा लिख नहीं पाती, इसलिए अपने विचारों को आगे ले जाने के लिए थिएटर का सहारा लेती हूं। साहित्यिक जगत से मेरी हमेशा एक शिकायत रही है कि जब हमारे समुदाय से बाहर का कोई व्यक्ति मेरी किताब का रूपांतरण या अनुवाद करता है, तो पुरस्कार उसे मिलता है, मुझे नहीं। फिर भी, मुझे खुशी है कि मुझे दुनिया भर से थोड़ी-बहुत पहचान मिली है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी की बटलर लाइब्रेरी ने मेरा नाम माया एंजेलो के नाम के साथ दर्ज किया है और वहां मेरी किताबें भी रखी हैं।

आप हमारे पाठकों के साथ कौन-सी एक सलाह बांटना चाहेंगी?

मैं युवा ट्रांस लोगों से कहना चाहूंगी कि वे दोबारा पढ़ाई शुरू करें। अगर घर छोड़ने की वजह से आपको पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी है, तो किसी भी तरह उसे दोबारा शुरू करने का रास्ता तलाशें। शिक्षा ही हमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार और आत्मविश्वास देती है। जिन लोगों ने हमें घर से निकाल दिया था, एक दिन उन्हें हमें कलेक्टर, डॉक्टर और जज के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। मेरे जैसे लोगों ने 35 साल तक संघर्ष किया है, ताकि आज आप खुलकर अपनी बात कह सकें। इसी संघर्ष की वजह से आज मुझे अपने नाटकों के लिए ज़्यूरिख, लंदन और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बुलाया जाता है।

समाज से मेरी सिर्फ इतनी गुज़ारिश है कि वह ट्रांस समुदाय को इंसान के रूप में सम्मान दे। परिवारों को अपने बच्चों को ठुकराने या उनसे दूरी बनाने के बजाय प्यार, गरिमा और सम्मान के साथ स्वीकार करना चाहिए। परिवार से मिलने वाली स्वीकृति ट्रांस लोगों की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव ला सकती है।

सरकार से मेरी मांग है कि शिक्षा और रोज़गार में ट्रांस लोगों के लिए आरक्षण दिया जाए। उन्हें स्थायी नौकरियां दी जाएं, जिनमें छुट्टियों का प्रावधान हो। इसके अलावा सर्जरी के बाद स्वस्थ होने के लिए रिकवरी लीव भी मिले और रिटायरमेंट के बाद पेंशन भी।

–

अधिक जानें

  • जानिए, ट्रांसजेंडर महिलाओं को रोज़गार के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है​?​
  • जानिए, ढांचागत सोच से कैसे सशक्त होगी ट्रांस और क्वीयर भागीदारी​?
  • जानिए​, भारत में ट्रांसजेंडर आंदोलनों का जाति-विरोधी होना क्यों आवश्यक है?

लेखक के बारे में

  • आनंदकृष्णन एस, आईडीआर में संपादकीय सहयोगी हैं। इससे पहले वह प्रॉस्पेरिटी में रिसर्च एनालिस्ट के रूप में काम कर चुके हैं, जहां उन्होंने जमीन और इमारत से जुड़े नियमों पर काम किया है। उन्होंने डिजिटल साक्षरता, जैविक खेती और शिक्षा से जुड़े कई जमीनी संगठनों के साथ भी विभिन्न परियोजनाओं पर काम किया है। आनंदकृष्णन ने हैदराबाद विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में परास्नातक (मास्टर्स) की डिग्री हासिल की है।
  • देबोजीत दत्ता आईडीआर में संपादकीय सहायक हैं और लेखों के लिखने, संपादन, सोर्सिंग और प्रकाशन के जिम्मेदार हैं। इसके पहले उन्होने सहपीडिया, द क्विंट और द संडे गार्जियन के साथ संपादकीय भूमिकाओं में काम किया है, और एक साहित्यिक वेबज़ीन, एंटीसेरियस, के संस्थापक संपादक हैं। देबोजीत के लेख हिमल साउथेशियन, स्क्रॉल और वायर जैसे प्रकाशनों से प्रकाशित हैं।
  • सुभाष सुंदरवादिवेलु आईडीआर में डेटा और टेक से जुड़े काम देखते हैं। उन्हें डेटा साइंस और वेब डेवलपमेंट के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। वह उभरते हुए पत्रकार भी हैं।
IDR Hindi Instagram