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क्वीयर और ट्रांस समावेशन: ढांचागत सोच से सशक्त होगी भागीदारी
समावेशन पर चर्चा के बावजूद क्वीयर और ट्रांस व्यक्तियों को अब भी संस्थानों, आजीविका के विकल्पों और नीति-निर्माण के मंचों से व्यवस्थित बहिष्कार झेलना पड़ता है।शिक्षक से, शिक्षक के लिए: पीयर लर्निंग से सशक्त होती कक्षाएं
पीयर लर्निंग, एलुमनी नेटवर्क और संस्थागत समर्थन शिक्षकों के प्रशिक्षण को महज एक औपचारिकता से आगे ले जाकर परिवर्तनकारी अनुभव में बदल रहा है।जन से, जन के लिए: फिलन्थ्रॉपी और सामाजिक न्याय का अटूट संबंध
फिलन्थ्रॉपी भय के माहौल में फल-फूल नहीं सकती, खासतौर से तब जब उसका उद्देश्य ही लोगों को भयमुक्त और सशक्त बनाना हो।हम स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने में कहां पिछड़ रहे हैं?
भारत में स्थानीय उद्यमिता, आज भी कई तकनीकी, वित्तीय और संस्थागत बाधाओं के चलते सीमित है लेकिन योजनाओं के साथ-साथ इससे जुड़ी समझ को बढ़ाने पर काम कर स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है।ज्ञान की राजनीति: संविधान और एनटी-डीएनटी समुदाय
एकपक्षीय प्रसार के कारण संवैधानिक ज्ञान अभी भी एनटी-डीएनटी समुदायों की पहुंच से बाहर है।सरकार के साथ जुड़ने के कुछ कारगर उपाय – भाग 2
वीडियो के इस भाग में हम बात कर रहे हैं, अगले कदम की— यानी, अधिकारियों से प्रभावी संवाद और बेहतर संबंध कैसे स्थापित करें।नए एफसीआरए संशोधनों के क्या मायने हैं
जानिए कि 2025 के एफसीआरए संशोधन गैर-लाभकारी संगठनों, विशेष रूप से प्रकाशन से जुड़े संगठनों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।‘औरतों का काम’: विकास सेक्टर में लैंगिक भेदभाव दिखता नहीं, तो क्या है नहीं?
कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव कई बार दिखाई नहीं देता है, इसलिए इसे पहचानना और इस पर बात करना जितना जरूरी है, उतना ही इसके समाधान के लिए ठोस नीतियां बनाना भी।नारीवादी नैतिकता और हालिया कानूनी नजरिए में क्या और कितना अंतर है?
नारीवादी नजरिया कहता है आरोपी, पीड़ित और समाज तीनों के लिए न्याय की भावना बनी रहे, यह सुनिश्चित करने के लिए सिस्टम और व्यक्ति को साथ मिलकर काम करने की जरूरत है।